रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 12, मई, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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कविता

सृजनगाथा का एक साल

सहभागी लेखकों को बधाई

कविता

 

दो कविताएं बंगाल परः जीवनानंद दास

 

मैंने देखा है बंगाल का चेहरा

मैंने देखा है बंगाल का चेहरा इसलिए पृथ्वी का रूप
देखने कहीं नहीं जाता, अंधेरे में जगे गूलर के पेड़
तकता हूँ, छाते जैसे बड़े पत्तों के नीचे बैठा हुआ है
भोर का दयाल पक्षी- चारों ओर देखता हूँ पल्लवों का स्तूप
जामुन, बरगद, कटहल, सेमल, पीपल साधे हुए हैं चुप्पी
नागफनी का छाया बलुआही झाड़ों पर पड़ रही है
मधुकर1 के नाव से न जाने कब चांद, चम्पा के पास आ गया है
ऐसे ही सेमल, बरगद और ताड़ की नीली छाया से भरा पूरा है
बंगाल का अप्रतिम रूप

हाय, बेहुला ने भी देखा था एक दिन गंगा में नाव से
नदी किनारे कृष्ण द्वादशी की चांदनी में
सुनहले धान के पास हज़ारों पीपल, बरगद वट में
मन्द स्वर में खंजनी की तरह इन्द्रसभा में
श्यामा2 के कोमल गीत सुने थे, बंगाल के नदी कगार ने
खेत मैदान पर घुंघरू की तरह रोये थे उसके पाँव ।


1-सौदागर (सती बेहुला की कथा का पात्र), 2-लोक संगीत)

 

बनलता सेन

हज़ारों साल से राह चल रहा हूँ पृथ्वी के पथ पर
सिंहल के समुद्र से रात के अंधेरे में मलय सागर तक
फिरा बहुत मैं बिम्बिसार और अशोक के धूसर जगत में
रहा मैं वहाँ बहुत दूर अंधेरे विदर्भ नगर में
मैं एक क्लान्त प्राण, जिसे घेरे है चारों ओर जीवन सागर का फेन
मुझे दो पल शान्ति जिसने दी वह- नाटोर की बनलता सेन  


केश उसके जाने कब से काली, विदिशा की रात

मुख उसका श्रावस्ती का कारु शिल्प-
दूर सागर में टूटी पतवार लिए भटकता नाविक
जैसे देखता है दारचीनी द्वीप के भीतर हरे घास का देश
वैसे ही उसे देखा अन्धकार में, पूछ उठी, कहाँ रहे इतने दिन ?
चिड़ियों के नीड़-सी आंख उठाये नाटोर की बनलता सेन  


समस्त दिन शेष होते शिशिर की तरह निशब्द
आ जाती है संध्या, अपने डैने पर धूप की गन्ध पोंछ लेती है चील
पृथ्वी के सारे रंग बुझ जाने पर पाण्डुलिपि करती आयोजन
तब किस्सों में झिलमिलाते हैं जुगनुओं के रंग
पक्षी फिरते घर-सर्वस्य नदी धार-निपटाकर जीवन भर की लेन देन
रह जाती है अंधेरे में मुखाभिमुख सिर्फ बनलता सेन

 

 

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