रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 12, मई, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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लंदन की डायरी

सृजनगाथा का एक साल

सहभागी लेखकों को बधाई

 लंदन की डायरी

 

दि‍ग दि‍गन्‍त में गूंज रही है,हि‍न्‍दी बानी


राकेश बी. दुबे

 


(राकेश बी. दुबे जी अताशे, हिंदी और संस्कृति, भारतीय उच्चायोग में लंदन में कार्यरत हिंदी अधिकारी हैं । वे ब्रिटन में न केवल प्रशासकीय तौर पर अपितु आत्मीय ढंग से हिंदी और हिंदी की संस्कृति के उन्नयन के लिए सक्रिय हैं । उत्तरप्रदेश में जन्में श्री राकेश की कई किताबें प्रकाशन को तैयार हैं । इस अंक से वे सृजनगाथा के लिए खास तौर पर लंदन की डायरी नामक स्तम्भ लिख रहे हैं जिसमें ब्रिटेन में विकासमान हिंदी की सरल पड़ताल होगी । सृजनगाथा परिवार से आत्मीयता से जुड़ने के लिए हम उनका आभार व्यक्त करते हैं - संपादक )


 

 

ह बता पाना तो कठि‍न है कि‍ भारत की आर्थि‍क प्रगति‍ से आकर्षि‍त होकर और उसके बारे में ज्‍यादा से ज्‍यादा जानने की, उससे सम्‍पर्क करने की आवश्‍यकता के कारण या फि‍र दुनि‍यां में दूसरी सबसे ज्‍यादा बोली जाने वाली भाषा के रुप में अपनी उपस्‍थि‍ति‍ दर्ज कराने के कारण हि‍न्‍दी के बारे में लोगों की जि‍ज्ञासा बढ़ी है अथवा वैश्‍वीकरण और उदारीकरण की व्‍यवस्‍थाओं के कारण भारत जैसे बड़े बाजार तक अपनी पहुँच बनाने के लि‍ए हि‍न्‍दी की उपेक्षा न कर पाने के कारण ऐसा हुआ है । लेकि‍न यह हुआ अवश्‍य है कि‍ हि‍न्‍दी को भारतवंशी प्रवासी ही नहीं अपि‍तु वि‍देशी लोग और संस्‍थाएं भी जानने और पहचानने का प्रयास नए सि‍रे से करने लगे हैं । ये प्रयास वि‍देशों में सरकारी स्‍तर पर तो अमेरि‍का जैसे एक दो देशों में ही प्रारम्‍भ हुए हैं परन्‍तु यू के सहि‍त अनेक देशों में जहां स्‍थानीय सरकार के स्‍तर पर और वि‍श्‍ववि‍द्यालयों के स्‍तर पर कुछ उदासीनता आई है वहीं नि‍जी स्‍तरों पर और प्रवासी भारतीयों के बाहुल्‍य या जमघट वाले नगरों/उप नगरों में हि‍न्‍दी से जुड़ने के प्रयासों में नि‍श्‍चि‍त रुप से बढ़ोत्‍तरी हुई है ।

 

      वर्ष 2005 में जब ग्रेटर लन्‍दन अथॉरि‍टी ने हि‍न्‍दुओं के सबसे महत्‍वपूर्ण त्‍यौहार दीवाली के उपलक्ष में, यहां पर्यटक आकर्षण के एक प्रमुख केन्‍द्र ट्रेफल्‍गर स्‍क्‍वेयर पर एक समारोह का आयोजन कि‍या, तो लोगों के लि‍ए यह सुखद आश्‍चर्य का वि‍षय बना । हि‍न्‍दी एवं संस्‍कृति‍ जैसे दायि‍त्‍व से जुड़े होने के कारण मुझे भी इस की जानकारी मि‍ली और यह भी पता चला कि‍ इस अवसर पर वहां एक ध्‍येय वाक्‍य भी प्रदर्शित कि‍या जाएगा । कुछ प्रयास मैंने कि‍ए और यह तय हुआ कि‍ यह ध्‍येय वाक्‍य अंग्रेजी के अलावा हि‍न्‍दी में भी प्रदर्शि‍त कि‍या जाए । इस वि‍नम्र प्रयास का परि‍णाम आप नीचे दि‍ए गए चि‍त्रों में देख सकते हैं :

 

  

 दीवाली पर ट्रेफल्‍गर स्‍क्‍वेयर का एक दृश्‍य । पृष्‍ठभूमि‍ में ध्‍येय वाक्‍य अंग्रेजी में ।

 

ध्‍येय वाक्‍य हि‍न्‍दी में ।

 

सुनसान ट्रेफल्‍गर स्‍क्‍वेयर ।

 

 ऐसा ही एक और अवसर हाल ही में तब आया जब कोवेन्‍ट गार्डन के वि‍श्‍व प्रसि‍द्ध रॉयल ओपेरा हाउस में एक अंग्रेजी कवि‍ता को थीम की तरह प्रयोग करते हुए वि‍श्‍व की प्रमुख भाषाओं में उसका अनुवाद प्रदर्शि‍त करने का नि‍र्णय लि‍या गया । 6 पंक्‍ति‍ की इस कवि‍ता का हि‍न्‍दी अनुवाद उपलब्‍ध कराकर और कवि‍ता की प्रथम पंक्‍ति‍ को रॉयल ओपेरा हाउस में 21 से 25 फरवरी, 2007 तक जगमगाता देखकर मुझे तो हार्दिक प्रसन्‍नता अनुभव हुई ही, मुझे वि‍श्‍वास है कि‍ प्रत्‍येक हि‍न्‍दी प्रेमी इसे देखकर सुख का अनुभव करेगा ।

 

 

 

कोवेन्‍ट गार्डन, लन्‍दन में रॉयल ओपेरा हाउस का बाह्य दृश्‍य । 21 से 25 फरवरी, 2007 तक ।

Rakesh B. Dubey
Hindi & Cultural Officer
High Commission of India, London

 

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