रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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प्रवासी-कवि

 

 

गौतम सचदेव

 

जन्म- मंडी वारबर्टन(पंजाब का वह भाग, जो अब पाकिस्तान में है । शिक्षा- एम.ए., पी-एच.डी.(दिल्ली विश्वविद्यालय) । कायक्षेत्र- बीबीसी हिंदी सेवा लंदन में 18 वर्षों से प्रसारक । दिल्ली वि.वि. में 21 वर्षों से अधिक समय तक हिंदी अध्यापन एवं शोध कार्य । कुछ समय केंब्रिज वि.वि. में हिंदी अध्यापन कार्य । कृतियाँ- प्रेमचंदः कहानी-शिल्प, अधर का पुल, एक और आत्मसमर्पण(कविता), गीतों भरे खिलौने (राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित बालगीत संग्रह), गबन-समीक्षा (आलोचना-सहलेखन), नवयुग हिंदी व्याकरण (सहलेखन) । सम्मान- तिलली कहानी पर हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा अ.भा. पुरस्कार, हमसे पूछिए नामक रेडियो कार्यक्रम की वर्षों तक प्रस्तुति पर बीबीसी हिंदी सेवा का विशेष पुरस्कार ।

  

चुप्पी से बाहर

 

अंदर गहरे तक

एकदम चुप्पी है

परम नीरवता

गहरी

अनन्त

अनुभूति सम्पन्न

अथाह

अपरिचित

अद्भूत और अनाम

वात्सल्यमयी गोद जैसी

वहाँ जाने से डर लगता है

सबको

इस सन्नाटे से

भागकर आ जाते हैं बाहर सब

शोर मचाते हैं

और चुप्पी का गला घोंटते रहते हैं ।

 

माँ

 

माँ मुस्कुराती है

न पूछती है

न डाँटती है

निर्लिप्त देखती रहती है बस

हार पहने हुए

दीवार पन टँगी

मौन एकटक ।

 

कुछ नहीं होता अब उसे

गेंद का निशाना बनने से

या पीठ पर चिड़िया के हगने से

वह देखती है

और मुस्कुराती है

दीवर पर टँगी

तब भी

जब आती है

प्रतिदिन

गूँगी धूप

मिलने उससे ।

 

काँच में जड़ी आँखों से

निहारती रहती है माँ

अलग-अलग कमरों में कैद घर को

और खुश है

क्या सचमुच ?

क्या वह खुश थी

चौखटे में बंद होने से पहले

 

दो

 

या बाद में ?

लटके रहने में क्या मिलता है उसे ?

वही जाने

वह क्यों हो गई है

होते हुए भी न होने जैसी

न रहते हुए भी रहने जैसी ?

चौखटों में बंद है

हम सभी

या टँगे हैं दीवारों पर

और काँच की तरह टूटते हैं

बिखरते हैं

चुभते हैं

पर चौखटें, दीवारें और काँच

कितने अलग हैं

हस सबके ।

 

पनीला दैत्य

 

बस्तियों की टूटीफूटी अस्थियाँ और टिकिठयाँ

विसर्जित हो चुकी हैं

मलबे और लाशों की ढुलाई के

सैकड़ों चक्करों से थके ट्रक

पहियों पर पड़े-पड़े सुस्ताने लगे हैं

सीधी की जा चुकी है औधीं नौकाएँ

मछुआरे लहरों की ताल पर

गाने लगे हैं फिर से परिचित नौकागीत

बलात्कार की शिकार इड़ा

गर्भवती हो चुकी है

उसके तन पर बने

दाँतों और नखों के घाव भरने लगे हैं

नये पौधों पर कलियाँ आने लगी हैं

आकाश की नीलिमा पीकर

उन्मत्त पनीले दैत्य ने

जलसमाधि ले ली है फिलहाल

बहुरूपिया कुनाम

जब भी आता है

बेटी से मुँह काला करके

लाखों को खाता है

और डूबकी लगा जाता है

 

अहिरावण के पाताल से भी नीचे कहीं

कालमुखियों से सेवित अग्निलोक में

वह जानता है

विष्णु विज्ञान का नहीं ले सकता

मत्स्य कच्छप या बराह का कोई भी अवतार

वह सोच रहा है नई युक्तियाँ

बेटी को फिर अंकशायिनी बनाने की

वह आयेगा

हजारों जीभें निकाले

 

दो

 

लाखों भुजाएँ फैलाए

लहरों के पहाड़ लुढ़काता

सब कुछ कँपाता

बेरोकटोक

आज कल परसों

किसी भी समय

कहीं भी

अचानक

थरथर काँपती इड़ा

फिर कुछ नहीं कर पायेगी ।

(सुनामी समुद्री तूफान आने के कुछ सप्ताह बाद लिखी गई)

 

 

 

 

प्रवासी-कवि

 अग्नि सोने का परखती है और आपदा बहादुरों को - सेनेका

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