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माह के कवि |
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गुरुदेव काश्यप |
नदी पार का पर्वत
सारा भार सिर से उतार कर
यहीं रख देना है
भीतर से खाली हो जाना है
आगे नदी है, पार करना है
नाव नहीं है आसपास
नाव बनाना है
इसी घाट पर धर देना है
रंगीन मुखौटे
इसी घाट पर उतार देना है
इन्द्रधुनषी परिधान

आगे घना जंगल है
आगे हरा-भरा जंगल है
हरे वृक्षों के यूप के बीच
पलाश बनना है
यहीं किसी शमी वृक्ष पर
टाँग कर रख देना है
प्रतिशोधों के सारे शस्त्र
अस्मिता के मुकुट
यहीँ रख देना है
जिजीविषा के भारी कवच
शरीर से उतार कर
आगे पर्वत है
आगे पर्वत पर खड़ा
एकाकी शिखर है
उसे समेटना है
पंख पसार के
आकाश बनना है
सारा भार सिर से उतार कर
यहीं रख देना है

पथहारों का देश
यह इंतजार
एक भयावह समुद्री तूफान की तरह
रात के तटवर्ती अँधरों में
टकराता-गरजता है
और समूचा देश
तख्चों के पुराने केबिन की तरह
चरमरा उठता है
यह किन हताश
पथहारे लोगों का देश
हम कस कर झिरियों पर
पटिये ठोंकते हैं
टूटते शहतीरों को
रस्सियों से कस कर बाँधते हैं
दरवाजे थामते हैं
खिड़कियों टूटती हैं
छप्पर सँभालते हैं
दीवारें ढह जाती हैं
कंदीले थामते हैं
रौशनी बुझ जाती है
अँधेरे से लड़ते हैं
रौशनी चीर जाती है
हम इतने हताश
इतने भयाक्रांत

दरवाजे खोलने
सड़कों पर चल निकलने में
सहमते हैं
इतने परवश
बंद खिड़की की झिरियों से
क्षितिज को निहारते हैं
इतने पथक्लांत
मुर्दा तारीखों को
कंधों पर लाद कर
फेंकने की जगह
तकियों के नीचे मोड़ कर
चुपचाप पैर फैला देते हैं
वे चुनाव मेनीफेस्टो
और बजट की पोथियों को
धर्मंग्रन्थ की तरह बड़बड़ाते हुए
निढाल-सिर झुकाए
घुटनों के बल झुके
आतंकित जनों पर
आश्वासनों और आशीर्वाद का
पवित्र जल छिड़क कर
बपतिस्मा का मिथ्याचार करते हैं
जहाँ मर्यादाहीन श्वानों के
जूझने, चीथने और
भौंकने की आवाज़ के साथ
ध्वज-वंदना और
यत्किंचित
एक कमरा ही सही
कम से कम इतना बड़ा तो हो
कि मेरे साथ आराम से बैठ सकें
अतीत के संस्मरण
और भविष्य के समने
महत्वकांक्षाओं की सीढ़ी

इतनी चौड़ी तो हो
कि उतार सकें
ज़मीन पर
शिखर पर पहुँचे
आदनी की लाश को
सड़क इतनी तंग भी न हो
कि घर वापस लौटने
और छोड़ जाने वालों
के बीच का फासला भी
नज़र न आये
शहर बडा़ न सही
इतना छोटा भी न हो
पूरब लाँघते ही
पझाँह की खिड़की
दिखाई दे जाये
आदमी
कम से कम इतना बड़ा जरूर हो
जहाँ एक आदमी ही सही
भयमुक्त होकर
आश्रय ले सके।

प्रतिमाओं का टूटना
धर्मादेश था तुम्हारा
पुरखों की समाधियों
और रक्त सनी मिट्टी से
गुजरता है स्वर्ग का रास्ता ।
हम चले
मंत्र कीलित शवों की भाँति चले
बर्फ में गलते
निर्वासितों के गुलाबी रक्त से
खींचा जाता रहा

एक देश का नक्शा ।
किसी प्रचीन सभ्यता के
गुलामों की एक नही पीढ़ी
किसी काल्पनिक देवता के
यूप पर कटती रही
तुम खाली पात्र बढ़ाकर
बार बार माँगते रहे
अभिचारियों की तरह
रक्त का तर्पण
तुमने सिद्धांतों के झंडे लहराये
तुमने हाथों में
व्यवस्था के पाश लिए
तुमने भाई-चारे के
नाम पर
बाँध दिया पैरों को
तुमने बना दिया हाथों को
गुलामों के हाथ ।
हाथ और पैर कट जायें तो भी
बचा रहता है विद्रोह का रास्ता
सिर तना रहना काफी है
प्रतिशोध के क्षणों के लिए।
एकता के लिए जरूरी नहीं होता
बाड़े में हाँक कर
बाँध देना खूँटे से।
खतरनाक है
किसी भी देश को
प्रतिमाओं के देश में
बदल देना।
इतिहास के तहखानों में
खंडित पड़ी हैं असंख्य प्रतिमाएँ
हमने देखा है
प्रतिमाओं का टूटना
और माथे पर अंकित
ठोकरों के निशान ।
वह रास्ता कहीं था ही नहीं
स्वर्ग भी नहीं था कहीं पर
वह रचा गया इन्द्रजाल था
सत्ता के मांसाहारियों की
शव-साधना के लिए।

सोचने वाला ब्रह्मा
कोई भय नहीं इस भीड़ से
पथराव और आगजनी करते
मुट्ठी भर सिरफिरे लोगों से
इनसे एक पेंच भी
ढीला होने वाला नहीं किसी कुर्सी का
इनसे निबट लेंगे
हमारे पुलिस के जवान
जो लिख रहे हैं संदली उँगलियों से
गुलाब की पंखुड़ियों पर
यक्ष-किन्नरों की भाषा में
प्रणय-निवेदन
जो आकार दे रहे
फूलपत्तियों की तरह
हमारी स्वप्नवल्लरियों को
उन्हें लिखने दो
गाने दो, भाव विभोर

फलक सँवारने दो
उन्मीलित पलकों से
इन सबसे निपट लेंगे
भारत भवन
और भारत महोत्सव के
जटाजूटधारी आयोजक
सिर्फ उससे खतरा है
उसे तलाशो
सिर्फ उस खरतनाक आदमी को
ढूँढ़ निकालो
जो बंद कमरे में सोचता है
सिर्फ उसे पकड़ना काफी है
जो पत्थरों को तोड़ कर
काँटों की हथौड़ियों से
एक मुहावरा तराशता है
आवश्यक नहीं है फाँसी पर चढ़ाना
या नकली मुठभेड़ में
जंगल या नहर के किनारे
मार गिराना
आवश्यक नहीं है
लंबी सजा देना
यह काल कोठरी मे भी सोचेगा
और पक्की दीवारों की
दरारों के भीतर भी
मुहावरे खोजेगा
वह नाखूनों से खुरचकर
एक हतिहास लिखेगा
उसे आवश्यक नहीं है
पूरी तरह ख़ामोश कर देना
तो किस तरह पूजा होगी
और शंखनाद होगा
गणदेवता के आवाहन में
जीवित रखना है
उन सारे शब्दों को
जो सत्ता के भोजपत्री साहित्य में
आश्वासनों के काव्य-पद बनते हैं
महाप्रभुओं की पवित्र वाणी से
ये बहुत सच बोलते हैं
आदमी और ईश्वर के खिलाफ़
कई बार अपने ही खिलाफ़
जीवित रखना है
छंद शास्त्र के नियमों को
जो वायदों को छंदों में बाँध कर
भरोसे की प्रभाती का
आभास देते हैं
एक भयानक दुःस्वप्न की तरह
भूख-प्यास और फटे कपड़ों को
मंत्रों को भी स्थान मिल सकता है
राजकीय शब्दकोश में
लेकिन बर्दाश्त नहीं होंगे
परंपरा के सामने तन जाने वाले नये मुहावरे
जो आदमी को निचोड़ कर
निथारे जाते हैं
बड़े सिरफिरे खतरनाक होते हैं ये मुहावरे
उन मुहावरों के मुहानों को बंद करो
जो सोचता है
उसे धड़ से जिंदा रखो
जो सोचता है
सिर्फ उसके सिर को
निराकार बह्म हो जाने दो ।

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