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समापन
समारोह है,
तो मन
भारी है
महादेवी वर्मा
आज
समापन-समारोह है। यानि आज जा रहे हैं तो मन भारी है। विदा अच्छी
लगती
नहीं है,
लेकिन
क्या करूं विदा में ही मुझे बोलना है। मैं प्रयाग की पुण्यभूमि
से आई
हूं,
जहां
यमुना,
गंगा
में विलीन हो जाती है। अंत:शरीरा सरस्वती अपना परिचय
नहीं
देती और रहती है साथ,
क्योंकि यह तो साक्षात् मिलनभूमि है और आज भी एक प्रकार
का
पर्वस्थान है। तीर्थ है जिसमें हम सब मिले हैं।
देखिए,
देश
तो भिन्न हो
सकते
हैं जैसे फूल रंगों से भिन्न होते हैं। आकृति में भिन्न होते हैं।
परन्तु उनके
सौरभ
को मिलने से कोई रोक नहीं सकता। वह एक होता है। इसी तरह हमारा स्नेह,
हमारा
सौहार्द्र,
हमारी
बंधुता एक है और इसी कारण विदेश से इतने बंधु आ गए हैं हमारे
प्रेम
के कारण,
हिन्दी प्रेम के कारण। उन सबका मैं अभिनंदन करती हूं। उन सबको अपनी
वंदना
देती हूं।
भारत
बड़ा राष्ट्र है और उसके एक-एक भूखंड में एक-एक देश
है,
लेकिन
बड़े राष्ट्र को जोड़ने के लिए,
एक
रखने के लिए,
संवाद
के लिए हमको एक
भाषा
चाहिए। बिना इसके नहीं चलेगा। और वह भाषा हिन्दी हो सकती है। हिन्दी
सच्चे
अर्थ
में भूमिजा है,
वाटर
वर्क्स नहीं है। वह दूब है जिसको लेकर हम संकल्प करते
हैं।
वास्तव में हिन्दी की विशेषता देखकर ही उसे देश की राजभाषा का पद दिया
गया था।
अब
संयोग ऐसा हुआ है कि वह बेचारी वहीं है और अंग्रेजी प्रेत की तरह हमारे
सिर पर
सवार
है। और हमारा शासन और विचित्र है। वह कहता है भाषा को पहले समर्थ बनाओ।
इससे
अद्भुत कुछ बात नहीं है। प्रयोग में बिना लाए कोई भाषा समर्थ कैसे होती
है। भाषा का
समर्थन रूप प्रयोग में आने पर ही होता है। हमने क्या किया है कि घोड़े
को गाड़ी के
पीछे
बांध दिया है और कहते हैं गाड़ी चलेगी। वह कभी नहीं चलेगी। न सौ वर्ष,
न दो
सौ
वर्ष।
कभी नहीं चलेगी। अब सब कहते हैं,
अरे
आपके पास तो साहित्य नहीं है। विज्ञान
का
ज्ञान जब हो जाएगा तब देखा जाएगा। मैं आपको इतना बताती हूं कि हर विभाग
के लिए
इतनी
पुस्तकें,
इतनी
सहायिकाएं छप चुकी है कि कोई भी अगर थोड़ा कष्ट उठाकर उनका
प्रयोग करना चाहे तो कर सकता है। लेकिन हमारी पुस्तकों को कोई देखता
नहीं
है।
देखिए,
बैंकिंग का सारा काम,
पारिभाषिक शब्दावली हमारे पास है। न्याय
कहता
है सब कुछ हमारे पास है। डाकखाने का समय और कार्य सब है,
लेकिन
कौन देखे,
उसको
कोई
देखता नहीं है। जाएं तो देखिए कि वहां सब साहित्य है,
विधि
का सारा साहित्य है,
लेकिन
टंकण नहीं है। टाइपराइटर नहीं है।
अच्छा
और देखेंगे। अंग्रेजी में निर्णय लिया जाता है। हिन्दी में
लिख
सकता है,
लेकिन
नहीं लिखता है। बेचारा जो न्यायालय में जाता है,
वह
वकील से हाथ
जोड़ता हुआ घूमता है,
क्या
हुआ,
वकील
साहब हारे या जीते। कौन क्या बोला- वह नहीं
जानता
और किसी कार्यालय में दो-चार जो हिन्दी में काम करते हैं,
वह
पूरी
वर्णव्यवस्था में मानों शूद्र हैं। सब उनको हीन मानते हैं,
छोटा
मानते हैं। जितनी
प्रतियोगिताओं की परीक्षाएं होती हैं,
प्रश्नपत्र अंग्रेजी में आते हैं। आप हिन्दी
में
काम कीजिए,
परीक्षा अंग्रेजी में दीजिए।
तो
वास्तव में अंग्रेजी के
प्रेत
से हमें मुक्ति कैसे मिले। आपके संकल्प से हो सकती है। जो आपको मैं
इतना ही
कहती
हूं कि आप यह न सोचिए कि भाषा समर्थ नहीं है। समर्थ है वह। उसके ज्ञान,
विज्ञान और जितनी विधियां है,
आप
देखा कीजिए- हरेक तहखाने में भरे हुए हैं,
तल
भरे
हुए
हैं। कोई देखता नहीं क्या होता है उनका। और आप सोचिए कि एक विधि पर वह
पुस्तक
लिखता
है। बेचारा मर-मरके लिखता है,
भूखा
मरके लिखता है और वह आपके कटघरे में बंद
है,
बाहर
आती नहीं है। तो एक बात यह भी मान लीजिए। हमको लेखा-जोखा बताइए कितनी
पुस्तकें कितने पारिभाषिक शब्द छप चुके हैं। एक बार आप लेखा-जोखा ले
लीजिए। मेरे
पास
तो बहुत हैं। क्योंकि जो लिखता है,
रोता-धोता मेरे पास भेज देता है। मैं कुछ
नहीं
कर सकती हूं। लेकिन आपस में कहती हूं कि इसको समारोह मत मानिए। मेले
में आदमी
खो
जाता है। एक दिन बहुत अच्छा समारोह करते हैं। आप इतने लोग बैठे हैं,
अगर
आप
संकल्प लें तो कल क्या नहीं हो सकता। लेकिन हम नहीं करते हैं।
तो
वास्तव में
आज
आपके संकल्प का दिन है। मैं यह नहीं मानती कि जब सब विदा हो जाएंगे तो
आप कुछ
काम
करेंगे। करेंगे नहीं कल से खो जाएंगे। और हो सकता है,
सात
वर्षों में फिर
मिलें। यह सात वर्ष का जो अंतर है,
वह
बहुत भयंकर है। जब हिन्दी को पंद्रह वर्ष के
लिए
रोका था कि पंद्रह वर्षों के बाद यह भाषा राजभाषा हो जाएगी,
तो
मैंने टंडनजी से
कहा
था कि पंद्रह वर्ष तक इसको आप फांसी पर लटकाएंगे और जब उतारेंगे तो
कहेंगे आधी
मर
गई। तो आज ही कीजिए। छोटे-छोटे देशों में देखिए,
उन्होंने अपनी भाषा को दूसरे
दिन
राष्ट्रभाषा बना दिया है।
हम
हिन्दी प्रदेशों में भी राजभाषा नहीं बना
पाए
हैं। और तमाशा है कि उन्होंने हमें उर्दू से उलझा दिया है जिसका कोई
अर्थ नहीं
है।
क्योंकि हिन्दी- उर्दू दोनों एक भाषा है,
वाक्य-विन्यास एक है। व्याकरण एक है,
सर्वनाम एक हैं,
ग्रंथ
एक हैं,
एक ही
भाषा है। हम संस्कृत लाते हैं,
वे
फारसी के
शब्द
लाते हैं। इतना ही अंतर है। अंतर लिपि में है। तो हमारी लिपि नागरी
लिपि अधिक
व्याकरण सम्मत हैं। विज्ञान के साथ है और विदेशी नहीं है। आपकी उसी
ब्राह्मी के
क्रम
से आई है। वास्तव में हमने लिपि को लेकर के उलझन फिर उत्पन्न कर दी है।
देहात
में
जाकर देखिए तो जो हिन्दू बोलता है,
वही
भाषा मुस्लिम बोलता है। अब उन्होंने कहा
कि
नहीं दो भाषाएं हैं। अब इसी को लेकर लड़ाई है। वास्तव में अगर युद्ध ही
चलेगा,
रात-दिन विवाद चलेगा,
विद्रोह चलेगा तो यह देश गूंगा रहेगा और आप जानते हैं न जो
गूंगे
हैं,
वे
बहरे भी होते हैं। न वह सुनेगा,
न वह
बोलेगा। तो जो सुनेगा,
बोलेगा
नहीं
तो आपका इतने बड़े देश का क्या होगा। इसको कौन बांधेगा,
कैसे
बांधेगा। तो आज
जब आप
सब इकट्ठे हुए हैं,
देख
के मन बड़ा प्रसन्न हो जाता है। लेकिन जब शक्ति उसकी
देखते
हैं,
तो
लगता है कि अब क्या होगा। यह तो आज सब जगह से बादल घिरा और चला गया
बरस
के।
तो
वास्तव में आपको एक व्रत लेना ही होगा कि हमको अपने राष्ट्र को
वाणी
देना है,
यानी
अपने को ही देना है। कोई विचार कोई जनतंत्र बिना भाषा के नहीं
आता।
तो मुझे जब बहुत आपने अभिनंदन,
वंदन
दिया तो मैंने कहा कि भई देवता को आपने
बाहर
कर दिया है और पुजारी को आप अभिनंदन दे रहे हैं। तो हम जो हिन्दी के
नाम से
बैठे
हैं,
अगर
हिन्दी को लाते नहीं हैं और हिन्दी ऐसे ही रखते हैं,
तो
हिन्दी के
नाम
से एक एकत्र होकर क्या करेंगे और जो विदेश के बंधु आए हैं,
वे
बेचारे मन ही मन
क्या
सोचेंगे।
हम
अक्सर ऐसी बात करते हैं,
राष्ट्रसंघ की बात करते हैं उधर
की
बातें करते हैं। बिना अंतरराष्ट्रीय हुए हम जी नहीं सकते और राष्ट्रीय
होने की
हमें
चिंता नहीं है। तो यह तो ऐसे ही हुआ कि पेड़ को आप काट दीजिए और फिर
संगमरमर
के
चबूतरे पर रोप दीजिए। अंतरराष्ट्रीय वही हो सकती है जिसकी राष्ट्र में
जड़ें
हों।
जिसके राष्ट्र में जड़ ही नहीं है,
वह
क्या अंतरराष्ट्रीय होगा।
आप ही
सोचिए
कि आप तो राष्ट्रसंघ में उधार लेकर अंग्रेजी में बोलेंगे। आप कहेंगे
राष्ट्रसंघ में कि भारत की भाषा अंग्रेजी है। बताइए लोग नहीं
हतोत्साहित होंगे?
कहते
होंगे इतना विशाल देश और इतना हिन्दी का सौहार्द्र और इसके पास बोलने
के लिए
कुछ
है ही नहीं। यह समुद्र पार से उधार लाकर बोलता है। अब तो ऐसी अच्छी
अंग्रेजी
नहीं
जानता। बल्कि गलत-सलत बोलता है। तो मैं कहती हूं यही हीनता की भावना
है। इसको
दूर
करना चाहिए। पहले इसको आप कर सकते हैं।
जिस
दिन आप संकल्प करेंगे,
उसी
दिन
कर देंगे। आपमें असीम शक्ति है। लेकिन आपके पास कोई स्वप्न न हो,
कोई
आदर्श न
हो,
आपके
पास राष्ट्र की चेतना न हो,
तो
राष्ट्र कैसे बनेगा। कुछ नहीं बनेगा। बाहर
के
लोग आ जाते हैं,
और आ
करके बड़े उदास हो जाते हैं। स्नेह के मारे आ जाते हैं,
हमारे
सौहार्द्र के नाते आ जाते हैं और आके यहां बड़े उदास हो जाते हैं। जब
मुझे
बोलते
हैं,
तो
यहीं बातें कहते हैं कि हम क्या करें। हमसे तो कोई हिन्दी में बोलता
ही
नहीं। जहां बात करते हैं,
वहां
अंग्रेजी ही आ जाती है। हम लोग आज तक अपनी उस
हीनता
की भावना को नहीं भूले हैं।
इतने
साल हो गए हैं,
अभी
हमारी हीनता नहीं
गई और
जब तक नहीं जाती तब तक राष्ट्र अपने वर्चस्व को नहीं पाता। अस्मिता को
नहीं
पाता।
विश्व
में उसकी वाणी को कैसे कौन सुनेगा,
जब
उसके पास कोई भाषा नहीं
है।
यह कहना कि जब इसमें विज्ञान लिखा जाएगा,
जब
इसमें ज्ञान लिखा जाएगा,
तब वह
हो
जाएगा। आप देखिए तो क्या इसमें लिखा गया है। किसी ने देखा है,
कोई
पढ़ता है,
हिन्दी
की
पुस्तक। कभी नहीं पढ़ता। आप देखिए जरा,
तो आप
जब जानते ही नहीं हैं,
तो
वही मेरी
बात आ
जाती है कि गाड़ी के पीछे आप घोड़े को बांध दीजिए। गाड़ी चलेगी?
कभी
चलेगी
नहीं।
मैं यही कहती हूं कि यह समय का संकेत है। अधिक बात करना भी कठिन है। आप
इतने
थक गए
हैं,
मैं
स्वयं भी थक गई हूं। लेकिन आपसे कहती हूं कि एक व्रत आपको लेना है।
संकल्प आपको लेना है। मंदिर की मूर्ति अगर खंडित हो जाती है तो उसे हम
फेंक देते
हैं,
पूजा
नहीं करते। परन्तु हम अपने टूट संकल्पों को लेकर पूजा कर रहे हें। हमें
दूसरा
संकल्प लेना चाहिए और सोचना चाहिए कि अगर हमारे राष्ट्र को वाणी नहीं
मिलती
हैं,
तो
हमारा वर्चस्व नहीं है,
हमारी
अस्मिता नहीं है। फिर हमारा ज्ञान-विज्ञान के
लेखन
में भी मन नहीं लगेगा। हम लोग आए हैं,
विश्वविद्यालयों से पढ़कर लेकिन अगर हम
अंग्रेजी में कविता करते तो?
वास्तव में वाणी मनुष्य का परिचय है। वाणी राष्ट्र का
परिचय
है। उसमें उसका व्यक्तित्व है। आप अपने व्यक्तित्व को खंडित मत कीजिए।
आपके
संकल्प ऐसे हों,
आपके
स्वप्न ऐसे हों,
आपके
आदर्श ऐसे हों कि आप राष्ट्र को जोड़
सकें।
देखिए,
सूर्य
के ताप से धरती में बड़ी दरारें पड़ जाती हैं,
लेकिन
एक बादल जब
बरस
जाता है तो सब दरारें मिट जाती हैं। ऐसा ही हमारा स्नेह हों,
हमारा
सौहार्द्र
हो,
हमारी
ऐसी ही बंधुता हो कि हम सब लोगों को मिला सकें और अन्य देशों में भी
हमारी
बात सुनी जा सके। अब आपको मैं अधिक थकाऊंगी नहीं। आपसे केवल इतना कहती
हूं कि
यह
विदा की बेला है। परन्तु इसको मत मानिए। स्नेह में कोई विदा होती है?
लेकिन
हमारा
सौहार्द्र,
हमारा
स्नेह,
आप ले
जाएंगे। हम एक-दूसरे के निकट रहेंगे। मैं
समझती
हूं अगर आप निश्चय करें तो एक साल में हमको वाणी मिल जाएगी। अगर हम कुछ
भी
नहीं
करेंगे तो हमें अनंत काल तक वह नहीं मिलेगी। इन शब्दों के साथ मैं आपको
अपना
प्रणाम देती हूं। धन्यवाद।
(तीसरे
विश्व हिंदी सम्मेलन के समापन समारोह में महादेवीजी
मुख्य
अतिथि थीं।)
  
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