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सूर्योदय |
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सूर्योदय |
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घर-बाहर को एक साथ साधती कविताएं
(सूर्योदय में अब तक आप दो रचनाकारों को पढ़ चुके हैं । इस बार प्रस्तुत है सुलभा की कविताएं । सुलभा की कविताएं घर-बाहर को एक साथ साधती हैं । यहाँ नारी विमर्श है पर वहाँ पारंपरिकता को अनिवार्यतः लांघने का जोर-जबरन नहीं है । कविता को वे कविता की तरह लेती हैं । शायद इसीलिए उनके यहाँ एक काव्यभाषा भी साफ-साफ पहचान बना रही है । इस मायने में उनकी कविताओं में गद्यात्मक शुष्कता नहीं है । एक सरस आमंत्रण है - रसात्मक आकर्षण । कथ्य के लिए चीजें उनके यहाँ आसपास से ही आती हैं, उन्हें वे एक स्त्री होने के दबाब से भी देखती होंगी पर वे जब कविता में प्रवेश करती हैं तो पर एक नये मुहावरे की तरह, एक नयी चमक के साथ । बिंब, उपमा और रस के जितने भी आयाम तय किये गये हैं या जिनके बिना कविता कविता नहीं बन पाती वे सुलभा के यहाँ भी हैं एक निजी अनुभव के रूप में । ऐसे दौर में जब कविता की पहचान सिर्फ उसकी काव्यभाषा के शर्त पर ही होने लगी है शेष औजारों को नज़रअंदाज किया जा रहा है, सुलभा की कवितायी दुनिया आश्वस्त करती है कि कविता का स्थापत्य आलोचकों से तय नहीं होगा बल्कि वह अपने आप नये और निहायत मौलिक कवियों के सहारे निरंतर प्रवहमान बना रहेगा । यह कवितायी की परंपरा होते हुए भी आधुनिकता है एक कवि के लिए और कविता के लिए भी । - संपादक)
माँ दिये-सी जलती रही तुम रोशनी में नहाते रहे हम झरने-सी बहती रही तुम फुहारों में भींगते रहे हम अपने स्वेद से धरा की प्यास बुझाती रही तुम फसलों का स्वाद चखते रहे हम चंदन-सी घिसी जाती रही तुम
खुशबु से सराबोर होते रहे हम इक्कीसवीं सदी न जाने कहाँ खो गया वह स्वाद वे कच्ची-सी अमियाँ वे अधपकी इमलियाँ वे मीठे-से तेंदू वह अधपका-सा अचार वह तपती दुपहरी वह हल्की-सी आँधी छोटी-सी टोकरी में इमलियाँ भरते नन्हें हाथ वह घना आम्र कुँज वह तालाब का किनारा वह पलक झपकते कटती गर्मी की दोपहर वह स्वाद ढूँढ़ती हूँ, मैं पाऊचों में बंद फास्ट-फूड खट्टी इमली-स्वाद खजूर आँवलों और फ्रूटी के बंद डिब्बों में
औरत आदमी के गुस्से को बिस्तर की तरह ओढ़ती-बिछाती है औरत उसके अभिमान को अपने काँधे पर ढोती है औरत उसके प्यार के सहारे जीती है औरत उसके हर मुकाम पर ख़ामोशी से खड़ी रहती है औरत उसके वज़ूद को अपने त्याग से सींचती है औरत
उस अनाम लड़की के नाम उस अनाम लड़की के नाम जो बे-बात खिलखिलाती है जिसकी हँसी झरने-सी बहती है जो पहाड़ो पर भी कूदफाँद करती है जो जंगलों में गिलहरी-सी फूदकती है आँखों में हजारों स्वप्न लिये बेबाक घूमती है साक्षात् देवी रूप शक्ति की अवतार खेलने दो, बहने दो, हँसने दो बाँधों मत उसे बंधन में मत मुरझाने दो कली को मत बिखरने दो उसके सपनों को सूख न जाय कलकल निनाद करता स्वच्छ अमृत-सा पानी देता झरना कहीं
ख़ामोशी से न ही कोई आहट होती न हो कोई शोर बहुत चुपचाप टूट जाता है एक आदमी सब कुछ यथावत चलते रहता है फ़िरकापरस्त ताकतें एकजूट हो खुशियाँ मनाती हैं अपनी जीत पर टूटने वाला सिर्फ़ अकेला होता है कोई नहीं होता उसका हमसफ़र और न ही ज़माने को हो पाती है इसकी ख़बर
एफ-88/25, सेकेंड स्टाप, तुलसी नगर, भोपाल, मध्यप्रदेश
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