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इंटरनेट आधारित मीडिया अपनी स्वतंत्र पहचान बना चुका है |
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बालेन्दु शर्मा दाधीच |
बालेन्दु
शर्मा दाधीच
उन चंद लोगों में से एक हैं जिन्होंने
अपने कैरियर की शुरूआत एक गैर-आईटी क्षेत्र में की लेकिन
बाद में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रवेश कर अपनी
पहचान बनाई। उनकी पहली और आखिरी चिंता यही है कि आईटी के
मामले में हिंदी की दुनिया कहीं पीछे न रह जाए। हिंदी से
जुड़ी तकनीकी अड़चनों-सीमाओं,
हिंदी पत्रकारिता की चुनौतियों और हिंदी को दूसरे दर्जे की
भाषा मानने वालों का प्रतिरोध करने को वे हमेशा तैयार रहते
हैं। उनका अडिग मत है कि भारत में चाहे प्रिंट मीडिया हो
या टेलीविजन,
रेडियो हो या फिल्में,
वेब पत्रकारिता हो या मोबाइल सेवाएं,
अंततः हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का ही प्रभुत्व रहने
वाला है। भारतीय मध्य वर्ग की बढ़ती क्षमताओं और
आकांक्षाओं में उनकी गहरी आस्था है और उन्हें यकीन है कि
बाजार पर इसी मध्य वर्ग का बढ़ता प्रभाव भारतीय भाषाओं को
वह सम्मान दिलाएगा जिसकी वे हकदार हैं।
प्रिंट में राजस्थान पत्रिका और जनसत्ता,
टेलीविजन में होम टीवी और सहारा टीवी,
रेडियो में एफएम-२ और इंटरनेट में वेबवार्ता व प्रभासाक्षी
से जुड़े रहे बालेन्दु पत्रकारिता की इन चारों किस्मों में
लंबा अनुभव रखते हैं। वे हिंदी भाषा,
पत्रकारिता,
कम्प्यूटर विज्ञान और प्रबंधन चारों क्षेत्रों में
स्नातकोत्तर स्तर की योग्यता हासिल कर चुके है। बालेन्दु
सिर्फ इंटरनेट पत्रकारिता के ज़रिए ही आईटी से नहीं जुड़े
हैं बल्कि खुद माइक्रोसॉफ्ट द्वारा प्रमाणित सॉफ्टवेयर
डवलपर भी हैं। वे हिंदी-अंगरेज़ी में करीब
50
पोर्टल और वेबसाइट्स बना चुके हैं और हिंदी में एक वर्ड
प्रोसेसर 'माध्यम',
हिंदी वेब डवलपमेंट अनुप्रयोग
'वेबसमर्थ',
भारतीय भाषाओं का कॉन्टेन्ट मैनेजमेंट सिस्टम
'इन्सटैंटपोर्टल.नेट'
समाचार-संकलन सॉफ्टवेयर
'न्यूजग्रैबर',
एफटीपी सॉफ्टवेयर
'पिरामिड
एफटीपी'
और सुरक्षित मेल आदान-प्रदान के सॉफ्टवेयर
'कम्यूनिकेटर'
आदि का भी विकास किया है। वे प्रभासाक्षी.कॉम के संपादकीय
और तकनीकी दोनों विभागों को समान विशेषज्ञता के साथ देख
रहे हैं। मीडिया पर आधारित उनका ब्लॉग
'वाह
मीडिया'
और यूनिकोड केंद्रित तकनीकी मुद्दों पर आधारित वेबसाइट
'लोकलाइजेशनलैब'
भा काफी सराहे जाते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र
में उनके योगदान को मान्यता प्रदान करते हुए माइक्रोसॉफ्ट
ने उन्हें 'मोस्ट
वैल्यूएबल प्रोफेशनल
2007'
पुरस्कार से सम्मानित किया है।
इन दिनों वे
हिंदी पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम के प्रबंध संपादक और तकनीकी
प्रमुख
हैं । प्रस्तुत है - सृजनगाथा की ख़ास भेंटवार्ताः-
01.
सर्वप्रथम तो आपको सृजनगाथा डॉट.कॉम की ओर से ढेरों
बधाइयाँ इस पुरस्कार के लिए । आपने कंप्यूटर के क्षेत्र
में हिन्दी को लोकप्रिय बनाने और इसके विभिन्न अनुप्रयोगों
के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस पुरस्कार पर
आपकी प्रतिक्रिया?
उत्तर- धन्यवाद। यह कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है। हाँ,
यह पुरस्कार इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इसने
अंगरेज़ी
के प्रभुत्व वाली सूचना प्रौद्योगिकी की दुनिया में हिंदी
के हक में काम करने वाले लोगों को मान्यता दी है। हमारे
बहुत से साथी निःस्वार्थ और निष्काम भाव से अपना बहुमूल्य
समय और श्रम लगाकर आईटी के क्षेत्र में हिंदी अनुप्रयोगों,
वेब अनुप्रयोगों,
ब्लॉगमंडलों आदि के विकास में लगे हैं। सैंकड़ों काबिल लोग
इंटरनेट को उच्च कोटि के हिंदी साहित्य और अन्य विषय वस्तु
से समृद्ध करने के प्रयास में जुटे हैं। उनके महत्वपूर्ण
प्रयास कुछ हजार जागरूक हिंदी प्रेमियों और तकनीकविदों तक
सीमित रह जाते हैं। उन्हें सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की
ओर से या सरकारी संगठनों की ओर से कोई आधिकारिक मान्यता
नहीं मिल पाती। यह बहुत बड़ी बात है कि इसके बावजूद हिंदी
के प्रति लगाव और लगन रखने वाले ये युवा अपना उत्साह घटने
नहीं दे रहे। लेकिन उनके कार्यों को मान्यता,
पहचान और प्रोत्साहन न मिलना दुख और क्षोभ का विषय है जो
अब बंद होना चाहिए। हाल ही में विकीपीडिया के प्रमुख जिमी
वेल्स ने कहा था कि विकीपीडिया का हिंदी प्रभाग सबसे कमजोर
है क्योंकि उसमें दस हजार से भी कम लेख डाले गए हैं। लेकिन
जब तक आप स्वयंसेवी लेखकों और तकनीक विशेषज्ञों को
प्रोत्साहित नहीं करेंगे (धन से नहीं तो नाम से या फिर
उनके योगदान को मान्यता देकर ही) तब तक उनसे किसी जुनूनी
किस्म के समर्पण की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
माइक्रोसॉफ्ट ने एक हिंदी सेवी के काम को मान्यता देकर कम
से कम इस दिशा में पहल तो की है। इससे सूचना प्रौद्योगिकी
के क्षेत्र में हिंदी की सेवा में लगे अन्य लोगों को भी
प्रोत्साहन मिलेगा।
02.
यूँ तो आपको इंटरनेट से जुड़े सभी लोग खासकर हिंदीप्रेमी
उपयोगकर्ता बखूबी जानते हैं । (फिर भी नये पाठकों के लिए)
अपने श्रेष्ठ कार्यों यानी कि सॉफ्टवेयर्स को विकसित करने
की मूल भावना,
प्रेरणा,
तकनीक,
प्रयोग विधि और उपयोगिता के बारे में बताना चाहेंगे
?
उत्तर- मुझे हिंदी से संबद्ध जिन आईटी परियोजनाओं से
जुड़ने का सौभाग्य मिला है उनमें निस्संदेह हमारा हिंदी
पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। और इसके
लिए द्वारिकेश औद्योगिक समूह के चेयरमैन व प्रबंध निदेशक
श्री गौतम मोरारका को श्रेय दिया जाना चाहिए जिन्होंने ऐसे
समय पर प्रभासाक्षी की परिकल्पना की जबकि
'डॉट
कॉम बस्ट'
के कारण अनेक महत्वपूर्ण हिंदी पोर्टल (मसलन नेटजाल,
निहार ऑनलाइन,
वुमन इन्फोलाइन,
इन्डियाइन्फो हिंदी,
रीडिफ हिंदी,
जीडीनेट हिंदी आदि) बंद हो रहे थे। इंटरनेट में हिंदी के
प्रादुर्भाव और विकास को लेकर श्री मोरारका उतने ही
आश्वस्त थे जितने कि हम। और उनकी आस्था और विश्वास ने
हमारे उत्साह को कभी फीका नहीं पड़ने दिया। यदि व्यावहारिक
आधार पर कहा जाए तो यह प्रभासाक्षी के स्थायित्व का सबसे
प्रमुख कारण है। आज जिस तरह से हिंदी पोर्टलों तथा
अनुप्रयोगों की लोकप्रियता बढ़ रही है और दिग्गज आईटी
कंपनियां हिंदी को अपना रही हैं उसने हमारे इस साझा
विश्वास को सही सिद्ध किया है कि जनभाषा में उपलब्ध कराई
जाने वाली सेवाओं की सफलता विलंबित अवश्य हो सकती है,
संदिग्ध नहीं।
बाहरी एजेंसियों के आकड़ों के अनुसार आज विश्व में इंटरनेट
पर हिंदी के पाठकों का लगभग
14
प्रतिशत हिस्सा प्रभासाक्षी के खाते मे जाता है। हमारे
दैनिक हिट्स ढाई से तीन लाख के बीच हैं जो कई अंग्रेजी
वेबसाइटों और पोर्टलों से अधिक है। ये आंकड़े देने के पीछे
मेरा आशय सिर्फ यह सिद्ध करना है कि इंटरनेट पर हिंदी
समाचार माध्यमों के सफल होने के बारे में संदेह जताने वाले
लोगों को वस्तु स्थिति का अनुमान नहीं है। हम प्रभासाक्षी
में तकनीकी और विषय वस्तु के स्तर पर काफी बदलाव करना
चाहते हैं जो समय के साथ सामने आएँगे। इनमें इस पोर्टल का
यूनिकोडीकरण भी शामिल है।
हिंदी शब्द संसाधक (वर्ड प्रोसेसर)
'माध्यम'
का विकास मैंने उन कंप्यूटर उपयोक्ताओं को ध्यान में रखते
हुए किया जो छोटे गांवों कस्बों में रहते हैं और जिनके पास
हिंदी में काम करने लायक कोई ढंग का अनुप्रयोग उपलब्ध नहीं
है। यही बात अनिवासी भारतीयों पर भी लागू होती है। हिंदी
में काम करने के जो अनुप्रयोग बड़ी कंपनियों ने उपलब्ध
कराए हैं वे हमारे छोटे कस्बों,
शहरों के उपभोक्ताओं की पहुंच से बाहर हैं। इसी वजह से
पाइरेसी की समस्या भी जन्म ले रही है। चूंकि
'माध्यम'
निःशुल्क उपलब्ध है इसलिए यदि आप पाइरेसी न करते हुए हिंदी
में काम करना चाहते हैं तो यह आपके लिए उपयोगी सॉफ्टवेयर
हो सकता है। माध्यम इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड पर आधारित है जो
भारत का आधिकारिक व मानकीकृत कीबोर्ड है। लेकिन इस
सॉफ्टवेयर की सीमाएं भी हैं। पहली यह कि यह यूनिकोड आधारित
नहीं है। दूसरी यह कि इसमें आधुनिक फारमेटिंग उपलब्ध नहीं
है। लेकिन माध्यम के अगले संस्करण में इन सीमाओं को दूर कर
दिया जाएगा।
वेबसमर्थ विन्डोज आधारित अनुप्रयोग है जो भारतीय
भाषाओं में यूनिकोड आधारित वेबसाइटों के विकास में सहायक
है। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में वर्ड प्रोसेसिंग के
लिए तो कई साधन आ गए हैं लेकिन अपनी भाषाओं में वेब पर
उपस्थिति अभी भी जरा मुश्किल है। वेबसमर्थ भारतीय भाषाओं
से संबंधित तकनीकी समस्याओं का समाधान करते हुए वेबसाइटों
के निर्माण को काफी आसान बना देता है। इसी तरह
इन्स्टैंटपोर्टल.नेट सॉफ्टवेयर भारतीय भाषाओं में बड़े
पोर्टलों के निर्माण और प्रबंधन में उपयोगी है।
न्यूजग्रैबर के माध्यम से भारतीय भाषाओं में समाचारों के
संकलन,
प्रबंधन,
श्रेणीकरण आदि को आसान बनाया गया है। यह मीडिया संस्थानों
के लिए उपयोगी हो सकता है। मुझे लगता है कि मीडिया के
क्षेत्र में अनेक कंपनियों के मौजूद होते हुए भी आज तक कोई
बहुत प्रभावशाली अनुप्रयोग सामने नहीं आए हैं। मेरी
हार्दिक इच्छा एक ऐसा ऑटोमेटेड सॉफ्टवेयर पैकेज निर्मित
करने की है जिसके माध्यम से सिर्फ चार-पांच लोगों की टीम
बीस पेज का अखबार निकाल सके। इन चार-पांच लोगों में संपादक,
उप संपादक से लेकर डिजाइनर तक शामिल हैं। देखिए उसके विकास
के लिए कब समय और संसाधन मिल पाते हैं।
03.
जैसा कि आपने बताया और हम जानते भी हैं कि नि:शुल्क हिन्दी
वर्ड प्रोसेसर '
माध्यम'
काफी लोकप्रिय रहा है । इसके अलावा आपने वेबसमर्थ,
इंसटेंट पोर्टल और न्यूजग्रैबर जैसे कई हिन्दी सॉफ्टवेयर
भी विकसित किए हैं। इन सॉफ्टवेयरों से हिंदी जानने वालों
को क्या सुविधा प्राप्त हुई है,
उनका रिस्पांस कैसा रहा है
?
उत्तर- अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद माध्यम को कंप्यूटर
उपयोगकर्ताओं का जबरदस्त समर्थन मिला है। छोटे-छोटे शहरों
और कस्बों से लेकर एनआरआई तक इसे डाउनलोड कर हिंदी भाषा
में काम करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। यह बहुत ही छोटे
आकार का अनुप्रयोग है जो एक फ्लॉपी में ही आ जाता है। इसके
उपयोगकर्ताओं में भारत और विदेशों में रहने वाले छोटे से
छोटे व्यवसाय में लगे लोग (जैसे कि एक ट्रक ड्राइवर) भी
शामिल हैं तो कैंब्रिज विश्वविद्यालय जैसी प्रतिष्ठित
संस्था में कार्यरत प्रबुद्ध लोग भी। जब मैंने इसे पहली
बार मुफ्त वितरण के लिए उपलब्ध कराया तो विभिन्न कंप्यूटर
पत्रिकाओं (चिप,
डिजिट आदि) ने इसे बहुत अच्छा रेस्पोंस दिया। तब कई
मित्रों ने कहा कि इसे निःशुल्क उपलब्ध कराने में क्या तुक
है,
कुछ तो शुल्क रखो। लेकिन हम हर काम सिर्फ धन कमाने के लिए
तो नहीं करते। हम जिस क्षेत्र में भी सक्रिय हैं,
यदि उसी में रहते हुए अपने ढंग से समाज के लिए कुछ कर सकें
तो हमारा अध्ययन,
जानकारी और श्रम सार्थक हो सकता है। माध्यम को सर्वाधिक
लोकप्रियता इंटरनेट पर निःशुल्क डाउनलोड के लिए उपलब्ध
कराए जाने के बाद मिली और अब तक उसकी लगभग
27
हजार प्रतियां विश्व भर में डाउनलोड हो चुकी हैं। वेबसमर्थ,
इंसटेंट पोर्टल और न्यूजग्रैबर को भी बहुत अच्छा समर्थन
मिला है।
04.
हिंदी कंप्यूटिंग की दिशा में आपका स्वप्न क्या है
?
उत्तर- हिंदी कंप्यूटिंग सही मायने में तब सफल होगी जब
हिंदी में शिक्षित ऐसा व्यक्ति,
जो अंगरेज़ी
बिल्कुल नहीं जानता,
कंप्यूटर पर काम करने में समर्थ हो जाए। यानी कि डिजिटल
डिवाइड अपने वास्तविक अर्थों में समाप्त हो। दूसरे,
विश्व ग्राम की अवधारणा तब तक अधूरी है जब तक कि विभिन्न
भाषाओं,
संस्कृतियों और समाजों के बीच आपसी संपर्क तमाम सीमाओं से
पूरी तरह मुक्त न हो जाए। आज हम जिस ग्लोबल विलेज की
अवधारणा से परिचित हैं वह अंगरेज़ी पर निर्भर है और यह
भाषा विभिन्न क्षेत्रों के दूरस्थ लोगों को आपस में जोड़ने
के लिए संपर्क बिंदु का काम करती है। मैं अंगरेज़ी के
बिल्कुल विरुद्ध नहीं हूँ और मानता हूँ कि हमारे युवकों
को अपनी मातृभाषा,
हमारी राष्ट्रभाषा और
अंगरेज़ी
तीनों में दक्षता प्राप्त करनी चाहिए। लेकिन यह भी नहीं
होना चाहिए कि
अंगरेज़ी
न आना किसी तरह की डिसक्वालीफिकेशन हो या इसकी वजह से वे
अवसरों से वंचित हो जाएं। जैसा कि मैं हमेशा से कहता रहा
हूं सूचना क्रांति को मैं तब सही अर्थों में सफल मानूँगा
जब कर्नाटक में रहने वाला कोई कन्नड भाषी व्यक्ति टोक्यो
में रहने वाले जापानी भाषी व्यक्ति से वार्तालाप करने में
सक्षम हो जाए और दोनों न तो
अंगरेज़ी
जानते हों तथा न ही एक दूसरे की भाषा। और यह काम कंप्यूटर,
मोबाइल या पीडीए जैसी किसी एक डिवाइस (युक्ति) तक सीमित
नहीं होना चाहिए बल्कि सभी इंटेलीजेंट डिवाइसेज यह सेवा
प्रदान करने में सक्षम हों।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि आखिर हिंदी में काम करने
वाले लोग सिर्फ कंप्यूटर तथा सॉफ्टवेयर उपयोगकर्ता की
भूमिका में ही क्यों हों?
वे कंप्यूटर विशेषज्ञ,
सॉफ्टवेयर निर्माता आदि की भूमिका में क्यों नहीं हो सकते?
इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी भाषाओं में कंप्यूटर के
सिर्फ इस्तेमाल भर से आगे की सोचें। अब हिंदी में
प्रोग्रामिंग भी शुरू होनी चाहिए ताकि हमारे गांवों-कस्बों
के हिंदी भाषी छात्र और युवक अपनी मेधा का इस्तेमाल इस रूप
में भी कर सकें। अब तक तो सूचना प्रौद्योगिकी में सिर्फ उस
भारत का योगदान है जो अंग्रेजी में सोचता और काम करता है।
अगर भारतीय भाषाओं में दक्ष युवक भी सक्रिय रूप से इस
क्रांति में हाथ बंटाएं तो सोचिए वह कितनी बड़ी क्रांति
होगी। लेकिन हमारी भाषाओं में प्रोग्रामिंग करने के लिए
जिन कंप्यूटर भाषाओं और पैकेजेज के विकास की जरूरत है वह
कोई छोटी-मोटी शक्ति नहीं कर सकती। उसके लिए माइक्रोसॉफ्ट,
आईबीएम,
ओरेकल,
सन माइक्रोसिस्टम्स जैसे दिग्गजों को जोड़ना जरूरी है और
उस प्रक्रिया में भारत सरकार को बहुत बड़ी भूमिका निभानी
होगी।
05.
अंतरजाल पर हिंदी की प्रतिष्ठा अंगरेज़ी की तुलना में कम
है यानी कि अभी भी वेबजालों या वेबपृष्ठों की संख्या
अत्यल्प है ?
इसके पीछे कौन-कौन से कारण रहे हैं
?
इसे निपटने के लिए शासकीय और व्यक्तिगत स्तर पर कौन-कौन से
प्रयास संभव हैं ?
उत्तर- ऐसा इसलिए क्योंकि अभी भी अंतरजाल पर
अंगरेज़ी
जानने वाले या
अंगरेज़ी
में सूचनाएं प्राप्त करने के इच्छुक लोगों का बहुमत है।
लेकिन ऐसा बहुत लंबे समय तक नहीं होने वाला क्योंकि
इंटरनेट है तो एक सेवा ही। और सेवा की दिशा सेवा प्राप्त
करने वालों की संख्या और पसंद पर निर्भर करती है।
जैसे-जैसे हमारे देश में निचले स्तर तक टेलीफोन,
इंटरनेट और कंप्यूटर पहुंच रहे हैं,
भारतीय भाषाओं में काम करने वालों की संख्या बढ़ रही है।
अंगरेज़ी
भाषी पाठकों की संख्या तो अपने सर्वोच्च बिंदु (सैचुरेशन
प्वाइंट) के करीब पहुंच चुकी है लेकिन हमारी भाषाओं के साथ
ऐसा नहीं है। यहाँ तो अभी शुरूआत ही हुई है। अगले पाँच साल
में भारत में लाखों नए टेलीफोन और इंटरनेट कनेक्शन लिए
जाएँगे तथा कंप्यूटर खरीदे जाएँगे। और यह सब छोटे शहरों
तथा कस्बों में ही होना है। यह सब मध्य वर्ग के लोगों
द्वारा ही किया जाना है क्योंकि उच्च वर्ग और उच्च मध्य
वर्ग के लोग तो पहले ही इन सुविधाओं से युक्त हो चुके हैं।
ये लाखों नए कंप्यूटर उपयोगकर्ता अपनी भाषा में ही काम
करना पसंद करेंगे और हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं के
अनुप्रयोगों तथा वेबसाइटों की मांग निरंतर बढ़ेगी।
गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एरिक श्मिट कह ही चुके
हैं कि इंटरनेट पर आने वाले दिन हिंदी और मंदारिन जैसी
भाषाओं के हैं और
अंगरेज़ी हद से हद तीसरे नंबर की भाषा
बनकर रह जाने वाली है। यह कोई बेवजह नहीं है कि
माइक्रोसॉफ्ट,
याहू,
गूगल,
आईबीएम,
सन,
रेड हैट जैसी आईटी की दिग्गज कंपनियां भारतीय भाषाओं में
अनुप्रयोग और अंतरजाल लाई हैं। बाजार की दिशा ग्राहकों की
संख्या के आधार पर तय होती है और संख्या हमारे पास है।
अब तक हिंदी में अंतरजाल की कमजोर स्थिति का सबसे बड़ा
कारण एक तो हिंदी को दोयम दर्जे की भाषा मानने की निवेशकों
की प्रवृत्ति है और दूसरे हिंदी अंतरजालों के लिए अब तक
राजस्व अर्जित करने का कोई ठोस जरिया नहीं बना है। कोई भी
व्यवसाय जब तक लाभप्रद न हो तब तक कोई भी उसमें क्यों हाथ
डालना चाहेगा?
हालांकि यह स्थिति अब धीरे-धीरे बदल रही है और हिंदी
पोर्टलों तथा वेबसाइटों को भी विज्ञापन मिलने लगे हैं।
हिंदी में काम करने में कुछ तकनीकी समस्याएं भी हैं जो
इच्छुक लोगों को हतोत्साहित करती हैं। भारत में इंटरनेट के
आगमन के बाद पहले कुछ साल तो सिर्फ
अंगरेज़ी
ही इंटरनेट की भाषा थी और हिंदी में बनाई गई वेबसाइटें और
पोर्टल भी एस्की एनकोडिंग का प्रयोग कर बनाए गए थे जो
वास्तव में
अंगरेज़ी
भाषा पर आधारित एनकोडिंग ही है। फिर फोंट आदि की समस्याओं
ने लंबे समय तक हिंदी में तकनीकी विकास को अवरुद्ध किए
रखा। यह तो सन
2000
के बाद जाकर गैर-अंग्रेजी भाषाओं की दिशा में थोड़ी बहुत
तकनीकी प्रगति हुई है। हां,
अब यूनिकोड के आने के बाद हालात काफी हद तक बदलने और
अंगरेज़ी
पर निर्भरता से मुक्ति मिलने की संभावना है। हम सबको
यूनिकोड के पक्ष में काम करना चाहिए।
06.
आप हिंदी के प्रख्यात पत्रकार भी हैं । (अ) आप किस रूप में
जाने जाना पसंद करेंगे,
पत्रकार के रूप में,
या स़ॉफ्टवेयर विशेषज्ञ के रूप में या हिंदी सेवी के रूप
में ?
उत्तर- एक हिंदी सेवी के रूप में क्योंकि हिंदी पत्रकारिता
और हिंदी सॉफ्टवेयरों के विकास दोनों के पीछे मेरा
उद्देश्य हिंदी भाषा की सेवा करना ही रहा है। हालांकि मैं
बहुमुखी ज्ञानार्जन में विश्वास रखता हूं और
अंगरेज़ी
या किसी भी अन्य भाषा या क्षेत्र के प्रति मेरे मन में कोई
दुराव नहीं है। मेरे बहुत से अनुप्रयोग तथा अंतरजाल आदि
अंगरेज़ी
में भी हैं। लेकिन मूल रूप से हिंदी भाषी होने के नाते,
राष्ट्र भाषा के प्रति गहरा सम्मान रखने वाला एक भारतीय
नागरिक होने के नाते और आम भारतीय के लिए कुछ कर सकने की
आकांक्षा के नाते हिंदी भाषा मुझे स्वाभाविक रूप से
सर्वाधिक प्रिय है और इसमें काम करना अत्यंत आनंददायक तथा
अर्थपूर्ण प्रतीत होता है।
07.
अंतरजाल आधारित पत्रकारिता (भारतीय परिप्रेक्ष्य में) को
कैसे मापते हैं ?
उत्तर- अंतरजाल आधारित पत्रकारिता तेजी से प्रगति कर रही
है। भारत में पहले इसका कोई संस्थागत स्वरूप नहीं था लेकिन
अब स्थितियां पूरी तरह बदल गई हैं और
'न्यू
मीडिया'
के नाम से इंटरनेट आधारित मीडिया अपनी स्वतंत्र पहचान बना
चुका है। तहलका और कोबरापोस्ट जैसे अंतरजाल आधारित समाचार
माध्यमों ने तो पहले ही विभिन्न स्टिंग आपरेशनों के जरिए
इस माध्यम की शक्ति का अहसास करा दिया है। तहलका कांड के
बाद हालांकि राजनेताओं ने वेब पत्रकारों से डरना शुरू कर
दिया था। मुझे याद आता है कि जब हमारे एक साथी ने एक नेता
को इंटरव्यू के ल