रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001  ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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प्रेरक प्रसंग

छोटा या बड़ाः भारती त्रिपाठी बुराई की जड़ः संजुक्ता पंडा सही निशाना संदीप पंडा

अल्लाह का करिश्माः गीति मिश्रा तृप्ति का साधनः नीति मिश्रा गंदा पानीः श्रीकांत मिश्रा

 

प्रेरक प्रसंग

छोटा या बड़ा

भारती त्रिपाठी

        गनबाड़ी आश्रम में महात्मा गाँधी ने एक बार यह योजना बनाई कि सबके जूठे बरतन बारी-बारी से दो-तीन व्यक्ति मांजा करें । इससे आश्रमवासियों में प्रेम भाव बढेगा तथा एक दूसरे के बर्तन साफ करने से जो घृणा होती है उससे भी छुटकारा मिलेगा ।

 

        जब उन्होंने इस कार्य का महत्व आश्रमवासियों को बताया तो उनके गले यह बात नहीं उतरी । सभी आश्रमवासी कहने लगे सबके जूठे बरतन मांजने में व्यवस्था में व्यवधान होने का डर है ।

 

        गाँधी जी ने कहा व्यवस्था को सुचारू बनाये रखना ही तो मेरा कार्य है । इतना कहकर वे और बा दोनों बरतन मांजने लग गये । अन्य आश्रमवासियों ने जब देखा तो उन पर अच्छा प्रभाव पडा और वे भी उनके साथ लग गये ।

 

       गाँधी जी ने कहा इस काम को लोग छोटा समझते हैं । जबकि कोई भी काम न छोटा होता है न बड़ा । छोटा या बड़ा तो दृष्टिकोण ही होता है ।

 

बुराई की जड़

संजुक्ता पंडा

       अंगूलिमाल नामक एक डाकू था । वह लूटने के साथ-साथ लोगों की अँगूलियाँ ही काट लेता था । लोग उससे बहुत भयभीत थे ।

        एक बार उसने भगवान बुद्ध को पकड़ लिया । पर वह उनसे प्रभावित होकर बौद्ध भिक्षु बन गया । एक दिन वह भिक्षा माँगने नगर में निकला । लोगों को सहसा विश्वास नहीं हुआ । वे उसे डकैती की नयी चाल समझने लगे । नगरवासियों ने लाठियों से पीट-पीटकर उसे हलाकान कर डाला ।

        अंगूलिमाल बुद्ध के चरणों में लौट आया । उसकी हालत देखकर बुद्ध ने कहा, यह बहुत ही अच्छा हुआ । पाप का कमाया हुआ रक्त सब बह गया । ऐसा सुनकर अंगुलिमाल अपने सिर पर स्वयं एक लाठी मारकर बोला, भगवन्, यह मेरी बुद्धि ही सदा बुराई की ओर ले जाती रही है, इसे भी दण्ड मिलना चाहिए ।

        भगवान बुद्ध ने स्वयं उसकी देखभाल और ईलाज की । समय पाकर वह स्वस्थ हो गया साथ ही एक आदर्श भिक्षुक भी ।

 

सही निशाना

संदीप पंडा

        राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चारों भाई तीर-धनुष का अभ्यास कर रहे थे । राम सबसे बड़े थे सो वे सभी छोटे भाईयों को आगे मौका दे रहे थे कि पहले अपना निशाना साधो और सफल हो कर बताओ ।

        शत्रुघ्न सबसे छोटे थे । उनसे निशाना सध ही नहीं रहा था । वे बार-बार आम पर तीर चलाते पर आम था कि डाली से टूट कर गिर ही नहीं रहा था । राम सब देख रहे थे ।

        जब शत्रुघ्न हार मान कर थक गये और ज़मीन पर बैठ गये तब राम ने उनसे कहा- शत्रुघ्न, अब चलाओ तीर, आम पर निशाना जरूर लगेगा ।

        सचमुच आम ज़मीन के नीचे था । राम ने चुपके से पीछे से एक तीर चला दिया था । यह सब गुरुजी ने भी देख लिया । उन्होंने राम से कहा, राम तीर तो तुम चलाये थे पर शत्रुघ्न को शाबासी दे रहे हो । ऐसा क्यों ?

        राम का उत्तर था, गुरुवर, मैं यदि ऐसा न करता तो शत्रुघ्न निराश होकर तीर-धनुष ही त्याग देता और दुख से उसका मन रो पड़ता । सो गुरुजी मैंने उसके विश्वास को बढ़ाने के लिए यह सब किया ।

        गुरुवर मन से पुलकित हो उठे ।

 

अल्लाह का करिश्मा

गीति मिश्रा

 

      क बार मोहम्मद साहब अबू बकर के पास बैठे थे । एक व्यक्ति आया और अबू बकर को गालियाँ देने लगा । अबू शांति से बैठे सुनते रहे । लेकिन जब वह व्यक्ति शिष्टता की सारी हदें पार कर गया तो अबू बकर के सब्र का प्याला छलक गया । वे जवाब में बोल उठे । उसी क्षण मोहम्मद साहब वहाँ से उठकर चलि दिये ।

 

       बाद में जब अबू बकर ने मोहम्मद साहब से चले जाने का कारण पूछा तो मोहम्मद साहब से कहा जब तक तुम चुप थे । अल्लाह का एक करिश्मा तुम्हारे साथ था और जब तुम बोलने लगे वह चला गया ।

 

तृप्ति का साधन

नीति मिश्रा

        सामसीह एक बार किसी गाँव से गुजर रहे थे । रास्ते में रेगिस्तान पड़ा । दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं देता था । ऐसे में भोजन खत्म हो गया । शिष्यों ने ईसा को जब भोजन की अल्पता की बात बताई तो उन्होंने कहा जो भी तुम्हारे पास है सब इकट्ठा कर लो और मिल बाँट कर खा लो ।

 

        शिष्यों के पास कुल मिलाकर पाँच रोटी और दो कटोरा तरकारी निकली । गुरु ने उसे इकट्ठा किया और शिष्यों को खाने को बाँट दिया ।

 

       शिष्यों ने भरपेट खाया । उनके सालोमन नामक शिष्य ने उनसे पूछा गुरुवर इतनी कम भोजन सामग्री में भी इतने लोग तृप्त कैसे हो गये ?

 

       ईसा ने कहा बेटा धर्मात्मा वह है जो खुद की नहीं सभी की बात सोचता है । अपनी बचत सबके काम आये यह विचार आते ही तुम्हारी पाँचो रोटियाँ अन्नपूर्णा स्वरूप बन गई । जो लोग जोड़ते हैं वे भूखे ही रहेंगे तथा जिन्होंने देना सीखा है उनके लिये तृप्ति के साधन अपने आप ही आ जुटते हैं ।

 

गंदा पानी

श्रीकांत मिश्रा

        क बार भगवान बुद्ध को प्यास लगी । उन्होंने अपने शिष्य आनंद को पास के झरने से पानी लेने भेजा । उस झरने में थोड़ी देर पहले कुछ पशु नहाये थे, जिनसे उस झरने का पानी गंदा हो गया था । शिष्य बिना पानी लिये वापस आ गया और बुद्ध को हाल सुनाकर बोला मैं किसी और नदी से पानी ले आता हूँ ।

 

        किंतु बुद्ध ने उसी झरने से पानी लाने को पुनः कहा । पानी तो अब भी गंदा था । तीन बार ऐसा करने के बाद जब चौंथी बार आनंद पानी लेने गया तो पानी तब तक साफ हो चुका था । तब स्वच्छ जल लेकर बुद्ध के पास आ गये ।

 

        पानी पीते हुये भगवान बुद्ध ने कहा आनंद, हमारे जीवन का जल भी कुविचार रूपी पशु लौटने से गंदा होता रहता है । हम उससे डरकर भाग खड़े होते हैं । यदि हम भागें नही, मन के शांत होने की प्रतीक्षा करें तो सब कुछ साफ हो जायेगा । बिलकुल झरने के पानी की तरह।

            आनंद को बात समझ में आ गई ।

 

 

 

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 वह शासक अत्याचारी है, जो स्वेच्छा के अतिरिक्त कोई नियम नहीं जानता - वाल्टेयर

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