|
|
||||||||||||||
|
|
||||||||||||||
|
|||||||||||||||
|
◊अपनी बात◊कविता◊छंद◊ललित निबंध◊कहानी◊लघुकथा◊व्यंग्य◊संस्मरण◊ कथोपकथन◊ भाषांतर◊संस्कार◊पुस्तकायन ◊बचपन◊हलचल◊विशेषांक◊सृजनधर्मी◊लेखकों से◊संपादक बनें◊चतुर्दिक्◊शेष-विशेष◊पुरातनअंक◊अभिमत◊मुख्यपृष्ठ |
|
|||||||||||||
|
संस्कार |
|
संस्कार |
|||||||||||||
|
उपन्यास की संरचना और विषय का सम्बन्ध गोपाल राय
किसी भी कला में उसकी संरचना का विषय से अनिवार्य और घनिष्ठ सम्बन्ध होता है । विषय से अलग संरचना की कल्पना असम्भव है; उसका अस्तित्व ही विषय सापेक्ष होता है । यद्यपि कुछ आलोचक, जिनमें हिन्दी के नामवर सिंह भी हैं, विषय को ही रुप का अनुवर्ती मानते हैं, पर यह मान्यता तर्कसंगत नहीं है । विषय के बिना रुप का अस्तित्व उसी प्रकार सम्भव नहीं है, जिस प्रकार आत्मा के बिना शरीर का । यदि द्रव्य (मैटर) को भी मूल तत्व मानें तो उसका रुपायन नाना प्रकार की वस्तुओं में होता है । इससे रूप का ही विषय का अनुवर्ती होना सिद्ध होता है । इसके साथ यह भी कम सच नहीं है कि संरचना की विशिष्टता के चलते ही विषय-विशेष को वैशिष्ट्य प्राप्त होता है । विषय और संरचना दोनों परस्परावलम्बी हैं । ‘घी का लड्डू टेढ़ा भी भला’ कहावत अपनी जगह ठीक है, पर घी का लड्डू सुडौल भी हो तो उसका आकर्षण निश्चय ही अधिक होता है । एक उदाहरण से इसकी पुष्टि की जा सकती है । एक मन्दिर का रूप वही नहीं होता, जो मस्जिद या गिरजाघर का होता है । व्याख्यान-कक्ष की बनावट शयन-कक्ष या पुस्तकालय या दूकान की बनावट से भिन्न होती है । यदि मन्दिर की संरचना लेकर शयन-कक्ष का निर्माण किया जाए तो या तो सामग्री का अपव्यय होगा या उसमें नींद नहीं आएगी । यही बात और भी जटिलता के साथ कला-वस्तुओं पर लागू होती है । उपन्यास के ‘रूप’ पर विषय का प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता । साथ ही यह भी उल्लेख है कि कला के रूप या आकार की सार्थकता विषयानुकूलता में है । कुछ आलोचक ‘विषय’ पर ‘रूप’ को तरजीह देने की बात करते हैं । कुछ का यह भी कहना है ‘रूप’ का चुनाव कर लेने पर कथ्य उससे निर्देशित हुए बिना नहीं रहता । पर यह कथन तर्कसंगत नहीं है ।
महान कलाकार ‘रूप’ का चुनाव पहले नहीं करते । पहले ‘रूप’ का चुनाव करने का अर्थ यह है कि वह पहले से कहीं विद्यमान है, अर्थात् बासी है । ‘विषय’ भी स्वयं में नया नहीं होता । उसमें नयापन तब आता है जब वह कलाकार के विजन से उद्भासित होता है । कोई वस्तु या विजन में परिणत नहीं होता और उसे उसके अनुरूप आकार नहीं मिलता तो उसकी उत्तमता बाधित हो जाती है । कलाकार का विजन अपना ‘रूप’ स्वयं ही ढूंढ लेता है । यदि कलाकार ऐसा करने में समर्थ नहीं होता और वह कहीं से उधार लेकर या किसी अन्य कलाकार का अनुकरण करके अपनी कला के ‘रूप’ का निर्धारण करता है तो निश्चय ही वह श्रेष्ठ कलाकार नहीं हो सकता ।
अतः उपन्यास की संरचना का विवेचन करते समय सर्वप्रथम उसके विषय या केन्द्र का निर्धारण अनिवार्य है । तोलस्तोय के युद्ध और शांति के विषय में आलोचकों का मत है कि वह एक महान रचना तो है, पर उसकी संरचना दोषपूर्ण है । इस कथन में विरोधाभास दीखता है । पर वास्तविकता यह है कि युद्ध और शांति अपवाद की श्रेणी की एक असाधारण रचना है । पर्सी लब्बॉक के अनुसार युद्ध और शांति में सामग्री का दुरुपयोग करके भी महान बना रहता है । युद्ध और शांति की संरचना का दूसरा दोष यह माना जाता है कि उसमें दो विषय एक दूसरे से चिपके हुए हैं । संरचना के एकल सौंदर्य के लिए उपन्यास के केन्द्र में एकल कथ्य का, चाहे वह जितना भी फैला हुआ और युगव्यापी क्यों न हो, होना जरुरी है । युद्ध और शांति में तोल्सतोय एक तरफ यौवन और उम्र की कहानी कहता है और दूसरी तरफ उसमें रूसी इतिहास के एक संकटपूर्ण संघर्ष को चित्रित करने का प्रयास भी दिखाई पड़ता है । पहली कहानी में कुछ युवकों और उनकी संवेदनाओं की कहानी कही गयी है, जो युवावस्था को पार कर प्रोढावस्था में पहुँच जाते हैं । समय का जगन्नाथी चक्का एक चौथाई या उससे भी कुछ कम घूम जाता है । इस कालचक्र की गतिमानता युद्ध और शांति में अत्यन्त प्रभावशाली रूप में व्यंजित हुई है । दूसरी तरफ इतिहास के संकटपूर्ण संघर्ष का, जिसमें नेपोलियन और कुतुजोव तथा असंख्य सेनाध्यक्षों की गतिविधियाँ प्रस्तुत की गयी हैं, अंकन भी उतने ही प्रभावशाली ढंग से हुआ है । पर्सी लब्बॉक के अनुसार यदि तोल्सतोय इन दो विषयों के आधार पर दो उपन्यास लिख डालता तो भी उसकी अद्वितीयता में कोई कमी नहीं आती । इन दोनों को मिलाकर भी उसकी महानता अक्षुण्ण है । तोल्सतोय ने अपने समस्त अनुभव को उसकी विशालता और वैविध्य में ही रख दिया है; चयन और छँटाई को, जो संरचना की आवश्यक शर्त मानी जाती है, उसने आवश्यक नहीं समझा है । इसे ‘जबरदस्त की लाठी’ कहा जा सकता है । तोलस्तोय के अनुभव का संसार इतना विशाल और वैभवपूर्ण तथा उनकी संवेदना इतनी गहरी और सर्वातिशायी है कि संरचना की कमजोरी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाती । हिन्दी में इसके उदाहरण कबीरदास हैं जो कविता के रूप पक्ष की अवमानना करके भी अपनी संवेदना और सच के प्रति कठोर निष्ठा के कारण महान कवि बने रह जाते हैं ।
युद्ध और शांति ऐसा उपन्यास है जिसमें जीवन का सैलाब उमड़ता हुआ सा प्रतीत होता है । यदि कोई उपन्यास जीवन के समान ही व्यापक और वैविध्यपूर्ण हो सकता है, तो उसका एक मात्र उदाहरण युद्ध और शांति ही हो सकता है। तोल्सतोय की जीवन पर महान पकड़ का कोई अन्त नहीं दीखता । वह जीवन के एक क्षेत्र के बाद दूसरे क्षेत्र को प्रस्तुत करने के लिए सदा प्रस्तुत रहता है। इसके साथ ही वह प्रत्येक दृश्य के सूक्ष्म ब्यौरों और पात्र विशेष की सूक्ष्मतम विशेषताओं को भी अद्भुत सुकुमारता और यथार्थता के साथ अभिलेखित करता है । पर्सी लब्बॉक आश्चर्य के साथ स्वीकार करते हैं कि इतने वृहत् पैमाने पर प्रभावशाली रचना असम्भवप्राय है, पर तोलस्तोय से कहाँ चूक हुई है, इसे बताना बहुत मुश्किल है । चरित्रों पर उसकी पकड़ अद्वितीय है । दृश्यों और प्रसंगों की अन्तहीन श्रृंखला में कहीं कोई त्रुटि नजर नहीं आती । कथा संसार धीरे धीरे खुलता है और पाठक उसके साथ बिना किसी तरह का सन्देह किए बढ़ता जाता है । इस बहाव में इस बात का पता तक लगाना कठिन हो जाता है कि उपन्यास का विषय क्या है ?
इसके लिए हमें पहले युद्ध और शांति की कहानी पर ध्यान देना होगा । सर्वप्रथम इस कहानी में कतिपय पीढ़ियों के जीवन की विभिन्न मंजिलों की श्रृंखला दीख पड़ती है । जवानी प्रौढा़वस्था में बदल जाती है, वैभव आपस में मिलते हैं, टकराते हैं और पुनर्निर्मित होते हैं । कुछ की आशाएँ पनपती हैं, मुरझाती हैं, और फिर दूसरों के जीवन में प्रकट होती हैं; एक पूरी पीढ़ी समाप्त हो जाती है और जीवन की मशाल युवा पीढी़ को पकड़ा देती है । इस प्रकार पीढ़ियों के गतिशील जुलूस का अंकन ही युद्ध और शांति का लक्ष्य है । उपन्यास में प्रस्तुत युवा पात्र आकृति, प्रकृति, बुद्धि और भावदशा में एक दूसरे से भिन्न हैं, पर उनका यौवन सार्वभौम और सार्वकालिक है । रोस्तोव-परिवार यौवन के संगीत के अनुगुंजित है । एंड्रियु और पीटर बेजुकोव जैसे उदार और समृद्ध युवकों तथा नताशा जैसी संवेदनशील और प्यारी लड़कियों से, जो नयी पीढ़ी में अपनी जगह बनाने के लिए बेताब हैं, उपन्यास भरा हुआ है । इस तरह के परिव्याप्त विषय का नाटकीय रुप में प्रस्तुत करना किसी महान् प्रतिभा के लिए ही सम्भव है, और वह तोल्सतोय में है ।
उल्लेखनीय है कि इस नाटक में युद्ध और शांति, उपन्यास का शीर्षक होने पर भी, केन्द्रीय विषय नहीं है । नेपोलियन और रूस के बीच युद्ध के ऐतिहासिक दृश्य की योजना मूल नाटक की पृष्ठभूमि के रुप में ही हुई है । यौवन और वय के ज्वार-भाटे का विक्षोभ एक आकस्मिक घटना है, जो शांत हो जाता है । इसके बरक्स यौवन और उम्र की कहानी एक शाश्वत सत्य है, जिसका कभी अन्त नहीं होता । लब्बॉक के अनुसार तोल्सतोय एक तरफ तो मानव जीवन की शाश्वत कहानी लेते हैं, और फिर मानो उससे सन्तुष्ट न होकर एक महान ऐतिहासिक संघर्ष का चित्रण करने लगते हैं। वे जैसे इस बात से अवगत ही नहीं हैं कि वे एक साथ दो उपन्यास लिख रहे हैं । लब्बॉक तोल्सतोय की महान् प्रतिभा के सामने नतमस्तक होते हुए यह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने दो अविस्मरणीय महाकाव्यों को इस प्रकार आपस में गूंथ दिया है कि उन्हें एक-दूसरे से अलग करना असम्भव है । वे युद्ध और शांति की तुलना इलियड और एनीड से करते हुए कहते हैं कि यह इलियड की तरह कुछ व्यक्तियों की कहानी भी है और एनीड की तरह राष्ट्र की गाथा भी । पर लब्बॉक मानते हैं कि तोल्सतोय ने इन कहानियों को साभिप्राय एकबद्ध नहीं किया है । उनके अनुसार इसकी पुष्टि उपन्यास से नहीं होती; उसमें कोई ऐसा कोण नहीं दिखाई देता, जहाँ दोनों कहानियाँ आपस में मिलती और किसी एकल मनःप्रभाव में विलीन हीते हों, इनमें से कोई भी गौण नहीं है । समय-समय पर बिना किसी स्पष्ट तर्क और बिना किसी पूर्व पीढ़ी के प्रेम और महत्वाकांक्षा की कहानी कहता है और दूसरी कहानी में सेनाध्यक्ष, सामन्त और सम्राट रंगमंच पर उपस्थित होते हैं । पहली कहानी जो अब तक केन्द्र में थी, किनारे पड़ जाती है; बहुत दूर तक उसके दर्शन ही नहीं होते । इस प्रकार पर्सी लब्बॉक के अनुसार युद्ध और शांति में दो आकल्पनों या डिजाइनों का घालमेल हो गया है । इसमें केन्द्र का अभाव है । इसके बावजूद लब्बॉक बार बार इस बात को दुहराते थकते नहीं कि युद्ध और शांति विश्व के महानतम उपन्यासों में एक है । उनके अनुसार यह जीवन का ऐसा चित्र है, जो अपने वैभव और सौंन्दर्य में अद्वितीय है ।
पर्सी लब्बॉक किंचित् निराशा के स्वर में कहते हैं कि युद्ध और शांति में ‘साफ और सुसंगत’ रुप का अभाव है। काश ऐसा न होता । पर लब्बॉक की निराशा का कारण शायद यह है कि वे उन्नीसवीं शताब्दी की उपन्यासों की यथार्थवादी संरचना से अभिभूत या बेहद प्रभावित हैं । वे मानते हैं कि उपन्यास में किसी न किसी रुप में संरचना का सुगठित और सुडौल होना जरूरी है । यदि उन्होंने महाभारत पढ़ा होता तो देखा होता कि कैसे कथा-रचना बिखरी हुई प्रतीत होने पर भी महान् हो सकती है । जैसे ब्रह्मांड के सौन्दर्य से अभिभूत होने पर भी उसके आकल्पन को समझना कठिन है, उसी प्रकार महाभारत या युद्ध और शांति जैसी कथा-रचनाओं के आकल्पन को समकालीन रचनाओं के निकष पर आँकना मुश्किल है । कोई रचना जीवन जैसी ही विराट् और मनुष्य के बनाए नियमों से परे हो तो इसे उसका दोष नहीं माना जा सकता । जीवन एक साथ ही शाश्वत भी है और क्षणिक भी । शाश्वत यदि अपनी विशालता में अभिभूत करने वाला है तो क्षण अपनी गहनता में बेधने वाला । दोनों को एक साथ, और समान उदातत्ता के साथ, चित्रित करने के लिए महर्षि व्यास या महामना तोल्सतोय जैसी प्रतिभा और असाधारण अनुभव-सम्पदा चाहिए । वे इस बात की चिन्ता नहीं करते कि आप उन्हें उपन्यासकार मानें ही । उनके मूल्याँकन के लिए प्रचलित कसौटियाँ पर्याप्त नहीं हो सकतीं । अतः यदि लब्बॉक को युद्ध और शांति के ‘केन्द्र’ नहीं दिखाई देता तो यह उपन्यास के ‘रूप’ की कमजोरी नहीं है । वह केन्द्र से परिधि की ओर अग्रसर होनी वाली रचना नहीं है । वह एक ऐसे बृहद् वृत्त की तरह है जिसमें अनेक छोटे-बड़े वृत्त किसी अदृश्य केन्द्र से जुड़े हुए हैं । युद्द और शांति में यह केन्द्र है मनुष्य की नियति जो व्यक्तियों को ही नहीं, बल्कि पूरे परिवेश को भी नचाती है । युद्ध और शांति के पात्र - प्रिंस एन्ड्रियु, नताशा, पीटर बेजुकोव आदि - उसी प्रकार नियति के समक्ष विवश हैं, जैसे अपनी पहचान के लिए संघर्ष करते हैं, सामन्ती परिवार अपने अन्तर्विरोधों में जीते और दुःख झेलते हैं, नेपोलियन अपनी साम्राज्य-लिप्सा और कल्पित शक्ति के नशे में अन्धा है, रुस आत्मरक्षा की लड़ाई में सन्नद्ध है । इन सबमें नियति के अलावा दूसरा केन्द्र क्या हो सकता है ? जैसे महाभारत का केन्द्र ‘धर्म’ और उसके लिए युद्ध है, उसी प्रकार युद्ध और शांति का केन्द्र ‘नियति’ और उससे व्यक्ति और राष्ट्र का संघर्ष है ।
अब हम इस दृष्टि से हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ माने जाने वाले उपन्यास गोदान पर विचार करें । गोदान एक श्रेष्ठ उपन्यास तो है, पर उसकी तुलना युद्ध और शांति से नहीं की जा सकती है । गोदान में परतंत्र भारत के कृषक जीवन और ग्राम संस्कृति की करुण गाथा अत्यन्त सजीव और मार्मिक रुप में चित्रित है । इसका केन्द्रीय कथ्य है, उपनिवेशकालीन भारतीय समाज का शोषणचक्र । यदि इसी कथ्य को केन्द्र में रख कर गोदान की संरचना निर्मित की गयी होती तो ‘रूप’ की दृष्टि से भी यह उपन्यास निर्दोष होता । पर इस केन्द्रीय अभिप्राय के साथ प्रेमचन्द्र की एक आदर्शवादी धारणा भी जुड़ गयी है । यह आदर्शवादी धारणा नारी विषयक है । प्रेमचन्द्र के अनुसार समाज में नारी का स्थान घर के भीतर हैं वह पुरुष की प्रतिद्वन्द्वी होकर नहीं, पूरक बन कर समाज को पूर्णता प्रदान कर सकती है । नारी को ममता, स्नेह, दया, करुणा, मातृत्व, त्याग, बलिदान आदि गुणों से सम्पन्न होना चाहिए । एक दूसरा आदर्श प्रेम विषयक है । मालती-मेहता और खन्ना की कहानी के मूल में यही आदर्श निहित हैं, जो मूल कहानी से उपनिवेशीकृत भारतीय समाज में व्याप्त शोषणचक्र-बेमेल होने के कारण ऊपर से चिपकाई हुई सी जान पड़ती है । नलिनविलोचन शर्मा के अनुसार गोदान में भारतीय ग्राम जीवन और नगर जीवन का साथ साथ समानान्तर रुप में चित्रण हुआ है, अतः इसके लिए प्रेमचन्द ने कथा की ‘समानान्तर संक्रमण प्रविधि’ का प्रयोग किया है । यह व्याख्या तब सटीक होती जब प्रेमचन्द ने ग्राम जीवन का अंकन तो उसकी समग्रता में हुआ है, पर नगर जीवन का चित्रण बहुत गौण होकर रह गया है । लखनऊ शहर और प्रो. मेहता, मि. खन्ना, मिर्जा साहब, मालती और उसका परिवार, पं. ओकारनाथ आदि नागरिक पात्र उपन्यास में आते तो हैं, पर उनका नागरिक जीवन अपनी सम्पूर्णता में उपन्यास का विषय नहीं बन सका है । उसके स्थान पर कथाकार का नारी और प्रेम विषयक सिद्धान्त ही, जो किसी गम्भीर चिन्तन और विमर्श का बोध नहीं कराता, दूसरी कथा का विषय बन गया है । इस कारण नगर जीवन वाली कथा मूल कथा से अलग-थलग पड़ गयी है । युद्ध और शांति की तरह गोदान की कथाएँ एक ही वृहत् आकल्पन का अंग नहीं बन सकी हैं ।
कथा का सर्वोत्तम रूप (फॉर्म) वह होता है, जिसमें विषय का उपयोग सर्वोत्तम रूप में हुआ हो। सामग्री का अपव्यय और अभाव दोनों का कला के लिए दोष है। सुनिर्मित उपन्यास वह है, जिसमें विषय और रूप अविभाज्य और परस्परावलम्बी होते हैं; जहाँ सामग्री ‘रूप’ में पूर्णतः खप जाती है और ‘रूप’ समस्त सामग्री को अभिव्यक्त करता है। जहाँ दोनों में असामाजस्य या विरोध देखाई पड़े, वहाँ दो ही बातें सम्भव हैं : या तो सामग्री अत्यधिक है या उसका अभाव है। पर्सी लब्बॉक के अनुसार युद्ध और शान्ति में ‘विषय का अपव्यय’ हुआ है। इसके शिथिल ‘रूप’ के सम्बन्ध में यही सबसे बड़ी आपत्ति हो सकती है। उपन्यास का रूप विषय का आयत्त करने में असफल रहने का कारण बिखर गया है। बहुत से लोग इससे सहमत भी हैं; पर ऐसा होने पर युद्ध और शान्ति को महान रचना मानने का तर्क नहीं बनता । पर गोदान के प्रसंग में यह सच नहीं है। गोदान में सामग्री के अपव्यय की बात नहीं की जा सकती, पर मूल विषय के साथ एक पूर्वाग्रह युक्त आदर्श जोड़ देने के कारण उसकी संरचना एकलता का प्रभाव पैदा करने में असफल रह जाती है।
किसी उपन्यास में विषय का एकलपन है या नहीं, इसे जानने के लिए यह कसौटी अपनानी चाहिए कि उपन्यासकार का अभिप्राय एक वाक्य में रखा जा सकता है या नहीं । यदि यह अभिप्राय एक वाक्य में संघनित किया जा सके तो समझना चाहिए कि वह ‘एक’ है। यह मान्यता कथ्य के आकार कथ्य के आकार अथवा जटिलता पर निर्भर नहीं करती । कार्य-व्यापार चाहे सरल हो अथवा प्रसंगों का विस्तृत तन्तुजाल, कहानी में कोई एक पात्र हो अथवा व्यापक और उलझे हुए सम्बन्घ-सूत्रों में जुड़ा जनसमूह, यदि उसे दसेक शब्दों में व्यक्त किया जा सके तो वह विषय की एकता का द्योतक होगा। पुस्तक का ‘रूप’ इसी पर आधृत होता है और इसे तय किए बिना किसी उपन्यास की संरचना के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता । महाभारत, और मेरी दृष्टि में युद्ध और शान्ति भी, इस कसौटी पर खरे उतरते हैं, इसलिए उनकी संरचना के सम्बंन्ध में ऐकमत्य न होने पर भी आश्वस्त हुआ जा सकता है। तोल्सतोय महान् प्रतिभा से सम्पन्न आपवादिक उपन्यासकार हैं, इस कारण ऊपर से अव्यवस्थित प्रतीत होने पर भी युद्ध और शान्ति में एक अनभिज्ञेय व्यवस्था है। पर गोदान के बारे में यह बात नहीं कही जा सकती । यदि उसमें केवल उपनिवेश कालीन शोषण-चक्र को प्रस्तुत करने वाली होरी और उसके गाँव की तथा रायसाहब, खन्ना और गोबर की कथाएं होती तो इसकी संरचना सर्वथा निर्दोष होती । पर मालती-मेहता और खन्ना-गोविन्दी की आदर्श नारी आर आदर्श प्रेम की लेखकीय मान्यता को निदर्शित करने वाली कहानी उस पुरानी लता की तरह हो गयी है जो वृक्ष से सटी हुई होने पर भी अपने अलग अस्तित्व की घोषणा करती रहती है।
हिन्दी में भी संरचना की दृष्टि से निर्दोष उपन्यासों की कमी नहीं हैं। जैनेन्द्र के त्यागपत्र, अज्ञेय के नदी के द्वीप, हजारी प्रसाद द्विवेदी के बाणभट्ट की आत्मकथा, रेणु के मैला आँचल, अमृतलाल नागर के मानस का हँस, मन्नू भंडारी के महाभोज आदि की संरचना प्रायः निर्दोष है और इसका एक कारण यह भी है कि इनके कथ्य स्वयं में पूर्ण और ‘एक’ हैं। दूसरी खिलेगा तो देखेंगे, दीवारी में एक खिड़की रहती थी, विमल उर्फ जाएँ तो जाएँ कहाँ, मायालोक, परछाई नाच जैसे उपन्यास हैं, जिनमें ‘विजन’ की नगण्यता के कारण संस्चना का जाल कौतुक बन कर रह गया है। जो साहित्य को ‘कौतुक’ ही मानते हैं, उनके लिए इस उपन्यासों की संरचना श्रेष्ठ हो सकता है, पर जो साहित्य को जीवन की वस्तु मानते हैं, उनके लिए इन्हें ग्रहण करना कठिन होता है।
एच-2 यमुना, इन्गू. मैदान गढ़ी. नई दिल्ली-1110068
|
|||||||||||||||
|
|||||||||||||||
|
|
|||||||||||||||
|
|||||||||||||||
|
|||||||||||||||