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इतिहास

 

बिलासपुर जेल में लिखी गई थी पुष्प की अभिलाषा

तपन मुखर्जी

      

चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊँ,

चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध, प्यारी को ललचाऊँ,

चाह नहीं सम्राटों के शव पर चढूं, भाग्य पर इठलाऊँ,

मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक,

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जायें वीर अनेक ।

      छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर जेल में बैरकों के बीच उनकी स्मृति को संजोया गया है। एक शिलालेख में उनकी यह कविता उकेरी गई है। आसपास के गमलों में फूल खिले हुए हैं । बैरकों के बीच उपस्थित यह शिलालेख स्व. माखनलाल चतुर्वेदी की यादों को बरकारार रखे हुये हैं।

 

       राजद्रोह के अपराध में पं. माखनलाल चतुर्वेदी को जब बिलासपुर जेल में रखा गया था तब महात्मा गाँधी ने यंग इंडिया में लिखा - हमें अपने सबसे अच्छे साथियों को जेल जाने देने में नहीं डरना चाहिये । जैसा कि मैंने कई बार कहा है कि मेरा यह विश्वास है कि पं. सुंदरलाल शर्मा अब पं. माखनलाल स्वतंत्र रहने की अपेक्षा अपनी आत्मा के लिए जेल में जाकर अपने देश की अधिक सेवा कर सकते हैं।

 

       23 जुलाई 1921 को महात्मा गांधी ने पुनः यंग इंडिया में लिखा मुझे पं. माखनलाल चतुर्वेदी का स्टेटमेंट अभी मिला है। उन्होंने गवाह पेश करने या किसी भी प्रकार अपना बचाव करने से इंकार किया है। किन्तु अपने अहिंसा के ध्येय को दुहराया है। यदि पं. माखनलाल के स्टेटमेंट पर भरोसा किया जाये, जैसा कि मुझे हुआ तो पाठकों को आश्चर्य होगा । सरकार की दृष्टि में उनका जो वास्तविक दोष या उसके लिए नहीं किन्तु एक निरपराध भाषण के लिए उन पर मुकदमा चलाया गया ।

 

       पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा के अनुसार सन् 1922  में लिखी कविता पुष्प की अभिलाषा’ पं. माखनलाल चतुर्वेदी जी के नाम का पर्याय बन गई । इसमें कोई दो मत नहीं कि इस कविता में कवि की त्याग, उत्सर्ग और राष्ट्र प्रेम की भावनाएं पूरी तरह  सशक्त केन्द्र के रूप में व्यक्त हुई हैं कवि ने पूष्प के माध्यम से अपने जीवन की अभिलाषा को व्यक्त की ही है। इसके साथ ही कवि के रूप में भी उन्होंने कविता का धर्म स्पष्ट किया है। इस कविता में कवि ने जीवन के एकमात्र अभिलाषा अपने राष्ट्र के लिए स्वयं को बलिदान करने के लिए कहा है। इस कविता की जो एक विशेष बात है, वह यह कि इसमें कवि ने तीन उन अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धियों को अस्वीकार किया है, जिन्हें कोई भी व्यक्ति सामान्यतः पाना चाहता है, कि अपना जीवन श्रृंगार के सुख और ऐश्वर्य में डुबोना नहीं चाहता । कवि यह भी नहीं चाहता कि वह शासक वर्ग से संबंद्ध होकर विशिष्ट बन जाए । यहाँ तक कि उसे मोक्ष तक की अभिलाषा नहीं है। न तो उसे भोग की कामना है, न ही स्वयं को विशिष्ठ समझने का भाव है। यह नितांत सहज और सामान्य बना रहना चाहता है। वह तो उस पथ पर बिछ जाना चाहता है, जिस पथ पर बलिदानी गुजरते हैं। इससे उसकी इच्छाएं पूरी होगी । पहली तो उसे इन वीरों के चरण स्पर्श का सौभाग्य मिलेगा । दूसरी यह कि वह उन वीरों के पैरों के नीचे आकर उनके पथ की कठोरता को कुछ कम करने में अपना योगदान दे सकेगा । पुष्प की अभिलाषा में कवि का यह भाव अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्त होता है कि काव्य को श्रृंगार राज-दरबार या भक्ति का आश्रय छोड़कर जीवन-संघर्ष के गीत लिखने चाहिए और चतुर्वेदी जी ने  यही किया । अत्यंत सात्विक उद्देश्यों से युक्त यह कविता चतुर्वेदी जी की क्षेष्ट्र रचनाओं में से हैं।  स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनकी यह कविता अत्यंत लोकप्रिय रही तथा अनेक युवाओं के कण्ठों में इसने सम्मानित स्थान प्राप्त किया ।

 

              जेल के अनुभव पर पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने कैदी और कोकिला कविता भी लिखी थी । इस मनस्वी योद्धा के प्राणों का चीत्कार इस कविता में परिलक्षित होता हैः-

 

काली तू रजनी भी काली,

शासन की करनी भी काली,

काली लहर कल्पना काली,

मेरी काल कोठरी काली

टोपी काली कमली काली,

पहले की हुंकृति की व्याली,

तिस पर है गाली ए आली।

इस काले संकट सागर पर,

करने को मदमाती, कोकिल बोलो तो ।

गाकर हो तैराती, कोकिल बोली तो ।

 

बंदी सोते हैं, है घर-घर के स्वासों का

दिन के दुःख का रोना है विश्वासों का।

अथवा स्वर है लोहे के दरवाजों का,

बूटों का या संत्री की आवाजो का,

क्या हुई बावली अर्द्धरात्रि को, चीखी कोकिल बोलो तो ।

किस दावानल की ज्वालायें हैं, दीखी कोकिल बोलो तो ।

 

       बिलासपुर की जेल 1873 में बनी थी । आजादी की लड़ाई के दौरान समय-समय पर कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी इस जेल में रहे हैं। जेल रिकार्ड के अनुसार स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए 243 सेनानियों को इस जेल में रखा जा चुका है।

 

       अंगरेज़ी के ज़माने में स्वतंत्रता की लड़ाई में शामिल लोगों को यातना देने के साधन आज भी यहाँ मौजूद हैं । हाथ और पैर को जकड़ने वाली डंडा, बेड़ी, बीटिंग स्टेंड और चक्की उन यातनाओं के गवाह के तौर पर आज भी मौजूद हैं ।

 

       अन्य जिलों के समान बिलासपुर जिले की जनता ने भी स्वतंत्रता संग्राम में कंधे से कंधा मिलाकर भाग लिया । 1930 में बिलासपुर जिले में सामूहिक सविनय अवज्ञा आंदोलन अपने पूर्ण उभार पर था। छात्रों ने आंदोलन में अगुवाई की । अतः शासकीय उच्च शाला बिलासपुर को बंद करने के आदेश दिए गए । इस कार्यवाही से छात्र भड़क उठे । उन्होंने 4अगस्त 1930 को शाला भवन पर कांग्रेस का झंडा फहराया । पता चलते ही पुलिस अधीक्षक उस स्थान पर गया और उसने झंडा उतार दिया । देशप्रेमी युवा भड़क उठे । झंडा उतार कर ले जाने वाली पुलिस की गाड़ी पर पथराव किया गया जिससे 14 पुलिस वाले और एक पुलिस अधीक्षक घायल हुआ । नगरपालिका के सदस्य भी इस कार्य में पीछे नहीं रहे । 17 अगस्त 1930 को नगर पालिका भवन पर झंड़ा फहराने का लिर्णय लिया गया । यह कार्य पुलिस द्वारा लिये गये कड़े विरोध के बावजूद लोगों की विशाल भीड़ की उपस्थिति में संपन्न किया गया।

 

 

 

इतिहास

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