
डॉ.कृष्णकुमार
जन्म-14 फरवरी 1940, बहराइच, उत्तरप्रदेश शिक्षा-
बी.टेक, आई.आईटी, मद्रास। टेलीविज़न सर्टिफिकेट, बैडफोर्ड टेक्निकल
कॉलेज, यू.के.। एम.एससी, पोर्टसमथ विश्वविद्यालय, यू.के । पीएच.डी,
सर्रे विश्वविद्यालय, यू.के. । सेवा- आई.आई.टी दिल्ली,
विभिन्न इलेक्ट्रानिक्स कपनियों में इंजिनियर, भारत व यू.के. के
विभिन्न संस्थाओं में विजिटिंग लेक्चरर, बर्मिंघम विश्वविद्यालय,
नॉनयाँग तकनीकी संस्थान, सिंगापुर तथा यूनीवर्सिटी ऑफ सेंट्रल
इंग्लैंड बर्मिंघम में अध्यापन कार्य । उपलब्धियाँ-
गीतांजलि बहुभाषीय साहित्यिक समुदाय का गठन एवं संस्थापना । छठे
विश्व हिंदी सम्मेलन, 1999 के कार्यकारिणी सिमिति के अध्यक्ष ।
यू.के. से प्रकाशित बहुभाषी, त्रैमासिक पुरवाई के संपादन सलाहकार ।
विश्व रामायण सम्मेलन का आयोजन । भाषायी समन्वय हेतु देश-विदेश
में सक्रिय भागीदारी । कृतियाँ- काव्य संग्रह- मैं
अभी मरा नहीं, चिंतन बना लेखनी मेरी, लेकिन पहले इंसान बनो ।
संपादन- धनक(आठ भारतीय भाषाओं का काव्य संकलन), काव्य सफ़र,
ओएसिस पोयम, गीतांजलि पोयम फ्राम इस्ट एंड वेस्ट, इलेक्ट्रोस्टैटिक
डिस्चार्ज आदि । सम्मान- अक्षरम् हिंदी सेवा सम्मान, सहित
देश-विदेश के विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मान
और हाल ही में
प्रवासी भारतीय हिंदी भूषण अलंकरण ।
संपर्क- 21 Bideford Drive, Selly Oak, Birmingham, B29 QG,
U.K.
ई-मेल- krishnagmlc@yahoo.co.uk

भारत प्राण
यह घर जो कल तक मेरा था
आज हमारा
है वह होता और किसी का
कल यह होगा
शाश्वत नियम यही जग का
जो होता आया है कल तक
वही आज अब फिर से होगा
बदल न पाओगे इस क्रम को
समझ न पाओगे इस भ्रम को
यह अनन्त है
यह अनादि है
यह उद्गम है
यही अन्त है
गीता का उपदेश
यही है
और भारत का
प्राण यही है
था अतीत भारत का सुन्दर
सुन्दरतम कल इसका होगा
जो सदियों से होता आया
नहीं अन्यथा अब कुछ होगा
हर अहं तब तक सुरक्षित
जब तलक माँ श्वाँस लेती
राष्ट्र की पहचान ही तो
राष्ट्र को है शक्ति देती
राष्ट्र की इस शक्ति को
संकल्प सबका चाहिए
स्नेह जल से सींच कर
इसको बढ़ाना चाहिए
मानचित्रों से नहीं
है राष्ट्र की पहचान होती
और कब तन से कहो
है मनुज की पहचान होती
राष्ट्र की पहचान उसकी
सोच से होती रही है
सोच की उत्पत्ति केवल
मातृभाषा से हुई है
माँ हमारी भिन्न होगी
राष्ट्र सबका एक है तो
राष्ट्रभाषा एक होगी
दो और छह
दो और छह के
गठबंधन से
है छब्बीस बनाया इसने
पिछले कुछ वर्षों से जिसने
हर इन्सान की
नींद उड़ा दी
और बढ़ा दी
उलझन उसकी
करता है संकेत
निरंतर-
‘तुम
प्रकृति के साथ हो लो
छोड़ दो उससे लड़ाई
और बुझादो आग
जो तुमने लगाई
अन्यथा जल-मग्न होगा
यह धरातल
विष्णु होंगे शेष-शैर्या पर विराजित
और विस्मित हो खड़ी
यह मनुज रचना
मूलः होगी पराजित’
नवसदी के आगमन का
विश्व ने स्वागत किया
जो किया
अच्छा किया
पर अपरिचित-सा रहा वह
प्रकृति की नव योजना से
कर दिया प्रारंभ इसने
क्रोध अपना अब प्रदर्शन
जनवरी छब्बीस को
था भुज्ज का भूचाल आया
हर तरफ़ केवल तबाही
सैकड़ों की मौत लाया
क्रम तबाही का हुआ आरंभ
वर्ष कैसा था भयावह
सहस्त्र दो अरू एक का
माह सेप्टेम्बर
इसी तारीख को
चेन्नई में फिर वही भूचाल आया
कर दिया विध्वंस जिसने शहर का
छब्बीस का भीषण कहर चलता रहा
चीन, जापान और न्यूजीलैंड में
ईरान में भी
फिर वही भूचाल आया
हर तरफ़ केवल तबाही
साथ लाया
किन्तु मानव ने न इससे सीख ली
वह प्रकृति पर
जुल्म बस करता रहा
बन हठी वह
स्वयं को छलता रहा
फिर इसी तारीख को
माह अंतिम
और पिछले वर्ष में
विश्व का सबसे
बड़ा भूचाल आया
और सुनामी लहर की
आगोश में जगत् का हर व्यक्ति आया
सहम कर
बैठा हुआ हर व्यक्ति है
प्रकृति के आक्रोश से
क्या करे वह
समझ में आता नहीं
नीतियाँ अरू अस्त्र सारे
व्यर्थ है
नाशकर्ता यह
कोई सद्दाम या लादेन नहीं
ईराक या अफ़गान नहीं
अन्याय के आधार पर
जिनको मिटाया जा सके
प्रकृति के आगे हमें
झुकना पड़ेगा
प्रकृति का सम्मान
करना ही पड़ेगा
मात्र जल का असर
देखा है अभी
पवन के संग अनल
पर ख़ामोश है
समय थोड़ा ही बचा है पास में
अन्यथा अब हाथ मलना ही पड़ेगा
उसी को
ढूँढ़ना
क्यों मेरे
सूने मस्तक पर
स्नेह का
टीका लगा कर
चेतना की सुन्दरी को
और बौना कर दिया
तुम मगर उड़ने लगे
आकाश को छूने लगे
मैं तड़पता रह गया
अपनी धरा पर
तुम निरखते ही गए
मेरी विवशता
मैं तुम्हें पहचान कर
आवाज़ देना चाहता था
पर विचारों ने
मुझे आकर संभाला
और तुम्हारी याद में
उलझा रहा
मोह, माया, तिमिर से
घिरता रहा
ज़िंदगी का है यही
किस्सा पुराना
जो नहीं मिलना
उसी को ढूँढ़ना
