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सामाजिक और आर्थिक अधिकारिता के साथ शांति प्रो. मुहम्मद युनुस
महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन ने, जो दक्षिण अफ्रीका में सितंबर,1906 में शुरु हुआ था, शताब्दी मानने के अवसर पर मैं यहां आकर काफी गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। नागरिक अवज्ञा, शांतिपूर्वक विरोध तथा सत्य के पालन के लिए इस आंदोलन ने न केवल इस उपमहाद्वीप के इतिहास को प्रभावित किया बल्कि पूरे विश्व के इतिहास को भी प्रभावित किया ।
महात्मा के जीवन और उदाहरण ने आधुनिक सभ्यता के आधुनिक सभ्यता के मूल्यों पर गहरी छाप छोड़ी तथा सौ साल बाद भी हम सबके लिए वह प्रेरणादायक वना हुआ है। आज के अशांत समय में , जिसमें हम रहे हैं, उनका स्मरण और संदेश उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पहले था ।
गरीबी और शांति इस साल ग्रामीण बैंक और मुझे संयुक्त रूप से वर्ष 2006 का नोबेल पुरस्कार दिया गया । इस पुरस्कार का महत्व इस बात में है कि गरीबी और शांति के बीच दृढ़ता के साथ संपर्क स्थापित किया गया है। गरीबी शांति के लिए एक खतरा है। इस पुसर्कार ने विशव का ध्यान मेरे विचार में, आज के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों – गरीबी – पर केन्द्रित किया है। जब विश्व की 60 प्रतिशत आबादी विश्व की 6 प्रतिशत आय पर निर्भर है तो हमारे लिए एक शांतिपूर्ण विश्व के बारे में सोचना असंभव है । सन् 2000 से संयुक्त राष्ट्र में सभी देशों ने सर्ब सम्मति से सहस्ताब्दि विकास लक्ष्यों को निर्धारित किया जिसका उद्येश्य था 2014 तक आधी गरीबी दूर करना । यह एक साहसिक और महत्वा कांक्षी लक्ष्य था लेकिन सहस्त्राब्दि वर्ष शुरु होने के साथ ही आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के कारण उस लक्ष्य कोप्राप्त कपरने की दिशा में आगे वढ़ना संभव नहीं हो पाया । मेरे वितार में आतंकवाद के खिलाफ लड़ा ई जरूर लड़ी जानी चाहिए लेकिन सैनिक कार्य वाई करके नहीं बल्कि उसके मूल कारणों को दूर करके जो अनेक मामलों में गरीबी और अन्याय है ।
वित्तीय रंगभेद मैं लंबे अरसे से यह कहता रहा हूं कि करीब लोग करीब ने हुए हैं। इसमें उनका कोई दोश नहीं है बल्कि हमने ऐसे संस्थान और नीतियां बना रखी हैं जिसमे उन्हें गरीब बना रखा है। इन्हीं संस्थाओं और नीतियों के कारण वे गरीबी के जाल में फंसे हुए हैं, भले ही व कितनी भी कोशिश या मेहनत क्यों न करें इसका एक बड़ा उदाहरण वे वित्तीय संस्थाएं हैं जिन्हें हमने विश्व भर में बना रखी है। विश्व की दो तिहाई जनसंख्या की इन वित्तीय संस्थाओं तक बहुंच नहीं।
गरीब लोगों को वित्तीय संस्थाओं से बाहर रखने का मतवब है वित्तीय रंगभेद। ग्रामीण बैंक ने पिछले 30 सालों में जबसे उसकी स्थापना हुई, गरीब से गरीब लोगों को उन शर्तों पर उन्हें वित्तीय सेवा उपलब्ध करायी जो उनके अनुकूल है। छोटे ग्रामीण कर्ज (माइक्रो क्रेडिट) तत्वतः इस अन्यापूर्ण वैश्विक वित्तीय प्रणाली के लए चुनौती है।
ग्रामीण बैंक ग्रामीण बैंक की शुरुआत एक छोटे सेगांव जोबरा मेंएक छोटी परियोजना से हुई थी जो अब राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसाकार्यक्रम बन गया है जिसकेमाध्यम से बांग्लादेश के 733,000 गांवों के करीब 70 लाख लोगों को जिनमें 97 प्रतिशत महिलाएं हैं, कोलेटरल रहित कर्जा दिया जाता है।
ग्रामीण बैंक गरीब परिवारों को ऐसे कर्ज देता है जिससे आय हो सके। इसके अलावा मकानके लिए कर्ज, छात्रों को कर्ज कथा माइक्रो-इंटरप्राइज कर्ज देता है। साथ ही आकर्षक बचत योजनाएं, पेंशन फंड और बीमा योजना अपने सदस्यों को मुहैया कराता है। 1984 में शूरू किये गये हाउसिंग लोन से 6400,000 मकान बनाये गये हैं।
बैंक ने अब तक 6 अरब डालर के बराबर कर्ज दिये हैं। कर्ज का भूगतान 99 प्रतिशत है। ग्रामीण बैंक नियमित रूप से मुनाफा कमाता है। वित्तीय रूप ये यह आत्मनिर्भर है और 11995 के बाद से इसने दाताओं से आर्थिक मदद नहीं ली है। ग्रामीण बैंक में जमा पूंजी तथा अपने संसाधन उसके सभी बकाये कर्जे की तुलना में 943 प्रतिशत है। ग्रामीण बैंक के आंतरिक सर्वेक्षण के अनुसार कर्ज लेने वाले 58 प्रतिशत गरीबी रेखा से ऊपर आ गये हैं।
सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तिकरण बांग्लादेश में गरीबों का जीवन बेहतर बनाने में हमने प्रगति की है, खासकर गरीब महिलाओं को सशक्त बनाने में। माइक्रोक्रेडिट का प्रावधान सामाजिक माइक्रोक्रेडिट कार्यक्रमों के साथ मिलकर क्रांति का वाहक बन गया है जो मूक एवं आहिंसक है जिसने बांग्ला देश के गरीबों का जीवन और दृष्टिकोण हमेशा के लिए बदल दिया है। माइक्रोक्रेडिट नेटवर्क ने गरीबों के जीवन में बदलाव लाने के लिए एक ढांचा तैयार कियया है । ग्रामीण बैंक ने महिलाओं पर ध्यान केन्द्रित किया केवल इसलिए नहीं कि वे कर्ज का भुगतान ठीक ढंग से कर देती हैं बल्कि इसलिए भी कि महिलाओं के माध्यम से परिवार में जाने वाला कर्ज परिवारों में स्थायी बदलाव लाता है ।
अनुसंधान से पता चला है कि माइक्रोक्रेडिट कार्यक्रम में महिलाओं के शामिल होने से उनका सशक्तिकरण हुआ है । इस कार्यक्रम सें शामिल होने का फल यह हुआ है कि परिवार एवं समुदाय सें फैसला करने में महिलाओं की भूमिका अधिक होती है । उन्हेन कहीं आने – जाने की ज्यादा आजादी है तथा सामाजिक गतिविधियों एवं अन्य कार्यक्रमों में वे ज्यादा भाग ले सकती हैं। और इस सबके फलस्वरूप उनमें अधिक आत्मविश्वास पैदा हुआ है तेथा परिवार के भविष्य के प्रति आशा बढ़ी है।
माइक्रोक्रेडिट कार्यक्रम में महिलाओं के शामिल होने का बच्चों पर काफी प्रभाव पड़ा है। माताएं हमेशा अपने बच्चों को सर्वोच्च प्राथमिकता देती हैं। इसलिए पहले हम अपने बच्चों की ओर देखते हैं कि हमारे कार्यक्रम का उन पर कितना प्रभाव पड़ा है।
माइक्रोक्रेडिट कार्यक्रम में महिलाओं के शामिल होने का बच्चों पर काफी प्रभाव पड़ा है। माताएं हमेश अपने बच्चों को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है। इसलिए पहले हम अपने बच्चों की ओर देखते हैं कि हमारे कार्यक्रम का उन पर कितना प्रभाव पड़ा है।
हम हमेशा अपने सदस्यों के बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं तथा इन वर्षों में हमारे सभी सदस्यों के सभी बच्चों ने स्कूलों में दाखिला लिया है। केवल दाखिला ही नहीं लिया, ये बच्चे अपने क्लासों एवं स्कूलों के श्रेष्ठ छात्र बन गये हैं।
हमने अपने कर्जदारों के बच्चों को छात्रवृत्ति एवं छात्र ऋण देने शुरु किये और हमने पाया कि वे अपने पेशे में उच्चतम स्तर कर रहे हैं। ये बच्चे प्रथम पीढ़ी के हैं जो अपने परिवारों में शिक्षित हैं तथा पीढ़ी दर पीढ़ी गरीबी एवं निरक्षरता को खत्म करने के कगार पर है। बांग्लादेश की आवादी के आधे से अधिक लोग 20 साल सेकम आयु के हैं। यह हमारे लिए बहुत अच्छा अवसर है कि हम अपने युवाओं के भविष्य को उज्जवल बनाने में उनकी मदद करें।
माइक्रोक्रेडिट का विस्तार माइक्रोक्रेडिट ने गरीबी कम करने में अहम योगदान किया है। विश्वभर में करीब 10 करोड़ सबसे निर्धन लोगों को माइक्रोक्रेडिट की सुविधा का विस्तार उत्साहवर्द्धक है, फिर भी अभी भी इसका विस्तार तेजी से करने में अनेक कठिनाइयां हैं।
अभी भी बांग्लादेश एक मात्र ऐसा देश है जहां 75 प्रतिशत से अधिक गरीब परिवारों को माइक्रोक्रेडिट की सुविधा प्राप्त है। अधिकांश देशों में यह सुविधा 10 प्रतिशत गरीब परिवारों तक भी नहीं पहुंची है। वैश्विक गरीबी की समस्या से कारगर ढंग से निपटने के लिए प्रत्येक देश को अपने यहां 50 प्रतिशत गरीब परिवारों तक माइक्रोक्रेडिट की सुविधा मुहैया करानी चाहिए। बांगलादेश एवं अन्य देशों मं माइक्रोक्रेडिट के सिलसिले में दो महत्वरूर्ण पुद्दों पर बराबरविचार किया जाता है। ये हैं1. माइक्रोक्रेडिट कोवित्तीय सहायता तथा कानूनी एवं नियामक ढांटातंत्र । दोनों मुद्दे एक-दूसरे सेजुड़े हुए हैं। ग्रामीण बैंक जैसे कार्यक्रम तथा सेल्फ-हेल्फ ग्रुप प्रणाली के माध्यम से माइक्रोक्रेडिट कार्यक्रम बारत में गरीब लोगों को अर्थव्यस्था कीमुख्यधारा में लाने में मदद कर रहा है। मध्य वर्ग के समतल गरीबों को लाने के लिए उन्हें ये अवसर प्रदान किये बिना हम अपने देश के उज्जवल भविष्य की आशा नहीं कर सकते हैं।
गरीबों को वित्तीय सहायता देने के लिए भारत ने अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाये हैं । सरकार, नएजीओ तथा निजी क्षेत्र इसके लिए परस्पर सहयोग कर रहे हैं । सारे विश्व की नजर भारत पर लगी हुई है कि वह माइक्रोक्रेडिट के लिए आवश्यक वित्तीय तंत्र खड़ा करने तथा कानूनी एवं नियामक ढांचा तंत्र बनाने में पहल करे ताकि इस देश में यह कार्यक्रम आगे बढ़ सके ।
क्षेत्रीय सहयोग बांग्लादेश में हमने मानवीय विकास में काफी प्रगति की है । नवजात शिशुओं तथा माताओं की मृत्युदर में कमी आयी है । अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी के लिए हमने बहुत सारे अवसर पैदा किये हैं । बांग्लादेश के प्रवासी राष्ट्रीय खजाने में बड़े पैमाने पर योगदान कर रहे हैं । साथ ही दूर संचार में भी हमने काफी प्रगति की है । हमने ग्रामीण फोन के जरिए बांग्लादेश के हर गांव के गरीब महिलाओं को करीब 300,000 मोबाइल फोन मुहैया कराया है जिससे पूरे विश्व के सेाएथ उनका संपर्क स्थापित हो गया है । अब हम जनता तक सूचना एवं संचार तकनालॉजी पहुंचाने की कीशिश कर रहे हैं । इस संबंध में हमें भारत से बहुत आशा है जिसने भारत में और भारत के बाहर रहने वालों की प्रतिभा का इस्तेमाल सराहनीय ढंग से किया है ।
इस क्षेत्र में गरीबी उन्मूलन के लिए भारत और सार्क देशों से काफी उम्मीद है । इस संबंध में मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि कुछ ही दिनों में ग्रामीण बैंक मुंबई में अपना दफ्तर खोलेगा ताकि भारत में विकास संगठनों के साथ ग्रामीण संपर्क स्थापित कर सके ।
हमें आशा है कि बांगलादेश भारत के साथ मिलकर काम करेगा ताकि दोनों देशों के लोगों के लिए समृद्धि लायी जा सके । मैं यह कहता रहा हूं कि बांग्लादेश के चट्टागांव में एक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा के साथ एक बड़ा बंदरगाह बनाया जाना चाहिए ताकि इस क्षेत्र के सभी देश उसका लाभ उठा सकें ।
सभी सार्क देशों को जोड़ने के लिए एक हाईवे नेटवर्क बनाने की खुशी प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ मुझे भी है जिसमें बांग्लादेश चौराहे का काम करता है जो नेपाल, भूटान, पूर्वी भारत और पाकिस्तान तथा म्यमार, थाईलैंड और चीन को पूर्वी भाग से जोड़ता है ।
सीमाओं के खुलने तथा हाइवे के बनने से व्यापार बढ़ रहा है । हम इस क्षेत्र के सभी देशों के साथ आपसी विश्वास और सहयोग स्थापित कर सकते हैं ताकि जल प्रबंधन तथा क्षेत्र में बिजली के उत्पादन और वितरण की योजना बनाने की दिशा में हम काम कर सकें ।
खुशी की बात है कि इस क्षेत्र में पनबिजली उत्पादन की अपार क्षमता है । राजनीतिक संबंध सुधरने के साथ ही पारस्परिक लाभ हेतु बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और भारत से अपनी बिजली की मांग की पुर्ति कर सकता है । सामाजिक कारोबार मैं सोशल बिजनेस की बात करता रहा हूं जो बाजार में एक नये तरह का बिजनेस होगा जिसका उद्देश्य होगा विश्व में बदलाव लाना । मैं यह कहता रहा हूं कि सभी बिजनेस को जरूरी नहीं कि वह मुनाफा कमाने वाला हो । यह कह कर कि बिजनेस का मतलब है, जैसाकि इसका स्वभाव है, ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना और इसे स्वयंसिद्ध के रुप में अपना कर हमने एक ऐसे विश्व का निर्माण किया है जहां सामाजिक समस्याएं अभी भी बनी हूई हैं ।
एक सोशल बिजनेस का डिजाइन और संचालन इस प्रकार किया गया है जिससे उसके सारे लाभ उपभोक्ताओं के मिले । इससे मुनाफा कमाने वाला वसूल लाभ बढ़ाने के वसूल में बदल जाता है । एसबीई, मैं बिजनेस का लाभ वांछित ग्रुप को मिलता है बजाय इसके कि निवेशकों को मुनाफा मिले ।
सोशल बिजनेस में निवेश करने वाले निवेश पूंजी वापस ले सकते हैं लेकिन कंपनी से लाभांश नहीं ले सकते। जो मुनाफा होता है वह कंपनी में ही वापस चला जाता है ताकि वह अपना विस्तार कर सके तथा अपने उत्पाद या सेवा की गुणवक्ता बढ़ा सके । एक सोशल बिजनेस कंपनी ऐसी कंपनी होगी जिसमें न तो घाटा होगा और न ही लाभांश ।
पूरे विश्व में, विशेषकर अमीर देशों में युवा लोग सोशल बिजनेस के विचार को बहुत पसंद करेंगे क्योंकि इससे अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल करके कुछ कर दिखाने की चुनौती उनके पास होगी । सोशल बिजनेस के माध्यम से विश्व की सभी सामाजिक एवं आर्थिक समस्याएं हल हो पायेंगी । सोशल बिजनेस का महत्व इसलिए है क्योंकि इससे मानवजाति की मुख्य चिंताएं दूर तो सकती हैं । इससे विश्व जनसंख्या के 60 प्रतिशत लोगों का जीवन बदल सकता है तथा उन्हें गरीबी के दल-दल से बाहर निकालने में मदद मिल सकती है ।
यहां तक कि मुनाफा कमाने वाली कंपनियां भी गरीबों को पूर्ण या बहुमत मालिकाना हक देकर सोशल बिजनेस के रुप में बदल सकती है । यह द्वितीय स्तर का सोशल बिजनेस होगा । इसके मालिक गरीब लोग होंगे । गरीब लोग इन कंपनियों के शेयर दानकर्ताओं के उपहार के तौर पर या अपने पैसे से खरीद सकते हैं, तथा ये शेयर गैर-कर्जदारों को हस्तांतरित नहीं किये जा सकते । एक समर्पित पेशेवर टीम बैंक का रोजाना का संचालन करती है । द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय दानकर्ता आसानी से इस तरह का सोशल बिजनेस का निर्माण कर सकते हैं । जब कोई दानकर्ता किसी देश में पुल बनाने के लिए कर्ज या अनुदान देता है तो वह इसके बजाय एक “ब्रिज कंपनी” बना सकता है जिसके मालिक स्थानीय गरीब लोग होंगे । एक समर्पित मैनेजमेंट कंपनी का मुनाफा स्थानीय गरीबों को लाभांश के रुप में जायेगा तथा अधिक पुल बनाने के लिए खर्च किया जायेगा । इस से सड़कें, हाइवे, हवाई अड्डे, बंदरगाह तथा युटिलिटी कंपनियों जैसे अनेक बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं तैयार हो सकती हैं।
ग्रामीण ने प्रथम श्रेणी के ऐसे दो सोशल विजनेस तैयार किये हैं। एक है योगहर्ट फैक्टरी आहार मिल सके। यह डेनपन के साथ एक संयुक्त परियोनजा है। इसकी विस्तार तब तक जारी रहेगा जब तक बांग्लादेश के कुपोषण के शिकार सभी बच्चों को पोर्टिफाइड योगहर्ट नहीं मिल जाता । दूसरा है आंख के अस्पतालों की श्रृंखला । प्रत्येक अस्पताल प्रतिवर्ष औसतन 10,,000 मोतियाबिंद का ऑपरेशन करेगा जिसके लिए अमीरों एवं गरीबों को अलग-अलग शुल्क देने होंगे। मैं एक पृथक सोशल स्टाक मार्केट बनाने की वकालत करता रहा हूं जसमें केवल सोशल विजनेस के शेयर ट्रेड किये जायेंगे।
मैं वैश्वीकरण का समर्थन करता हूं और विश्वास करता हूं कि गरीबों का इससे अधिक भला हो सकता है बजाये इसके किसी अन्य विकल्प के। लेकिन वैश्वीकरण सही तरह का होना चाहिए। वैश्वीकरण को वैश्विक साम्राज्यवाद कदापि नहीं होना चाहिए। शक्तिशाली बहुराष्ट्रीय सोशल बिजनेश का निर्णय किया जा सकता है ताकि गरीब लोगों एवं गरीब देशों के लिए लाभ को बरकरार रखा जा सके।
मेरा मानना है कि सोशल बिजनेस, खासकर बहुराष्ट्रीय सोशल विजनेस पूंजीवाद के स्वाभाव में क्रांतिकारी परिवर्तन लायेगा जो मौजूदा समय में गरीबों के लिए न तो पर्याप्त अवसर पैदा करता है तथा भौतिकतावाद एवं उपभोक्तावाद के जरिए वैश्विक माहौल के लिए खरता बन गया है।
गरीबी से मुक्त समाज का निर्माण सहिष्णुता अहिंसा, मानवता के लिए करूणा तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के गांधी दर्शन से युक्त एक ढांचे के अंतर्गत हम एक ऐसे विश्व के निर्माण के लिए काम कर सकते हैं जिस पर हमारे पोतों-परपोतों को नाज हो।
हम एक ऐसे विश्व का निर्माण कर सकते हैं जहां हमें शांति मिल सके एक युद्ध से नहीं बल्कि संवाद और सहयोग के माध्यम से।
हम एक ऐसे विश्व का निर्माण कर सकते हैं जहां हमें शांति मिल सके एक युद्ध से नहीं बल्कि संवाद और सहयोग के माध्यम से।
हम एक ऐसे विश्व का निर्माण कर सकते हैं जहां हम संसाधनों का इस्तेमाल हथियारों को खरीदने के बजाच गरीबों का जीवन बेहतर बनाने के लिए कर सकते हैं। हमएक ऐसे विश्व का निर्माण कर सकते हैं जो समृद्धशाली हो तथा जिसमें हम सभी शांति से रह सकें।
हम एक ऐसे विश्व का निर्माण कर सकते हैं जहां हर व्रयक्ति को अपनी असीम क्षमता के प्रदर्शन का अवसर मिल सकता है। हम एक ऐसे विश्व का निर्माण कर सकते हैं। जहां गरीबी केवल संग्रहालय की वस्तु बन कर रह जाए।
आइये, हम सभी ऐसे विश्व का सपना देखें तथा इसे साकार बनाने के लिए मिलकर काम करें। (लेखक ग्रामीण बैंक, बांग्लादेश, के संस्थापक हैं । नोबल पुरस्कार विजेता)
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