प्रेरक प्रसंग

मगनबाड़ी
आश्रम में महात्मा गाँधी ने एक बार यह योजना बनाई कि सबके
जूठे बरतन बारी-बारी से दो-तीन व्यक्ति मांजा करें । इससे
आश्रमवासियों में प्रेम भाव बढेगा तथा एक दूसरे के बर्तन
साफ करने से जो घृणा होती है उससे भी छुटकारा मिलेगा ।
जब उन्होंने इस कार्य का महत्व आश्रमवासियों को बताया तो
उनके गले यह बात नहीं उतरी । सभी आश्रमवासी कहने लगे
–
सबके जूठे बरतन मांजने में व्यवस्था में व्यवधान होने का
डर है ।
गाँधी जी ने कहा –
व्यवस्था को सुचारू बनाये रखना ही तो मेरा कार्य है । इतना
कहकर वे और बा दोनों बरतन मांजने लग गये । अन्य
आश्रमवासियों ने जब देखा तो उन पर अच्छा प्रभाव पडा और वे
भी उनके साथ लग गये ।
गाँधी जी ने कहा
–
इस काम को लोग छोटा समझते हैं । जबकि कोई भी काम न छोटा
होता है न बड़ा । छोटा या बड़ा तो दृष्टिकोण ही होता है ।

अंगूलिमाल
नामक एक डाकू था । वह लूटने के साथ-साथ लोगों की अँगूलियाँ
ही काट लेता था । लोग उससे बहुत भयभीत थे ।
एक बार उसने भगवान बुद्ध को पकड़ लिया । पर वह उनसे
प्रभावित होकर बौद्ध भिक्षु बन गया । एक दिन वह भिक्षा
माँगने नगर में निकला । लोगों को सहसा विश्वास नहीं हुआ ।
वे उसे डकैती की नयी चाल समझने लगे । नगरवासियों ने
लाठियों से पीट-पीटकर उसे हलाकान कर डाला ।
अंगूलिमाल बुद्ध के चरणों में लौट आया । उसकी हालत देखकर
बुद्ध ने कहा, यह बहुत ही अच्छा हुआ । पाप का कमाया हुआ
रक्त सब बह गया । ऐसा सुनकर अंगुलिमाल अपने सिर पर स्वयं
एक लाठी मारकर बोला, भगवन्, यह मेरी बुद्धि ही सदा बुराई
की ओर ले जाती रही है, इसे भी दण्ड मिलना चाहिए ।
भगवान बुद्ध ने स्वयं उसकी देखभाल और ईलाज की । समय पाकर
वह स्वस्थ हो गया साथ ही एक आदर्श भिक्षुक भी ।

राम,
लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चारों भाई तीर-धनुष का अभ्यास कर
रहे थे । राम सबसे बड़े थे सो वे सभी छोटे भाईयों को आगे
मौका दे रहे थे कि पहले अपना निशाना साधो और सफल हो कर
बताओ ।
शत्रुघ्न सबसे छोटे थे । उनसे निशाना सध ही नहीं रहा था ।
वे बार-बार आम पर तीर चलाते पर आम था कि डाली से टूट कर
गिर ही नहीं रहा था । राम सब देख रहे थे ।
जब शत्रुघ्न हार मान कर थक गये और ज़मीन पर बैठ गये तब राम
ने उनसे कहा- शत्रुघ्न, अब चलाओ तीर, आम पर निशाना जरूर
लगेगा ।
सचमुच आम ज़मीन के नीचे था । राम ने चुपके से पीछे से एक
तीर चला दिया था । यह सब गुरुजी ने भी देख लिया । उन्होंने
राम से कहा, राम तीर तो तुम चलाये थे पर शत्रुघ्न को
शाबासी दे रहे हो । ऐसा क्यों
?
राम का उत्तर था, गुरुवर, मैं यदि ऐसा न
करता तो शत्रुघ्न निराश होकर तीर-धनुष ही त्याग देता और
दुख से उसका मन रो पड़ता । सो गुरुजी मैंने उसके विश्वास
को बढ़ाने के लिए यह सब किया ।
गुरुवर मन से पुलकित हो उठे ।

एक
बार मोहम्मद साहब अबू बकर के पास बैठे थे । एक व्यक्ति आया
और अबू बकर को गालियाँ देने लगा । अबू शांति से बैठे सुनते
रहे । लेकिन जब वह व्यक्ति शिष्टता की सारी हदें पार कर
गया तो अबू बकर के सब्र का प्याला छलक गया । वे जवाब में
बोल उठे । उसी क्षण मोहम्मद साहब वहाँ से उठकर चलि दिये ।
बाद में जब अबू बकर ने मोहम्मद साहब से चले जाने का
कारण पूछा तो मोहम्मद साहब से कहा
–
जब तक तुम चुप थे । अल्लाह का एक करिश्मा तुम्हारे साथ था
और जब तुम बोलने लगे वह चला गया ।

ईसामसीह
एक बार किसी गाँव से गुजर रहे थे । रास्ते में रेगिस्तान
पड़ा । दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं देता था । ऐसे में भोजन
खत्म हो गया । शिष्यों ने ईसा को जब भोजन की अल्पता की बात
बताई तो उन्होंने कहा
–
जो भी तुम्हारे पास है सब इकट्ठा कर लो और मिल बाँट कर खा
लो ।
शिष्यों के पास कुल मिलाकर पाँच रोटी और दो कटोरा तरकारी
निकली । गुरु ने उसे इकट्ठा किया और शिष्यों को खाने को
बाँट दिया ।
शिष्यों ने भरपेट खाया । उनके सालोमन नामक शिष्य ने उनसे
पूछा –
गुरुवर इतनी कम भोजन सामग्री में भी इतने लोग तृप्त कैसे
हो गये ?
ईसा ने कहा –
बेटा धर्मात्मा वह है जो खुद की नहीं सभी की बात सोचता है
। अपनी बचत सबके काम आये यह विचार आते ही तुम्हारी पाँचो
रोटियाँ अन्नपूर्णा स्वरूप बन गई । जो लोग जोड़ते हैं वे
भूखे ही रहेंगे तथा जिन्होंने देना सीखा है उनके लिये
तृप्ति के साधन अपने
आप ही आ जुटते हैं ।

एक
बार भगवान बुद्ध को प्यास लगी । उन्होंने अपने शिष्य आनंद
को पास के झरने से पानी लेने भेजा । उस झरने में थोड़ी देर
पहले कुछ पशु नहाये थे, जिनसे उस झरने का पानी गंदा हो गया
था । शिष्य बिना पानी लिये वापस आ गया और बुद्ध को हाल
सुनाकर बोला
–
मैं किसी और नदी से पानी ले आता हूँ ।
किंतु बुद्ध ने उसी झरने से पानी लाने को पुनः कहा । पानी
तो अब भी गंदा था । तीन बार ऐसा करने के बाद जब चौंथी बार
आनंद पानी लेने गया तो पानी तब तक साफ हो चुका था । तब
स्वच्छ जल लेकर बुद्ध के पास आ गये ।
पानी पीते हुये भगवान बुद्ध ने कहा
–
आनंद, हमारे जीवन का जल भी कुविचार रूपी पशु लौटने से गंदा
होता रहता है । हम उससे डरकर भाग खड़े होते हैं । यदि हम
भागें नही, मन के शांत होने की प्रतीक्षा करें तो सब कुछ
साफ हो जायेगा । बिलकुल झरने के पानी की तरह।
आनंद
को बात समझ में आ गई ।