|
कविता-कार्त्तिकेय : महेन्द्र कार्त्तिकेय |
|
विश्वम्भरनाथ उपाध्याय |
महेन्द्र कार्त्तिकेय में दो अन्तर्वृत्तियाँ प्रबलतम हैं,
एक, सामाजिक चेतना या मानवचिन्ता और दूसरी कवि रूप में
आत्मपरीक्षण-आत्मप्रयोग, यह आजमाना कि कवितात्मक लेखन
में मैं क्या कर सकता हूँ ।
आठ संग्रह तो मेरे सामने हैं, शायद और भी हों ।
इतना विपुल लिखने और फिर लगातार कवितात्मक लिखावट का जारी
रहना.....कोई खीझ है कहीं, कोई चुनौती, कोई स्पर्धा, कि
देखो ये नाशुकरे हिन्दी वाले कब तक कविरूप में मान्यता
नहीं देते.... इन्हें तब तक कविता-संग्रहों से लादो या
मारो, जब तक ये त्राहि-त्राहि कर कहने न लगें कि
–
“भाई
अब माफ कर, ....तू कवि है।”
महेन्द्र कार्त्तिकेय उन रचनाकारों में हैं जिन पर
टी. एलियट की यह पंक्ति सटीक बैठती है कि कविता में नब्बे
प्रतिशत परिश्रम और दस प्रतिशत प्रतिभा होती है। मैथिलीशरण गुप्त गवाह हैं कि लगे रहो तो कविता हार
कर यहाँ-तहाँ अवतरित हो जाती है । यही स्थिति कार्त्तिकेय
में है। चूँकि कार्त्तिकेय की तरह महेन्द्र अनवरत कविता
से जूझता रहता है, अतः उसको कविता का कार्त्तिकेय या ‘कविता
कार्त्तिकेय’
कहा जा सकता है। यह बात दूसरी है कि कविता के साथ इस
आत्मसंघर्ष में कहीं कविता ही मारी जाए तो यह सम्भव है।”
महेन्द्र कार्त्तिकेय के लिए 1986 का वर्ष
महत्वपूर्ण है। इस वर्ष कवि ने चार संग्रह छपा डाले ।
‘शब्द
नहीं मिटते, प्रभु या परात्पर, पारदर्शी अनन्त और हथेली पर
समुद्र।’
इस कविता लेखन की विपुलता पर कवि स्वयं चिन्तित हैं
स्व-चेत भी-
“सोचता
और लिखता ही तो रहा हूँ मैं /अब तक, लेकिन तृषित नहीं होती
है/एक के बाद, एक रचनाएं लिखाकर/ढेर होती जा रही हैं/ मगर
कभी संतोष नहीं हुआ/जैसे मेरी आत्मा में कोई शाश्वत/
बेचैनी कैद हो गयी है/तड़पता ही रहता हूँ लगातार
!”
महेन्द्र कार्त्तिकेय की इस आत्मस्वीकृति से हम
सहमत हैं । यों प्रत्येक रचनाकार अपने से अतृप्ति में ही
जीता है और दूसरों से भी ....एक निरन्तर अपूर्णता ही उसे
पूर्णता की ओर बढ़ने या अचानक कोई चमत्कार करने की ओर ले
जाती है.....।
कार्त्तिकेय के सभी संग्रहों में कला-कौशल-नवबिम्ब संरचना-अभिव्यक्ति
की विलक्षणता-प्रचलित से मिलता
और कल्पना की रंगीनी तथा नाटकीय शैली की आशा नहीं करना
चाहिए और इस आशा के पूर्ण न होने से कार्त्तिकेय की कविता
के विस्तार तथा लगातारपन को
बरदाश्त करना कठिन हो जाता है किन्तु अपने अधैर्य और
पूर्वनिर्धारित अभिमतों
को स्थगित कर, यह तटस्थता से देखें तो इन कवितासंग्रहों
में एक ऐसे व्यक्तित्व का दीदार होता है जो एक ओर तो
सामाजिक, राजनैतिक स्तर पर पतन से परेशान है और परिवर्तन
या सुधार में अपनी तथा अपनी कविता की
भूमिका की व्यर्थता से दुःखी है....बार-बार कवि यही कहता
नजर आता है, और इस विकल्पहीनता से जो शून्य बनता है, वह
उसी में घूमता रहता या फिर वह परम्परागत भारतीयों की तरह
अपने जीवन में होने वाले अलौकिक आध्यात्मिक अनुभवों से
प्रेरित होकर सर्वोच्च सत्ता या परमात्मा के आभासों में
डूबता हुआ
वास्तविक यथार्थ का अतिक्रमण कर जाता है किन्तु
यथार्थ का दंश उसे वहाँ भी चैन नहीं लेने देता ।
यह जो वास्तविक स्तर पर मानवीय तथा सामाजिक
पूर्णता
के लिए व्याकुल व्यक्ति है, वह अपनी मानवचिन्ता के
मर्म छूता है, इसमें सन्देह नहीं और जब कवि सर्वातीतता में
तैरने लगता है तो उसके विश्वास आभास, दिव्य-अनुभव और
विश्वासबद्ध दृष्टि से वैश्विकस्तर पर परादृश्यों का आकलन
कवि को औसत दर्जे से ऊपर उठा देता है।
यह आकस्मिक नहीं है कि महेन्द्र कार्त्तिकेय को जो
थोड़ी-बहुत सफलता मिली है वह या तो सर्वातीत—सृष्टि
(पारदर्शी अनन्त और प्रभु या परात्पर) में मिली है या
व्यक्तिगत अनुराग संचरण में यथा,
‘अनु
के वक्तव्य’
में ।
प्रभु या परात्पर में श्री राम के जीवन की अपनी वर्णन के
आधार पर नई व्याख्या है अतः प्रभु या परात्पर
‘आकर्षित
करती है और पारदर्शी अनन्त’
में परात्पर परिदृश्य और वर्णनों की निरन्तरता प्रभावित
करती है
-
हजारों वर्ष बाद अपने को फिर से दुहराना
अपने को फिर फिर से पाना कितना कष्टप्रद है, अनुमानों
!
(प्रभु
या परात्पर)
कहीं-कहीं महेन्द्र कार्त्तिकेय में सतही विवरणों के सिवा
सूक्ष्मावलोकन भी हैं :
“मनुष्य
होने का अर्थ है
हर क्षण त्वरित गीत से भागते सत्य को परखना ।”
इस तरह के सत्यवचन और सूक्ष्मावलोकन अन्यत्र भी खोजे जा सकते
हैं परन्तु उनकी संख्या कम है...विवरणों की
आवृत्ति में
उन्हें कौन ढूँढ़े, यह सवाल उत्पन्न होता है और यह
देखकर अचरज भी होता है कि कार्त्तिकेय ने समकालीन कविता से
संलग्न होने पर भी उसकी नई भंगिमाओं, नई संरचनाओं नव
बिम्बादि से अधिक सीखा नहीं । महेन्द्र कार्त्तिकेय कविता
मे कलाकारी नहीं करते, रचना को वह रचाते नहीं हैं, उसमें
नई बुनावटें नहीं लाते, उनका ध्यान तो सदा कथ्य पर रहता
है। उन्हें जो कहना है उसे वह कहते जाते हैं...वह
कवितात्मक सम्मोहन की चिन्ता नहीं करते, अपने सोच, अपने
संदेश, अपने पर्यवेक्षणों की चिन्ता करते हैं। कविता की
रूपसज्जा, उसकी गठन बनावट और विशद के सूक्ष्म में सम्पुटन
की परवाह वह नहीं करते, फलतः जहाँ कार्त्तिकेय के
कवितात्मक लेखन की अलग पहचान तो बनी है लेकिन उनकी कविता
को कविता कम कवितात्मक लेखन ही कहा जा सकता है।
उन्हें उक्त तीन कृतियों में कविता के रूप में सफलता मिली
है क्योंकि इनमें कवि
ने अपने निजी अनुभवों तथा आत्मीय
बोधों का प्रयोग किया है और यहाँ बार-बार यथार्थ के स्तर
पर व्यर्थ विवरण नहीं है।
महेन्द्र कार्त्तिकेय ने सतत कवितालेखन का सीधा
सरल मार्ग निकाल लिया कि वास्तविकता के बिशद रूप को
संक्षेप में सटीक बिम्ब के सेथ प्रस्तुत करने की जगह, वह
वर्ण्य विषय पर
सोच-विचार की पद्धति अपनाते हैं और सोच का अन्त न होने से
महेन्द्र की कविता पारदर्शी अनन्त हो जाती है,
अतः
आत्मविस्तरण, इस तरह के कवितात्मक लेखन की विशेषता है—
सड़क क्या है, मार्ग है /कारण है गति का/ या हमारे प्राण
के उन्मेष का
है द्वार/ और दिन, जिसमें अँधेरा है, उजाला है/ उसका कहाँ
तक है व्यास/ क्या है परिधि/ ब्रह्मण्ड में क्या/
अजीबोगरीब चीज़ों का अम्बार/ उसी में एक है दिन /एक
है सड़क /या सड़क ही दिन है।
जाहिर है कि यह कथन का मात्र विस्तरण है, यहाँ, चयन नहीं,
किसी मार्मिक छवि, प्रसंग,
बिम्ब या रूप का
चयन नहीं बल्कि
विचार की प्रक्रिया है जो चलता चला जाता है और नाटकीय
आरोहण–अवरोहण
कल्पना की रानाइयों-रंगीनियों एवं शब्द कौशल में प्रचलित
से मिलता न होने से कार्त्तिकेय अपने अनुचिन्तन के नागफाश
में पाठक को बाँधकर उसको भारासन करने में भीम कवि हैं।
दृश्यवर्णनों में भी कार्तिकेय चयन-कला पद्धति नहीं अपनाते
तथापि समुद्र पर उनके कई शब्द चित्रकारियाँ दिलचस्प हैं।
उनके काव्यनाटकों से समाज के अंतविरोधों को पकड़ने की समझ
है, इसमें संदेह नहीं। महेन्द्र कार्तिकेय
‘सावधान’
नामक संस्था (विनोद गुप्ता) से भी जुड़े जो समाज सुधार का
कार्य करती है।
‘समय
के चेहरे में’,
लेखक घी में गाय की चर्बी मिलाकर बेचने वाले व्यापारी को
अनावृत करता है और शोषण अन्याय के विरुद्ध लड़ने वालों की
छवि बनाता है किन्तु व्यवस्था के प्रश्न पर उसमें मतिभ्रम
है। वह व्यवस्था–विरोध
के वामपंथी विकल्प से सहमत नहीं है किन्तु लेखक इस विषय
में कोई वामपंथेतर विकल्प नहीं पा सका, अतः वह कहता है --
“जड़
व्यवस्था है
व्यवस्था को करना होगा
फिर से व्याख्यायित”
किन्तु यह कार्य कार्तिकेय कर नहीं सके क्योंकि वह सामाजिक
चिंतन तथा राजनैतिक
चिंतन से गहरे नहीं गए, उनकी
प्रतिकियाएँ एक संवेदनशील सीधे- सच्चे रचनाकार की हैं जो
समाज को आदर्श तो बनाना चाहता है किन्तु उस पूर्णता तक
पहुँचने के लिए जो विकट कार्यवाही करनी पड़ती है, उससे वह
घबराता है।
‘प्रतिबद्द’, ’समय
के चेहरे’
तथा ‘खण्डित
पांडुलिपि’,
काव्यनाटकों में लेखक की समाज सुधारक संवेदना और विषम समाज
व्यवस्था से दुःखी लोगों के प्रति पक्षधरता प्रभावित करती
है यों लेखक का वैचारिक मतिभ्रम खीज उपजाता है—
“उत्पादकता
का होता है एक ही अर्थ।
शोषण दर शोषण गरीबी दर गरीबी
मैं प्रतिबद्ध हूँ अपनी रचनात्मकता से ।
(प्रतिबद्ध)
यदि कोई निम्नतम
स्तर पर जीनेवाली जनता के प्रति प्रतिबद्ध है तो वह निजी
उत्पादकता को शोषण का कारण मानकर पूँजीवाद का विरोध करेगा
किन्तु कार्त्तिकेय अपनी प्रतिबद्धता रचनात्मकता के प्रति
दिखाते हैं । वह कहीं भी जनपक्षधर
क्रान्तिकारी बोध का पिरचय नहीं देते, अतः वह प्रतिबद्धता
की अपनी ही परिभाषा करते हैं। तथापि महेन्द्र कार्त्तिकेय
का कविताओं और काव्यनाटकों में कलाकौशल
और रंगरोगन की न्यूनता होने पर भी उनमें मानव तथा मूल्य, दोनों की गहरी
चिन्ता है और यह चिन्ता कवि बार-बार प्रकट करता है, दुःखी
होता है, दग्ध और कोई मार्ग न पाकर आध्यात्मिकता में रमने
लगता है जो स्वाभाविक है क्योंकि वास्तविक जीवन में जो
नहीं है, सर्वातीय स्तर पर, मनुष्य उसी को आध्यात्मिक
अनुभूतियों में प्राप्त करना चाहता है। यथार्थ से फैन्टेसी
की ओर यह गति प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए स्वाभाविक है जो
यथार्थ के संसार को बदलने का कोई स्पष्ट विकल्प नहीं
प्राप्त कर पाता ।
अतएव महेन्द्र कार्त्तिकेय को जो भी कवितात्मक सिद्धि मिली
है, वह सर्वातीय
अनुभवों तथा वैयक्तिक स्तर पर कोमल
संवेदनाओं की अभिव्यक्ति में मिली है जैसे
-
‘अनु
के वक्तव्य’
में ।
महेन्द्र कार्त्तिकेय की लम्बी काव्ययात्रा (प्रथम कविता
संग्रह, बेला सुबह की, 1972 ई. ) की उपेक्षा नहीं होनी
चाहिए, उसमें कई जगह कविता भास्वरित हुई है और जहाँ वह
नहीं हैं, वहाँ भी कार्त्तिकेय कवितात्मक लेखक के रूप में
मान्यता के योग्य हैं । मुझे जो चीज़ सर्वाधिक प्रभावित
करती है, वह कविता के मोर्चे पर महेन्द्र का सेनापति
कार्त्तिकेय की तरह निरन्तर जूझते रहना...यह जो कवितात्मक
की लौ का गवाह है कि कवि के दीए जल रहे हैं और वह अपने को
निचोड़कर कविता की अनुगूँजों से अँधेरों को झिलमिला रहा
है।
मैं यकीनन महेन्द्र कार्त्तिकेय की कवितात्मक कोशिशों को
कविता की साधना की दृष्टि से
कद्र करता हूँ । उनकी कविता
के विषय में मतभेद हो सकते हैं, किन्तु उनके चार दशकों
के रचनात्मक-युद्ध को सलाम करता हूँ ।(सौजन्य
:
वैभव कार्तिकेय)