रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 12, मई, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

व्यंग्य

सृजनगाथा का एक साल

सहभागी लेखकों को बधाई

 व्यंग्य

 

मेरा घर


लक्ष्मीकांत वैष्णव

 

(लक्ष्मीकांत हिंदी के बहुचर्चित व्यंग्यकारों में से एक हैं । सार्थक, सोद्देश्य व्यंग्य लेखन के पक्षधर । उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं - नाटक नहीं, मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ, अश्वमेध । लिखना 1965 से शुरू किया । हिंदी की सभी प्रमुख पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशित हुए । अनेक रचनाएं अन्य भारतीय भाषाओं में अनुदित और प्रकाशित । पेशे से अर्थशास्त्र के प्राध्यापक रहे वैष्णव का असामयिक निधन अप्रैल 1989 में हो गया । श्रद्धांजलि में प्रस्तुत है उनकी एक व्यंग्य रचना - संपादक)

 

यूं तो मेरा कोई घर नहीं। मगर आमतौर पर आदमी जहाँ रहता है, उसे अपना घर कहकर संतोष कर लिया करता है। मेरे पिता जी की भी यहीं स्थिति थी। उनके पिताजी की क्या हालत थी, मुझे नहीं मालूम । मगर जहाँ तक मेरी जानकारी है, पिताजी का कोई निजी मकान नहीं था। मगर इसके बावजूद बचपन में उनके मुँह से सुना हुआ एक डायलॉग मुझे अब तक याद है हम अपने घर में नंगे होकर नाचें, तुम्हें मतलब ?’ यह बात उन्होंने एक पड़ोसी से कही थी। तब नाचो न। पड़ोसी ने गुस्से से कहा था और तपाक से अपने घर में घुसकर दरवाजा बंद कर लिया था। मुझे लगा था कि पिता जी अभी अतलून-पतलून उतारकर फेंकते हैं और नाचना शुरू करते हैं। मगर वे नहीं नाचें थे। दो-तीन दिन तक मैं सहमा-सहमा रात में उठ-उठकर देखता भी था कि पिता जी-जैसा उन्होंने कहा था, वैसा नाच रहे हैं या नहीं। मगर वे नहीं नाचे थे।

 

नाच न जाने, अंगनवा टेढ़ा मुझे यह कहावत उन दिनों अनायास ही याद आ गई थी। घसीटे मास्साब, जो हमारी दूसरी कक्षा के क्लास-टीचर थे, उन्होंने यह कहावत रटवाई थी तथा वाक्य में प्रयोग करना भी बतलाया था। जरूर हमारे घर का फर्श कुछ टेढ़ा है, नहीं तो पिता जी नाचते जरूर-मैंने सोचा था, क्योंकि पिता जी अक्सर कहा करते थे। कि जो कहो, उसे करके दिखाओ।

 

घर के बारे में एक दूसरी धारणा हमारे ड्रिल मास्साब ने बतलाई थी। ड्रिल कराने के अलावा वे गणित भी पढ़ाते थे तथा कहते थे कि गणित भी एक ड्रिल है तथा दोनों का एक-दूसरे से निकट का संबंध है, उन्हें देखकर लगता भी था, क्योंकि वे ड्रिल कराते-कराने गणित पढ़ाने लगते थे तथा अनेक बार गणित पढ़ाते-पढ़ाते ड्रिल करने लगते थे। जिस लड़के से गणित नहीं बनता था, उसे क्लास में बेंच पर खड़ा करके वे तब तक ड्रिल कराने थे जब तक कि हाँफते-हाँफते उसके मुँह से गणित के सवावों के उत्तर न निकलने लगें।

 

ड्रिल मास्साब बारे में कहा जाता था उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर चली गई थी। मेरे सहपाठियों की राय में इसका कारण ड्रिल अथवा गणित में से ही कोई एक था। क्योंकि हमारे साथ पढ़ने वाले अनेक लड़के भी ड्रिल मास्साब की खूँख्वार ड्रिल तथा गणित से घबराकर स्कूल छोड़कर चले गए थे तथा दूसरी जगह पढ़ने लगे थे।

 

बहरहाल, ड्रिल मास्साब कहा करते थे कि घर वह होता है यहाँ घरवाली हो। इसी बात को वे संस्कृत में भी कहते । गृहिणी गृहमुच्यते। हालाँकि वे अपने निजी मकान में रहते थे, मगर स्पष्ट कहते थे कि उनका अपना कोई घर नहीं है। वैसे उनके सहयोगी मास्साबों में से कुछ अक्सर कहते थे कि वे पुनः घर बसाने की सोच रहे हैं।

 

बचपन में अनेक बातों को लेकर कनफ्यूजन रहता है। घर शब्द के बारे में भी कोई धारणा मेरे मन में स्पष्ट नहीं थी। चिड़ियाघर, अजायबघर, डाकघर, सिनेमाघर आदि बड़े घरों से लेकर कहवाघर, रसोईघर, नहानघर आदि छोटे घरों तक अनेक तस्वीरें थीं घर के बारे में। बीवी-बच्चों के बिना घर घर नहीं रहता। जैसी कुछ कहावतें भी थीं जो घर शब्द को एक दूसरा ही आकर देती थीं।

 

मैंने पिता जी से घर का अर्थ पूछा था तो उन्होंने कहा था कि अपन नंगे नवाब, किले पे घर हैं। साथ ही उन्होंने मुझे स्कूल की लायब्रेरी से शब्दकोश लेकर देखने के लिए कहा था। शब्दकोश में घर शब्द के जो अर्थ थे, उनमें प्रमुख था-आदमी के रहने की जगह पिता जी, जो किराए के अनेक मकान बदल चुके थे, अक्सर कहा करते थे कि अधिकांश मकान मालिक जानवर होते हैं, आदमी नहीं। जाहिर है कि जिन घरों में मालिक जानवर थे, वे घर की परिभाषा में नहीं आते थे और इसीलिए शायद हम लोग उन मकानों को जल्दी ही छोड़ दिया करते थे।

 

घर शब्द के अन्य अर्थ थे दीवार से घिरा और छाया हुआ स्थान, स्थान, ठिकाना,स्वदेश, वतन, कुल, घराना, छेद, घराना, छे,कोठा, खाना, आदि,आदि यानी घर के संकीर्ण से लेकर व्यापकतम् अर्थ तक दिए हुए थे । घर को लेकर कहावतें भी शब्दकोश में थीं, मसलन घरघुसरा, घर का अच्छा, घर का भेदी, घर की मुर्गीं बगैरह।

 

किसी भी चीज़ के बारे में ज्यादा पड़ताल करना विभ्रम पैदा करता है, लिहाजा मैंने घर के बारे में अधिक चिंता करना छोड़ दिया और अपने रहने की जगह को घर कहता चला आया। घर भले ही किराए का हो, जब तक मकान मालिक को एतराज़ नहीं है, उसे सुरक्षित रूप से अपना घर कहा जा सकता है।

 

स्कूल में मेरा घर विषय पर अक्सर निबंध लिखने के लिए आता था। दो-चार-बार ऐसा भी हुआ कि मकान मालिक का लड़का भी मेरे साथ ही पढ़ने वाला होता था तथा हम दोनों एक ही घर पर निबंध लिखकर अपने मास्साब को बतलाते थे। एक बार ऐसी ही स्थिति उत्पन्न होने पर मास्साब ने पूछा था, तुम लोग भाई हो क्या ?” इन्कार करने पर मास्साब का दूसरा सवाल था, फिर बताओ, किसने किसकी नकल मारी है ? इसके मकान में भी गोभी लगी है, तुम्हारे मकान में भी गोभी लगी है। इसके घर में भी चार कमरे हैं, तुम्हारे घर में भी चार कमरे हैं । इसके बगीचे में भी बकरी घुसती है, तुम्हारे बगीचे  में भी बकरी घुसती है। इसके घर का नाम भी बसंत-निवास है, तुम्हारे घर का नाम भी बसंत-निवास है।

 

अपराध स्वीकार कराने का हिंदीवाले का अपना तरीका था । जिस लड़के की ठुकाई करनी थी, वे उसी को बाहर बागड़ में लगी मेहंदी की एक संटी तोड़कर लाने को कहते थे। जो लड़का समझ जाता था वह मेहंदी की बागड़ से होता हुआ सीधा घर की ओर बढ़ जाता था तथा बीमारी का बहाना बनाकर चार-छह दिन बाद ही प्रकट  होता था। जो नहीं समझ पाता था, अच्छी मोटी संटी तोड़कर लाता था और पिटता था। सास्साब ने हम दोनों को एक-एक संटी तोड़कर लाने को कहा। मकान मालिक का लड़का बाहर आया और मेहंदी की झाड़ियों से संटी ले जाकर मास्साब को दी तथा स्पष्ट को दी तथा स्पष्ट स्वीकार किया कि सर, मकान उसी का है, परंतु निबंध मैंने लिखा था, जिसको उसने ज्यों का त्यों टीप दिया है।

 

इस बात का क्या प्रमाण है ?” मास्साब ने पूछा था।

सर, अपराधी का घर भाग जाना ।

ठीक है, कल उसकी ठुकाई करेंगे। और अगर तुम्हारी बात गलत हुई तो तुम्हारी ठुकाई होगी।

मास्सबा ने संटी रखी ली थी और मैं उस दिन रात भर चिंतित रहा था कि क्या पता किसमें ठुकाई पड़ती है।

 

 मैंने अपनी माँ से सारा किस्सा बयान किया था तो उसने कहा कि तेरे पिता जी से कहेंगे, वे अपने लिए एक मकान बनवा लें। अपना घर अपना घर होता है। उस रात माँ और पिता जी में झगड़ा हुआ था। माँ मकान बनवा लेने की जिद्द पर अड़ी थी तथा पिता जी कहते रहे थे कि स्थानांतरशील नौकरियों में साल भर का अनाज इक्ट्ठा खरीदने के, गाय-भैंस पालने के, खेती खरीदने के और मकान बनवाने के अनेक नुकसान हैं। कब आपका तबादला हो जाए और वे चीज़ें भारी पड़ जाएँ, नहीं कहा जा सकता। पिता जी ने कुछ उदाहरण भी दिए थे कि कैसे उस गुप्ता ने दस बोरा गेहूँ खरीदा था कि साल भर परिवार खाएगा और कैसे दूसरे ही दिन उसका तबादला हो गया था। सब बेचकर गया था। उनमें से दो बोरे हम लोगों ने भी आधी क़ीमत पर खरीदे थे।

 

मकान किराए पर दिया जा सकता है। माँ ने कहा था। इसके बाद पिता जी ने किराए पर मकान देने के अनेक नुकसान बतलाए थे, जिनमें मकान की दीवारों में कीलें ठोकने से लेकर अंततः उसे किराएदार द्वारा हड़प लिए जाने कर का उल्लेख था। पिता जी ने कहा था कि मकान एक खूँटा होता है जिससे उसका मालिक बकरी की तरह बँध जाता है। फिर वह जिस शहर में मकान है, उसके इर्द-गिर्द की तरह मंडराने ने लिए अभिशप्त होता है। वह आसपास ही तबादला चाहता है और इस बात को लेकर जगह-जगह गिड़गिड़ाने को मजबूर हो जाता है। उन्होंने कहा कि पहली गलती उन्होंने शादी करके की थी दूसरी बच्चे पैदा करके, अब तीसरी गलती वे मकान बनवा कर नहीं करना चाहते ।

 

घर के झगड़ों में अक्सर जीत पुरुष की होती है, क्योंकि वह शारीरिक रूप से भी विवाद निबटाने में सक्षम होता है। जीत पिता जी की हुई थी, और उस रात हमारा मकान नहीं बना था।

 

कहते हैं, इतिहास अपने आपको दोहराता है। और मेरा लड़का अपने घर पर निबंध लिख रहा है। उधर मकान मालिक का लड़का भी जो मेरे लड़के के साथ पढ़ता है, अपे घर पर निबंध लिख रहा है। इन दोनों के मकान में फिर चार कमरे होंगे, फिर इनके बगीचों में बकरी घुसेगी और फिर इनके मकानों का एक ही नाम होगा। सोच रहा हूँ कुछ कर्ज वगैरह की जुगत बैठाकर, छोटा-सा ही सही, एक अदद मकान बनवा ही लूँ। किराए के घरवाली खानदानी परंपरा कहीं तो टूटे।

 

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

 

Google
WWW http://www.srijangatha.com