रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 12, मई, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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लघुकथा

सृजनगाथा का एक साल

सहभागी लेखकों को बधाई

 लघुकथा

 

चेतन आर्य की तीन लघुकथाएं

खाना और नींद


र्षों बाद गाँव जाना हुआ । सुबह गाँव की गलियों में घूमने निकल पड़ा । देखा - गाँव के दो बच्चे फटे कपड़े में स्कूल जा रहे हैं । मैंने पूछा- कहाँ जा रहे हो ?”

स्कूल, करीब सात साल के बच्चे ने छूटते ही जवाब दिया ।

क्यों मैंने फिर पूछा ।

खाना खा के सोने जा रहे हैं और क्या ?”

क्या मतलब ? जरा ठीक से बताओ मैं नहीं समझा । उसने बताया अरे भइया पेट भर खाना खाते हैं और नींद आती है तो कक्षा के एक कोने में जाकर सो जाते हैं, कहकर हँस पड़ा ।

तुम्हारे गुरुजी कुछ नहीं कहते ?”

कभी नहीं

क्यों ?”

वह जोर हँसा - गुरुजी भी डटकर खा के, टेबल पर सिर रख सो जाते हैं । वह मेरी और चमकती निगाह से देखने लगा ।

मैंने पीछे मुड़कर देखा, मिट्टी के एक मकान की दीवार पर लिखा था- पढ़बे त आगे बढ़बे

 

दो बच्चे


 छैः साल का राजेश और पाँच का सतीश दोनों भाई एक ही क्लास में पढ़ते हैं । स्कूल में खाना लेकर मध्यान्ह भोजन वाली गाड़ी आती, दोनों अपनी-अपनी थाली के अलावा एक बड़ा सा खाली डब्बा लेकर निकल पड़ते । थाली में खाना लेकर जल्दी-जल्दी खाते और डब्बा में माँगकर थैले में रख लेते । आज भी वैसा ही हुआ । खाना गाड़ी आई और बच्चे खाना खाने निकल पड़े कक्षाओं से । दोनों भाई भी थाली और डब्बा लिये कक्षा से बाहर निकल आये ।

 

थोडी़ देर बाद जब कक्षा शुरु हुई - राजेश डब्बा में भरकर खाना तुम रोज किसके लिये ले जाते हो ?” मैंने पूछा ।

अपने लिये ले जाते हैं उसने बताया और रात को खाते हैं।”

उसके उत्तर से मैं जरा चिंतित हो उठा ।

क्यों तुम्हारी माँ रात को खाना नहीं बनाती ?”

हमारी माँ नहीं है, उसने रुंधे स्वर में बताया "नई मां है.....कहती है स्कूल में पेट भर खा लेना और रात के लिए भी लेते आना" कह थोड़ी देर के लिए चुप हो गया फिर अपने भाई की और देखकर बोला - नई माँ कहती है- मैं तुम्हारी नौकर नहीं हूँ कि सबह- शाम खाना बनाकर खिलाती रहूँ बोलकर मेरी ओर- अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से घूरकर देखने लगा ।

तुम्हारे पापा तुम्हारी नई माँ से कुछ नहीं कहते ?”

वो तो, माँ से बहुत डरते हैं कहकर मेरी ओर देखा और जोर से खिल-खिलाकर हँस पड़ा । उसकी हँसी मेरे कलेजे के पार निकल गई । मैं सोचने लगा - वो, कितने बदनसीब होते हैं जिनके सिर से माँ-बाप का साया वक्त से पहले उठ जाता है ।

 

अपने लिए जीना भी....


ग्रेज्यूएट होने के बाद अन्य युवकों की तरह पुत्र भी बेरोजगार हो गया । मित्र प्राईवेट फर्म के मालिक थे। पिता ने अनुनय-विनय कर एक छोटी सी नौकरी दिला दी। पिता की चिंता दूर हो गई। पुत्र सुबह काम पर जाता और शाम ढले लौट याता । एक सुबह पिता देखते हैं कि वह दिन चढ़े तक सो रहा है। उसे काम पर जाने की जल्दबाजी न थी।

 

बेटे काम पर नहीं जाना है क्या ?” पिता ने पूछा था।

नहीं पापा उसने आँखें मलते हुए, बताया।

क्यों भाई।

मेरा दोस्त राजेश, आप उसे अच्छी तरह से जानते हैं। पुत्र ने बताया- उसने बिरादरी से बाहर की लड़की से शादी कर ली, इसलिए मैंने अपनी नौकरी उसे दे दी पापा कहकर विजयी भाव से पापा की ओर देखने लगा।

क्यों, आखिर तुमने ऐसा क्यों किया ?” पिता ने रोष भरे स्वर में पूछा।

बताया न पापा अभी-अभी उसने शादी की है इसलिए ।

लेकिन तुमने- पिता ने बीच में टोका "तो अपने पाँव कुल्हाड़ी मार दिया बेटे

पापा के इतना कहते ही रुँधे स्वर में वह बोला- आप ही तो कहते हैं पापा- अपने लिए जीना भी कोई जीना है...। पापा की ओर उसने डबडबाई आँखें उठायी।

चेतन आर्य

बसंती निवास, सुभाष नगर

महासमुंद (छ.ग.) 493466

 

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