रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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प्रवासी-कवि

 

 

गीतांजलि बहुभाषी समुदाय बर्मिंघम के रचनाकार 

  1. रमा जोशी, 17 The Vale, Moseley, Birmingham B11 4EN.

  2. डा. वंदना मुकेश शर्मा, 68 Meadow Brook Road, Northfield, Birmingham B31 1ND.

  3. डा. कृष्ण कन्हैया, 4, Beaubrook Gardens, Wordsly, Stourbridge, West Midlands, U.K. DY8 5QJ. Email: kanhaiyakrishna@hotmail.com

  4. सर्वेश सैनी, 75-77, Church Road, Birmingham, UK, B13 5EB

  5. चंचल जैन, 29 Bideford Drive, Selly Oak, Birmingham B29 6QG

 

 

 

 रमा जोशी की दो कविताएं

 

रेत तेल - ख़ून

 

रेत में मिला ख़ून

ज़्यादा देर तक

लाल नहीं रहता

 

रेत रंग के साथ

पानी को भी

सोख लेती है

 

रेत को ख़ून नहीं चाहिये

उसके तले में

कहीं तेल है

 

ख़ून जीवन का तेल

धरती के तले

नहीं बहता

 

तेल की क़ीमत

पैसा है या ख़ून

या दोनों

तेल लेने वाले ख़ून भी

ख़रीदते हैं।

वह ख़ून जो

रेत में जा मिलता है

 

 कहीं है शायद

समझदार लोग

जो समझते हैं

इन पेचीदा मामलों को

 

मुझे बस इतना पता है

रेत को ख़ून नहीं चाहिये

रेत में  मिला ख़ून

ज़्यादा देर तक

लाल नहीं रहता।

 

 

प्रभात का जन्म

 

एक सुन्दर प्रभात का जन्म

कितना सुखद

दोपहर साँझ रात

 

रात भी

एक सोया हुआ प्रभात ही तो है

 

एक दिन में प्रभात

इतनी कालिमा

कहाँ से ले आया है?

 

पुन: सारी थकान उतार

चहचहाता दिन आया है

 

रे मन तू ही तो प्रभात है

रात से घबराता क्यों है?

प्रभात दोपहर सांझ रात

सब तू ही तो है

 

 

वंदना मुकेश शर्मा की दो कविताएं

 

अगली सदी

 

पत्थर दिल हो चुके हैं हम

तभी तो जी रहे हैं

और चारों ओर

अपनी ही मौत देख रहे हैं

 

लाशों के ढेर के बीच

चिताओं पर रोटी सेंक रहे हैं

खेल रहे हैं होली, ख़ून की

अपने भस्मासुर को

आप ही झेल रहे हैं

 

ड्राइंगरूम में सजा के

हड्डियों के शो-पीस

करते हैं दावा कलापारखी होने का

भूख से बेहाल नंग-धड़ंगे बच्चे

कल के विश्व का आज

और कहीं गोदामों में सड़ता अनाज !

 

आदमी कैसे खेलता है खेल?

बेरहमी, बेशरमी और क्रूरता से इतना मेल?

अगर यह बानगी है तो

आदमी कौन-सी ख़ुशहाली ला पाएगा

जब अगली सदी में जाएगा।

 

गुलाब : दो कविताएँ

 

एक

कल्पनाओं में

फले-फूले गुलाब

अब,

आत्मा को, काँटों से

लहुलुहान कर,

छाया और यथार्थ

के अंतर का

बोध कराते

जीवन क्या है

बतलाते।

 

 

दो

तुमने जो गुलाब

मेरा बगिया में लगाए थे

उनमें अब तक

सिर्फ़,

काँटे ही आए हैं।

प्रतीक्षा कर रही हूँ मैं

मौसम बदलने की

शायद

कुछ कम हो जाए

चुभन काँटों की।

 

 

 

डा. कृष्ण कन्हैया की दो कविताएं

 

सभ्यता

 

मानव

तेरे जिस्म पर

सभ्यता के कपड़े

अच्छे दीखते हैं

जो अंग की लाज ही नहीं बचाते

चारित्रिक मज़हब भी सिखाते हैं

क्यों उसे उतार कर

आधुनिकता के आधार पर

दुनियावी भीड़ में

ख़ुद को

नंगा दिखाते हो

और इतराते हो कि

बूढ़ी सदी से आगे खड़े हो

अपने प्राचीन पिछड़ेपन से बड़े हो

रिश्तों की बुनियादी किताब में

आपसी सौहार्द के पन्नों पर

ये महज ढकोसले के शब्द नहीं है

परन्तु मौलिकता की आकृति खिंचते हैं

जो पुरखों की मर्यादा

और आधुनिक परिस्थिति के बीच

एक आवरण का दायित्व निभाते हैं

और रोकते हैं

उन आँखों को

जिन आँखों को

जिन आँखों में

झूठी आधुनिकता के

बुरे सपने पलते हैं

 

समीप्य

 

समीप्य तेरा गन्तव्य लाने में

रिश्तों ने

प्यार के मज़बूत पैरों पर

अंतरंग क्षणों की

कितनी दौड़ें लगाई होंगी

तब कहीं प्रगाढ़ता

मिलन की दहलीज़ पर आई होगी।

पर "दूरी बनाए रखें "

जैसी चेतावनी ने

सचेत ही नहीं किया

बल्कि ये ताक़ीद भी की

कि सांस छूती नज़दीकियों से

हर्ष कुछ फ़ासला बनाए रखे

ताकि परिणाम शून्य से

नीचे न चला जाए

और अपने ही तराज़ू पर

भय के बटखरे से

पसगाई तौल में

हल्का न दिखाई दे!

 

 

चंचल जैन की दो कविताएं

 

नक़ाब

 

जो इंसानियत का नक़ाब पहने

गोरे को गोरा, काले को काला कहते हैं,

तो सच पूछो,

वे अपने और तुम्हारे में

रंग के फ़र्क़ का इक़रार करते हैं

 

उनके चेहरे पर

जो शराफ़त का नक़ाब है

वह इन्सानियत का नक़ाब नहीं है

उनके होंठों पर जो मुस्कुराहट नहीं है

गर तोहफ़ा लेकर आए तो

यह मत समझना कि

वे तेरे हमदर्द हैं

हो सकता है

तोहफ़ा एक ख़ंजर हो

तुम्हारे काले सीने में

लगाने के लिए

तुम्हारे बदन की काली हस्ती को

मिटाने के लिए

 

ख़ून तुम्हारा भी है लाल

और उस गोरे का भी

जो इंसानियत का नक़ाब पहने

गोरे को गोरा

काले को काला कहते हैं

 

मैं हूँ एक क़ैदी

 

पिंजरे में बंद एक पंछी की तरह

जेल की सलाखों के पीछे हूँ बंद

सज़ा भुगत रहा हूं, एक क़ैदी की तरह

मैं हू एक क़ैदी, मैं हूँ बेगुनाह

 

कैसा गुनाह किया है मैने?

किसने सज़ा दी है मुझे?

ख़ौफ़ नहीं है सज़ा का मुझे

मैं हूँ बेगुनाह, मैं हूँ एक क़ैदी।

 

कौन है जो सुना दे मुझे ?

सज़ा की वजह बता दे मुझे

ख़ौफ़ नहीं है सज़ा का मुझे

मैं हूँ बेगुनाह, मैं हूं एक क़ैदी

 

बता दो गुनाह, या कर दो रिहा

एक पंछी को पिंजरे से कर दो रिहा

बेक़सूर कैदी की न लो बद्दुआ

मैं हूँ बेगुनाह, मैं हूँ एक क़ैदी।

 

यह मजबूर कैदी, यह बेबस कैदी

दुआ कर रहा है, रिहाई की कैदी

इन्साफ़ दिला दो, हक़ीकत बता दो

मैं हूँ बेगुनाह, मैं हूँ एक क़ैदी।

 

 

सर्वेश सैनी की दो कविताएं

 

मशीनी

 

ये जो आँखों में नमी है

इसमें शायद कुछ कमी है।

दर्द से नहीं हुई ये पैदा

ये तो बस ख़्वाहिश से जन्मी है

 

ख़ुश्क दिल ज़मीं का आख़िरी नम कतरा

कब का खींच कर दिमाग़ ने आँखों के हवाले किया।

अब तो सूखी सी काई की पपड़ी में जकड़ी

हर धड़कन दिल के होने की बस गवाह तो है, वज़ह नहीं।

दिल की इस मशीनी जुंबिश में

ज़ज़्बात और अहसासों की कोई ज़गह नहीं

 

काई खुरच दिल को टटोलने की ज़हमत क्यों हो गवारा

क्या होगी गर ज़मीर जग गया दोबारा ?

पिछली मर्तबा जब ये जागा था

तयशुदा उसी वक्त यह लगा था

इससे अगर कोई दूरी न होगी

कुचला जाना ही इसकी मजबूरी होगी।

 

वो लम्हा वहीं का वहीं खड़ा है

और ये, अंधेरे से कमरे में बंद पड़ा है

मशीनी रिश्तों के इस बियाबां में,

वक्त है कि सरपट घोड़े पर चढ़ा है

 

फुर्सत मिली न मौक़ा तलाशा

दस्तक ही दी न कमरे में झांका

जिस्म का है कोई यह नागवार हिस्सा

जिसका अब मानी नहीं है

अंधेरों में हैं इस कद्र ये दफ़न

रौशनी कहीं से मय्यसर नहीं है

 

महज़ तक्कलुफ़ के बायस है ये आँख रोती

टपका है जो, वो है नीर खारा

बता इसको कैसे कहे कोई मोती

बता इसको कैसे कहे कोई मोती

 

गुफ़्तगू

 

ग़ौर से आईने में जब देखा इस बार

अनदेखे, अन्जाने से अक्स उभरे बेशुमार

 

ख़ुद से गुफ़्तगू टालने की हर कोशिश

शायद करती रही पैदा इक नया अक्स।

 

हर अक्स दूसरे से जुदा है,

मुतासिर है बस ख़ुद ही से

ख़ुद ही को सोचता है कि बस ख़ुदा है

आईने की तासीर से नावाक़िफ़

किस बुत को पता है

कि देगा आईना वही जो तुमसे आईने को मिला है

 

पेशानी कि सिलवटें ख़ुद ही सब कुछ कहें

आस्तीनों से भी न अब खंजर छिपा है।

 

समझो न इस लाल रंग को हया-ए-पशेमानी,

ये ख़ून है जो हर बुत के सर चढ़ा है

 

हज़ारो हाथ निकल आते हैं इक साथ

इक ऐसा व्यूह, कि हर मोड़ पर

इक अभिमन्यू मरा पड़ा है

 

ख़ुद से गुफ़्तगू टाल कर जीने की बायस

अब ये लाश जो आइने में पड़ी है

किसी बुत की नहीं

मौत ये ख़ुद की हुई है

 

 

 

 

प्रवासी-कवि

 बड़ा आदमी वही है जो गुस्से में औल-फौल नहीं बकता - शेखसादी

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