रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

प्रवासी-कवि

 

 

 

दिव्या माथुर

 

जन्म एवं शिक्षा दीक्षा-दिल्ली में। एम. ए. (अंगरेज़ी) के अतिरिक्त दिल्ली एवं ग्लास्गो से पत्रकारिता में डिप्लोमा। चिकित्सा-आशुलिपि का स्वतंत्र अध्ययन । कर्मक्षेत्र-1985 में आप भारतीय उच्चायोग से जुड़ीं और 1992 से नेहरु केंद्र में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। पिछले ढाई सालों उनका में उन्होने 500 से भी अधिक कार्यक्रमों का आयोजन किया है, जो एक रिकार्ड हैं । आपका लंदन के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन में अपूर्व योगदान। रॉयल सोसाइटी ऑफ आर्टस की फ़ेलो हैं। नेत्रहीनता से संम्बंधित कई संस्थायों में सतत् योगदान, इसी विषय पर इनकी कहानियाँ और कविताएँ ब्रेल लिपि में प्रकाशित हो चुकीं हैं।वातायन : साउथ बैंक पर कविता की संस्थापक, आशा फ़ाउंडेशन और PEN संस्थाओं की संस्थापक-सदस्य, यू के हिंदी समिति की उपाध्यक्ष, नाज़िया हसन फ़ाउंडेशन और विंडरश पुरस्कार समितियों की सदस्य, भारतीय उच्चायोग, लंदन, की हिंदी कार्यकारिणी समिति की सदस्या, कथा यू के की पूर्व अध्यक्ष और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन की सांस्कृतिक अध्यक्ष, दिव्या माथुर प्रवासी टाईम्स की प्रबंध संपादक हैं और कई पत्र, पत्रिकाओं के संपादक मंडल में शामिल हैं, जैसे कि 'प्रवासी टाईम्स', अक्षरम, पुरवाई और विश्व विवेक कृतियाँ : कविता संग्रहः अंतःसलिला, रेत का लिखा, ख़्याल तेरा और 11 सितम्बर :सपनों की राख तले, आक्रोश (कहानी संग्रह - प्रो. स्टुअर्ट मैक्ग्रेगर द्वारा विमोचित एवं पदमानंद साहित्य सम्मान द्वारा सम्मानित), Odyssey : Stories by Indian Women Writers Settled Abroad (संपादन) एवं Asha : Stories by Indian Women Writers (संपादन)। प्रकाशनाधीन: एक शाम भर बातें (उपन्यासिका), चंदन पाती एवं जीवन हो मृत्यु(कविता संग्रह) आपकी कहानियों और कविताएँ भिन्न भाषाओं के सकंलनों में शामिल की गई हैं । साहित्येतर गतिविधियाँ :  नाटक Tete-a-tete की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई, वही उनकी अन्य कहानियों का भी सफल मंचन हो चुका है । नैशनल फिल्म थियेटर के लिए अनुवाद के अतिरिक्त, बी बी सी द्वारा निर्मित फ़िल्म, कैंसर  का हिंदी रूपांतर, सम्मान : Arts Achiever-2003 Award for the oustanding contribution and innovation in the field of Arts by the Arts Council of England), Individuals of Inspiration and Dedication Honour (Chinmoy Mission), कथा यू के द्वारा पदमानंद साहित्य सम्मान, प्रवासी साहित्य सम्मान, समाज सेवा में योगदान के लिए Experience Corps Recognition & Merit Certificate, यू के हिंदी समिति द्वारा संस्कृति सेवा सम्मान और कविता के क्षेत्र में इंटरनैशनल लाएब्रेरी ऑफ़ पोइटरी द्वारा सम्मानित

 

संप्रति: नेहरु केंद्र (लंदन में भारतीय उच्चायोग का सांस्कृतिक विभाग)में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी

E-mail : divyamathur@aol.com

 

 

सती हो गया सच

 

तुम्हारे छोटे, मँझले

और बड़े झूठ

उबलते रहते थे मन में

दूध पर मलाई सा

मैं जीवन भर

ढँकती रही उन्हें

पर आज उफन के

गिरते तुम्हारे झूठ

मेरे सच को

दरकिनार कर गये

तुम मेरी ओट लिये

साधु बने खड़े रहे

झूठ की चिंता पर

सती हो गया सच ।

 

 

मेरी ख़ामोशी

 

मेरी ख़ामोशी
एक गर्भाशय है
जिसमें पनप रहा है
तुम्हारा झूठ
एक दिन जनेगी ये
तुम्हारी अपराध भावना को
मैं जानती
हूँ कि
तुम साफ़ नकार जाओगे
इससे अपना रिश्ता
यदि मुकर न भी पाये तो
तुम उसे किसी के भी गले मढ दोगे
कोई कमजोर
तुम्हें फिर बरी कर देगा
पर तुम
भूल के भी न इतराना
क्यूंकि मेरी ख़ामोशी
एक गर्भाशय है
जिसमें पनप रहा है
तुम्हारा झूठ

 

तेरे जाने के बाद

 

जब शाम को तुम घर आते थे
दिल की धडक़न थम जाती थी
झट दौड क़े मुन्नी कमरे के
किसी कोने में छिप जाती थी

अब टूटे-फूटे दरवाजे
चौखट है तो खिड़कियाँ नहीं

कुछ टेढे मेढे बर्तन हैं
पर मार नहीं
झिड़कियाँ नहीं

आंखों के आगे धरती भी
न जाने कब से घूमी नहीं
न ही दिन को तारे दिखते हैं
अब नींद में डरके उठती नहीं

नन्ही सी एक आहट पर
दिल अब सहम नहीं जाता
लोगों से न
ज़र मिलाने में
आडे संदेह नहीं आता

अक्कड बक्कड से खेल हैं अब
न सही जो टूटे खिलौने नहीं
चेहरों पे हमारे शरारत है
उंगलियों के तेरी निशान नहीं

सामान बिक गया सारा पर
घर भरा-भरा सा लगता है
भोजन भर-पेट मिले मिले
मन हरा-भरा सा रहता है

 

झूठी तसल्ली

 

अब रहने दे, रहने भी दे

ये अपनी तसल्ली रहने दे

 

मेरी आहों पर गौर न कर

मेरे ज़ख़्मों से खौफ न खा

कतरा के निकल या आँख चुरा

पर झूठी तसल्ली रहने दे

 

मुज़रिम की तरह यूँ सिर न झुका

झूठा अफ़सोस न मुझपे जता

बनकर मासूम तू दे दे सज़ा

पर झूठी तसल्ली रहने दे

 

कड़वे सच के संग जी लूँगी

नीम समझ के पी लूँगी

होठों को अपने सी लूँगी

जा झूठी तसल्ली रहने दे

 

खुलकर तू सबके सामने आ

आ थाम हाथ सीने से लगा

न माफ़ करूँगी मैं ख़ुद को

पर रिहा कर दिया जा तुझको

अब वफ़ा का रोना बेशक सो

पर झूठी तसल्ली रहने दे

 

झूठ

 

झूठ सिर पर चढ़ के

बोलता है

यही सोच के

मैं ख़ामोश हूँ

इसका कतई

ये अर्थ न लो

कि मेरे मुँह में

ज़ुबान नहीं । 

 

सुनामी सच

 

तुम्हारे एक झूठ पर

टिकी थी

मेरी गृहस्थी

मेरे सपने

मेरी ख़ुशियाँ

तुम्हारा एक सुनामी सच

बहा ले गया

मेरा सब कुछ ।

 

सबूत

 

तुम झूठे हो

मैं सच्ची

तुम सच्चे हो

मैं झूठी

क्या जीवन बीतेगा

यूँ ही

सबूत इकट्ठा करते

अग्निपरीक्षा देते

संबंधों को

स्थगित करते ?

 

 

 

 

प्रवासी-कवि

 धैर्य सबसे बड़ी प्रार्थना है - गौतम बुद्ध

आपकी प्रतिक्रिया

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः गिरीश पंकज,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, संजीव ठाकुर

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com