रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 12, मई, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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प्रवासी कविता

सृजनगाथा का एक साल

सहभागी लेखकों को बधाई

प्रवासी कविता

 

प्रवासी कविता - चीन से राजनंदन

 

भाई

दो तरह के होते हैं

आमतौर पर भाई

एक कूम्भकरण

दूसरा विभिषण

कूम्भकरण भाई को

पहले समझाता है

फिर परिस्थितियाँ समझकर

भाई का धर्म निभाता है ।

विभिषण पहले भाई को डराता है

फिर परिस्थितियाँ बदलकर

भाई के दुशमन से मिल जाता है ।

 

 

सुंदरता

जिस ढिंढोर सुन्दरता की

प्रशंसा करके

दुनिया के बडे़-बडे़

पारखी तीर वीर गंभीर

कभी नही अघाते ।

मैं क्यों पाता हूँ

उनकी अदाओं को

कुटिलता से

अपने उपर इतराते

मेंरा मूँह चिढाते ।

उफ !

मैं कैसा देहाती हूँ

मुझे तो उस विश्वसुंदरी में

होशियारी के सिवा

दूर-दूर तक

सुंदरता के

कहीं कोई लक्षण

नज़र हीं नही आते ।

जाने-माने सौंदर्य विशेषज्ञों की

कलम कूँची और कैंची से

सज-सँवर कर

देशी-विलायती

विभिन्न मुद्राओं में

आहें भरकर

हँस विहँसकर भी

उनकी अदायें

उनके सौंदर्य

मन को उस भाव से

नही लुभाते ।

जैसा कि कई बार

मैले-कुचैले वस्त्रों

और धूल भरे चेहरों में

छुपी हुई सौंदर्य प्रतिमूर्तियाँ

लुभा ले जाती हैं मन

बिना किसी अदा के

अपने माथे पर कंक्रीट

और ईंट उठाते-उठाते ।

राजनन्दन

मुख्य क्वालिटी कंट्रोलर(फैब्रिक)

हांगजाऊ, चीन

 

 

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