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कविता |
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दुलाल समाद्दार की कविताएं
नारी बार बार लौट आता हूँ मैं तुम्हारे पास बंद मुट्टी, नंगे पैर अमल मु्स्कान लिए। छुट जाते हैं खिलौने, बचपन भी लेकिन खत्म नहीं होता खेल तुम्हें खिलौना समझ सदियों से खेलता आया हूँ मैं तुम्हारी भावनाओं से, मर्यादाओं, सपने ओर संभावनाओं से मन भर जाए तो भून डालता हूँ तेन्दुर में या फिर बिकने के लिए बाजार में छोड़ आता हूँ।
स्यवं के। समेटने कीकोशिश में जब भी मैं टूकड़ों में बंट जाता हूँ बिखर जाताहूँ खेत-खलिहान, कारखाने, दफ्तर राजनीति के दल दल, गृहस्थी की हजार संस्याओं में या फिर तपिश भरे दिनों की भटकने से जुझते-जुझते जब भी टूट जाता हूँ
लहूलुहान लौट आता हूँ तुम्हारे पास बावजूद इतने अव्याचार के जहाँ अब शेष है वह अमृत जिसे हम प्यार कहते हैं, जिसके बुनियाद पर अभ भी टिका है सम्पूर्ण मानवीय अस्तित्व
हँसने के लिए हँसने के लिए गजभर का कालेजा चाहिए
मैंने कईबार हँसते हुए चेहरों में छुपे दर्द को पहचाना हैक मुस्कुराते चेहरों को टटोलकर महसुस कियाहै अपनी उंगलियों में गीलापन कितने ही बार कीमती सेफे पर पसरे सुख की दोशाला ओढ़े, ठहाके लगाते लोगों को देखा है आँशू बहाते एकांत में।
महलों में जगमगाती दीवारों पर, नर्म कालीनों के नीचे दब घुटी हुई चीखें और बेबस सिसकियाँ भी कितने ही बार मैनें सुनी।
विज्ञजनों का कहना है, “हँसना अच्छा है सेहत के लिए।” कई शहरों में खुल गया हैं ‘लॉफिंग क्लब’ भी। लोग ठहाके लगाकर छुटकारा पाते हैं बीमारियों से।
लेकिनि मेरा तजुर्बा है अगर जी भर रो लिया जाए बगैर शर्म के जैसे कि रोती है दुखियारी ममता की मारी माँ अपनी संतान से बिछुड़कर या फिर सावन में रोती है प्रकृति और डुबों देती है सारी चर-अचर वैसे ही खुलकर रोने के बाद ही सचमुच का हँसना संभव है। नहीं तो, हँसना चेहरा एक मुखौटा भर बनकर रह जाता है।
माँ सी हुई तुम्हारी होठों ने कभी भी मुझ से कुछ नहीं मागा मैं, उस चुप्पी को ही अपना अधिकार समझ बसूलने लगा ममत्व की कीमत।
बरसों से थपकी देते हाथों के घेरे में स्वयं को छुपाकर मैं टाल देता था आँधी और तुफानों को आँचल की शीतर छाव में बैठकर गुजार देता था तपती दोपहरी और प्यार की ओम लपेटकर जाड़े की ठिठरती रात।
बदले में, तम्हें क्या मिला ? विषाद भरे दिनों की भटकर, आखों में मुट्ठी भर रेत की अनिद्रा, असमय थकान से चूर झुर्रीदार चेहरा और जबरन थोपे गये बान प्रस्थ ?
फिर भी, युगों से बे-घर तुम घरौंदे बनाती रही अपने बच्चों के लिए और सहती रही मौसम के थपेड़ों को हँसते हंसते ।
क्वार्टर न.-8/डी, सड़क-76 सेक्टर-6,भिलाई छत्तीसगढ़
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