रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 12, मई, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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कथोपकथन

सृजनगाथा का एक साल

सहभागी लेखकों को बधाई

कथोपकथन

 

नष्ट होने के कगार पर है रोमा यायावरों की संस्कृति


(पद्मश्री श्याम सिंह शशि से अरूण कुमार की बातचीत)

 

       हिमालय के साथ-साथ यूरोप और अमेरिका के यायावर-साहित्य पर शोध-कार्य करने वाले सुप्रसिद्ध साहित्यकार पद्मश्री (डॉ.) श्यामसिंह शशि के अनुसार यूरोप के रोमा यायावर आज अपनी संस्कृति में कुछ अवशेष ही सुरक्षित रख सके हैं । रोमा-जिप्सियों को पुनः भारत की मूल संस्कृति से जोड़ने का दावा करने वाले डॉ. शशि आज भी शोध कार्य में लगे हैं । वे कहते हैं - समय के साथ-साथ यायावरी वृति अब यूरोप में भी बहुत कम हो गई है । 250 पुस्तकों से भी अधिक के लेखक स्वीकार करते हैं कि अधिक लिखने से पुनरावृति की आशंका बनी रहती है, किन्तु लेखन का व्यापक क्षेत्र होने अथवा विषय-वैविध्य होने से यह खतरा न्यून हो जाता है । प्रकाशन विभाग के महानिदेशक पद से अवकाश प्राप्त डॉ. शशि से अरूण कुमार भगत की हुई बातचीत के कुछ महत्वपूर्ण अंश प्रस्तुत हैं - संपादक

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छात्र-जीवन में ही आपकी कविता-पुस्तक 'लाल सवेरा' का प्रकाशन हो चुका था । साहित्य-सर्जना की स्वाभाविक अभिरूचि के कारण आपको अपने अध्ययन का विषय साहित्य चुनना चाहिए था, जबकि आपने समाज क्षेत्र में स्नातकोत्तर और शोध-कार्य किया । किन परिस्थितियों ने आपको ऐसा करने के लिए बाध्य किया ?

छात्र जीवन में मेरे पिता जी के आकस्मिक निधन के कारण परिवार के भरण-पोषण का दायित्व मेरे ऊपर आ गया । इसीलिए मुझे हिंदी-साहित्य की अपेक्षा ऐसे विषय का चयन करना पड़ा, जिसमें नया विषय होने के कारण नौकरी संबंधी अधिक संभावनाएँ थी । वैसे भी हिंदी को मैंने कभी आजीविका का साधन नहीं बनाया, बल्कि माँ भारती के सेवार्थ मिशन के रूप में लिया था । मैंने मैट्रिक करते हुए साहित्य-रत्न का पहला खंड भी उत्तीर्ण कर लिया था । समाजशास्त्र में डॉक्टरेट उन दिनों अँगरेज़ी माध्यम से ही होती थी, फलतः मुझे आदिवासी विषयों पर अँगरेज़ी में अनेक पुस्तकें लिखने का सुयोग मिला, जिसका विदेशों में अच्छा मार्केट था । फलतः अँगरेज़ी पुस्तकों की हिंदी से अधिक रॉयल्टी मिलती रही ।

 

आपकी 250 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि अत्यधिक लेखन के कारण तथ्यों की पुनरावृत्ति की संभावना अधिक रहती है ?

यह सही है कि अत्यधिक लेखन के कारण तथ्यों की पुनरावृत्ति की आशंका अधिक रहती है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि विषय-वैविध्य के कारण भी ऐसा होता हो । मेरी मौलिक तथा संपादित पुस्तकों में हिंदी की केवल सौ पुस्तकें ही हैं, जबकि अँगरेज़ी में 'एनसाइक्लोपीडिया इंडिका' के 150 खंड प्रकाशित हुए, जिसका मूल्य 3 लाख रूपए हैं । इसी प्रकार अँगरेज़ी में कई अन्य विश्वकोशों का संपादन किया, जिनके विषय कहीं परस्पर मिलते हैं तो कहीं भिन्नता भी बहुत है । मौलिक साहित्य की बात करूँ तो मुझे खेद है कि अँगरेज़ी ग्रंथों की तुलना में केवल 19 कविता संग्रह, एक प्रबंध-काव्य, कुछ यात्रा-साहित्य और बाल-साहित्य यानी सौ से कम मौलिक पुस्तकें हिंदी में लिख पाया । यायावर जीवन से जुड़े अपने एक प्रस्तावित उपन्यास तक को पूरा नहीं कर पाया । पत्रकारिता और प्रबंधन में भी काफी समय देना पड़ा ।

 

हिमालय के यायावरों पर आपने शोध-कार्य किया है । आपके शोध का निष्कर्ष क्या है ?

हिमालय के यायावरों पर शोध-कार्य के निष्कर्ष को यदि शब्दों  में कहना हो तो इन यायावरों में गद्दी समाज को छोड़कर, गुजर, नट, वकरवाल आदि अन्य यायावर समाज आज भी स्वतंत्र भारत को आशाभरी दृष्टि से देख रहे हैं । गद्दी समाज के अत्यंत पिछड़े वर्ग अर्द्धयायावरी से आगे नहीं निकल पाए  इस दिशा में बहुत काम करने की आवश्यकता है ।

 

रोमा-जिप्सियों पर डी.लिट् की शोधोपाधि के हेतु आप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुए । उसकी यायावरी वृत्ति का मूल्याँकन आप किस रूप में करना चाहेंगे ?

डी.लिट् की शोधोपाधि तो मेरी विश्वयात्राओं का आरंभ-मात्र था । मैंने यूरोप एवं अमेरिका में इन यायावरों के बीच रहकर सहभागिक अवलोकन, अनुसूची, प्रश्नावली इत्यादि समाजशास्त्रीय पद्धतियों द्वारा न केवल भारतीय समाज और नृ-विज्ञान को एक अछूते विषय से अवगत कराया, बल्कि भारत की भूली-बिसरी संतानों को दिल्ली तथा चंडीगढ़ में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में बुलाकर इन्हें यहाँ की मनीषा से भी जोड़ा । यूरोप के रोमा यायावरों के अध्ययन के आधार पर मुझे लगता है कि जिस प्रकार वे आज अपनी संस्कृति के कुछ अवशेष ही सुरक्षित रख सके, इसी प्रकार हमारे एन.आर.आई. वर्ग का भी यही हश्र होगा । वैसे समय के साथ-साथ रोमा यायावरी वृत्ति यूरोप में अब बहुत कम हो गई है ।

 

साहित्य-सर्जना और उसके उन्नयन के लिए साहित्यकार-संगठनों और विभिन्न सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं की भूमिका को आप किस रूप में स्वीकार करते हैं ?

  साहित्य-सर्जन जब किसी संगठन अथवा संस्था का वैचारिक दास बन जाता है तो फिर उसकी परिधियाँ घट जाती हैं । मैंने जो भी लिखा, प्रायः सरकारी, गैरसरकारी विचारधाराओं की परवाह न करते हुए एकला चलो रे को आत्मसात कर लिखा । मैंने चरैवेति पथ पर चलना उपयुक्त समझा । कुछ संगठन अच्छा मंच प्रदान कर रहे हैं, किंतु अधिकतर गुटबाजी ही कर रहे हैं ।

 

आपको सरकार तथा समाज की अनेक संस्थाओं ने पुरस्कृत-सम्मानित किया है । 'पद्मश्री' जैसे राष्ट्रीय सम्मान से आपको अलंकृत किया गया है । आप इससे संतुष्ट हैं ?

देश-विदेश की अनेक संस्थाओं ने मुझे सम्मानित किया, किंतु मैं इसे परिश्रम, नियति अथवा संयोग तथा मित्रों की शुभकामनाओं का परिणाम मानता हूँ । मैंने कभी मान-सम्मान के लिए लेखन को अपने जीवन का अंग नहीं बनाया, बल्कि जो भी लिखा 'सत्यं शिवम् सुंदरम्' और वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को आत्मसात् कर लिखा । समाज, देश तथा मानवता के हित में जो अच्छा लगा वही मेरी लेखनी ने कागज़ो पर प्रवाहित किया । वैसे मान-सम्मान से क्षणिक प्रसन्नता तो होती है, पर उससे मेरी लेखनी की गति कभी प्रभावित नहीं हुई ।

 

भारत सरकार के प्रकाशन विभाग में महानिदेशक जैसे उच्च पदों पर रहते हुए आपने विपुल साहित्य की सर्जना की है। अपनी व्यस्तता के मद्देनज़र सरकारी सेवा और साहित्य-सर्जन के बीच आपने किस प्रकार सामंजस्य स्थापित किया ?

एक बार मेरे विभाग के किसी केंद्रीय मंत्री ने मेरे सम्मान में आयोजित एक समारोह में हल्की-सी चुटकी लेते हुए कहा था कि उन्हें मेरे सरकारी कामकाज संबंधी कोई शिकायत नहीं मिली, फिर सरकारी वक्त में से कुछ क्षण निकाले बिना इतना लिखना कैसे संभव है ?  मैंने तब अपने वक्तव्य में कहा था कि ईश्वर ने सभी को 24 घंटे का समय दिया है । यह व्यक्ति के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपना समय-प्रबंधन कैसे करे ?  मुझे रात बारह या एक बजे फोन करके पूछा जाए तो मैं अपने लेखन-कार्य में संलग्न मिलूँगा । वैसे भी 8-9 बजे से पहले मैं अपना दफ़्तर नहीं छोड़ता । मंत्री जी मुस्कराए । बात आई-गई हो गई ।

 

       मुझे जहाँ अपने मौलिक सर्जन से सुख मिला, वहाँ सामाजिक विज्ञान, हिंदी विश्वकोश निर्माण जैसे राष्ट्रीय कार्यों ने रुग्ण शय्या पर लेटने के लिए विवश कर दिया । सभी जानते हैं कि मैं दो वर्षों तक स्पाइनल कॉर्ड के ऑपरेशन के कारण एम्स तथा अन्य अस्पतालों में जीवन-मृत्यु के बीच झुलता रहा । अभी भी पुरानी ऊर्जा लौटकर नहीं आई हैं ।

 

आप बाल-साहित्यकार के रूप में भी प्रतिष्ठित हैं । आपकी दृष्टि में बाल-साहित्य की सबसे बड़ी समस्या क्या है ?

बाल-साहित्यकार की सबसे बड़ी समस्या है उसका सही ढंग से प्रचार-प्रसार न हो पाना और बाल पुस्तकें थोक खरीद की अपेक्षा सीधे पाठकों तक न पहुँचना । यहाँ एक बात और स्पष्ट कहना जरूरी है कि हैरी पॉटर को यदि प्रचार-प्रसार के विधिवत् अधुनातन मंच न मिलते तो उनकी पुस्तकें इतने विश्वव्यापी स्तर पर लोकप्रिय नहीं होतीं ।

 

आप साहित्य-सर्जन के बाद हल्के-फुल्के मूड़ में या अवकाश के क्षण में क्या करना पसंद करते हैं ?

साहित्य-सर्जन के बाद मुझे मित्रों से बतियाना अच्छा लगता है । बच्चों से बात करना पसंद है । दूरदर्शन पर डिस्कवरी, समाचार तथा मनोरंजन के हल्के-फुल्के कार्यक्रम भी अच्छे लगते हैं ।

 

आपके जीवन का सबसे सुखद क्षण क्या था ?

मेरे जीवन में सुखद क्षण तो बहुत से आए, किंतु सर्जन का सुख मुझे अपना महाकाव्य 'अग्निसागर' लिखने पर सर्वाधिक मिला ।

अरूण कुमार भगत

रीड़र, समन्वयक(पत्रकारिता विभाग)

माखन लाल चतुर्वदी, राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि,

डी-12, ए, सेक्टर - 20, उत्तरप्रदेश

 

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

 

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