रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 12, मई, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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कविता

सृजनगाथा का एक साल

सहभागी लेखकों को बधाई

कविता

 

दो कविताएः डॉ. बलदेव

 

लैंडस्केप

अब तो बिस्तर छोड़ना ही होगा

इस प्रगाढ़ अंधकार के

निष्कम्प जल

और अंतहीन शून्य के बींचो-बीच

हाँ, अब मैंने

मिट्टी का एक सुनहला ढेला

रख दिया है

 

इस छोटे से कैनवास पर

एक बहुत बड़ा लैंड स्केप

आँखे खोल रहा है

 

खुले आकाश के नीचे

एक ही पेड़ है

एक ही घर

और उसकी मुंड़ेर पर

एक ही चिड़िया

बाकी लहराते हरे भरे खेत

काम पर जाते हुए लोग

रहट से पानी खींचती ग्राम वधुएँ

स्लेट पट्टी से खेलते बच्चे

 

गहरी नींद के जंगल में

एक नदी चमकने लगी है

 

अब तो बिस्तर छोड़

कैनवास के सामने जाना ही होगा

सूर्य-नमन के लिए

 

संगीत

तुम्हारी भाषा कलेजे में मीठी छुरी

क्यों उतर जाती है बेगम?

 

आधी रात जब तुम कूकती हो

टीस भरी आम्रमंजरियों की

मधु सी मादक गंधमई भाषा

प्राणों में बहने लगती है

वह भाषा मेरी कविता में

न उतर कर

तुम्हारे उजले संगीत में

क्यों उतरती है भला?

 

जब दूर देश में

खिड़कियां खोलकर सोई

किसी मुग्धा के आनंद में सुबकने की आवाज़

पारिजात की उज्ज्वलता में खिलने लगती है

उस समय खास तौर से तुम

चुप क्यों हो जाती हो कोयल?

 

यह तो वह भाषा है

जो मुझे-तुम्हें

फूल और पत्तियों को

यहाँ तक कि

तारों को जोड़ती है

फिर क्यों नहीं रचती वह भाषा मुझे

मेरी कविता में?

 

डॉ. बलदेव

स्टेडियम के पीछे, रायगढ़

छत्तीसगढ़ - 492001

 

 

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