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कहानी |
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भूख डॉ. सूरज मृदुल
उस दिन मोहन बाबू, अपने ऑफिस में बैठे पार्टियों से, कुछ व्यापारिक बातें कर रहे थे। तभी एक पचास वर्षीय आदमी ने चैम्बर में आकर कहा, ‘साहेब, मुझे नौकरी चाहिए। नौकरी मेरे लिए बहुत जरूरी है। इसलिए आप मुझे नौकरी दे दीजिए । आप जो नौकरी देंगें, वह मैं कर लूंगा । आप मुझे अगर चपरासी की भी नौकरी देंगें, तो वह भी मैं कर लूँगा। लेकिन आप मुझे एक नौकरी दे दीजिए।’
मोहन बाबू ने कुछ सोचकर उससे कहा, ‘देखिए हमारे पास अभी कोई नौकरी नहीं है। मैं नहीं दे सकता हूँ। वैसे आप मुझे पता लिखा दीजिए, कहीं जरूरत पड़ी तो आपको बुलवा लूँगा।’ ‘नहीं साहेब, ऐसा न कहें, कोई भी.....।’ ‘देखिए....अभी इतनी जल्दी संभव नहीं है !’ ‘मैं जहाँ काम करता था, वहाँ तीन साल हो गए हैं फैक्ट्री बन्द हुए । हमलोगों को अब वहाँ से महीना नहीं मिलता है, किसी तरह से अपने रिश्तेदारों से माँग-चाँग कर, तीन साल काम चलाया लेकिन अब वो भी नहीं देते हैं । मेरे घर में, आज तीन दिनों से चूल्हा नहीं जला है । मैं आज तीन दिनों से भूखा हूँ, इसलिए आप मुझे कोई भी नौकरी दे दें ।’ ‘तो आप तुरन्त जाकर खाना खाइए, फिर आप से हम बात करते हैं!’ यह कहकर मोहन बाबू ने, तुरन्त घण्टी बजायी । पियून के आने पर उसे कैन्टीन में भरपेट खाना खिलाने का आदेश दिया । ‘चलिए साहेब ।’ वह पियुन उन्हें यह कह कर ले गया । फिर जब उन्होंने भर पेट खाना खा लिया, तब वह व्यक्ति पुनः मोहन बाबू से मिला । ‘आपने भरपेट खाना खाया ?’ ‘जी..!’ ‘ठीक है आप परसों भेंट कीजिए, देखते हैं अगर कहीं रास्ता निकलता है, तो मैं आपको नौकरी अवश्य दूँगा । वैसे आप उस फैक्ट्री में क्या करते थें ?’ ‘जी, मैं वहाँ एकाउन्ट का काम करता था !’ ‘ठीक है आप परसों मिलिएगा !’ ‘जी !’ यह कह कर, वह आदमी चला गया । इस समय तक मोहन बाबू के पास, तीन चार व्यापारिक पार्टियाँ, पास आकर बैठ गयी थी । सभी का काम कर, उन्हें अपने चैम्बर से विदा किया ।तभी इनके पास बैठे शर्मा जी ने, इनसे कहा, ‘साहेब, आप जल्दी दूसरों पर, विश्वास कर लेते हैं । अगर कहीं वह भूखा आदमी, यों ही कोई कहानी गढ़कर बोल रहा हो, तो ?’ ‘नहीं शर्मा जी, वह कहानी गढ़ कर नहीं बोल रहा था, बल्कि सच बोल रहा था । आप उसे देख नहीं रहे थे, उसकी बोली कैसे लड़खड़ा रही थी ।’ ‘जी, वह तो मैं देख ही रहा था, फिर भी ....।’ ‘शर्मा जी आप ‘भूख’ को नहीं न जानते हैं, मैं जानता हूँ । मैं इसे करीब से देखा हूँ । आज से लगभग चालीस साल पहले, मेरे परिवार के लोग भूख से तड़प गए थे । उस समय कभी तो हमें ‘जनेरा’ की रोटी मिल गयी, कभी-कभी तो सत्तुआ फाँक कर, रह जाना पड़ता । कई शाम तो हम भाई-बहन, माँ-बाप सब भूखे ही सिर्फ पानी पीकर सो जाते । हमारी पत्नी एक अच्छे परिवार से आई थी, जिसने कभी भूख नहीं देखी थी, क्योंकि मायके में कभी उसे पैसे की कमी नहीं हुई थी । समझ लीजिए आप इतनी बात से कि उसने अपने मायके में गुड्डा-गुड़ियों की शादी रचाई थी, तो - उसमें तीन-चार हजार लोग खाए थें । अरे, उन दिनों उसकी दोनों जेब में हरदम ‘ड्राई फ्रूटस’ भरे रहते थे । दिन भर स्वच्छन्द तितलियों की तरह घूमना-फिरना उसका काम था । मेरी पत्नी जब वह बनी, तब तक मेरे घर का माहौल, थोड़ा-थोड़ा अच्छा हो गया था, लेकिन उसे भी भूख से तड़पना पड़ा था । फिर वह बड़े घर की बेटी थी, इसलिए लोग उसे यों ही जलते एवं दूर रहते थे । इस हालत में उसे खाना नहीं मिलता । कभी उसे एक शाम भूँजा फाँक कर ही रह जाना पड़ता था । आपने भूख को करीब से नहीं देखा है, इसलिए आप ऐसा बोल रहे हैं । फिर आपको किसी की भूख के बारे में, कैसे मालूम होगा की भूख क्या चीज़ होती है ?’
‘जी, आप ठीक ही कह रहे हैं ।’ ‘शर्मा जी, आपने राजेश खन्ना कि फिल्म ‘दुश्मन’ देखी है ?’ ‘नहीं !’ ‘उसमें दिखाया गया है कि मीना कुमारी का पति, राजेश खन्ना के ट्रक से पिसकर, मर जाता है । अब इस परिवार की परवरिश कैसे होगी, क्योंकि इस परिवार में, कमाने वाला कोई मर्द नहीं था । इसलिए जज ने सारी परिस्थितियों को देखते हुए, उसे जेल की सजा ने देकर, इस परिवार की परवरिश करने को कहा, ‘आपलोगों ने मुझे यह कैसी सजा दे दी है ? मैं कहाँ आकर फँस गया हूँ । मैंने आज दो दिनों से खाना नहीं खाया है और मुझे कोई पूछने तक न आया है !’ यह सुनकर दरोगा बोला, ‘अच्छा तुम्हारी दो दिनों में ही, यह हालत हो गयी है । तुमने जिस पूरे परिवार का, हमेशा-हमेशा के लिए खाना छील लिया है, उसका क्या हाल होता होगा । यह तुमने कभी सोचा है ?’ ‘नहीं !’ ‘तो उससे जाकर पूछो, क्या गुजरती होगी उस पर ?’ तो शर्मा जी यही फिल्म का ‘क्लाइमेक्स’ है । फिर वह वहीं रहता है, खेत जोतता है । बाद में, मीना कुमारी की नन्द की शादी भी वही कराता है, फिर भी मीना कुमारी उसे हेय दृष्टि से देखती है ! वह हमेशा उसे धिक्कारती ही रहती है, कभी वह उसे अपने परिवार का सदस्य नहीं मानती । लेकिन एक दिन मीना कुमारी की इज्जत, चौधरी ने लूटनी चाही, तो उसी ने बचाया । उसी दिन से मीना कुमारी, उसे अपने घर का एक सदस्य, समझने लगी । यही फिल्म की कहानी है ! शर्मा की ‘भूख’ ऐसी चीज़ है कि आदमी इसके कारण विलविला जाता है । अंग्रेजी में ‘द हगँरी’ एक किताब है, जिसका राइटर, एक पहाड़ पर फँस गया था, वहाँ वह कई महीने तक भूखे ही रहा । तब उसने ‘भूख’ पर ही एक उपन्यास लिख डाला, जो बाद में चलकर, इस पर उसे ‘नॉबेल पुरस्कार’ मिला था ।’
‘जी !’ शर्मा जी इनकी सारी बातों को सुनकर, मन ही मन अनुभव करने लगे, वास्तव में ‘भूख’ का कितना विकराल रुप होता है । फिर दुनिया में जितने भी लोग काम करते हैं, वि सिर्फ इस भूख को मिटाने के लिए ही तो करते हैं ! तीसरे दिन वह भूखा व्यक्ति वहाँ आया, तब मोहन बाबू ने, उससे ‘एकाउन्ट’ से सम्बन्धित कुछ टेस्ट लिए । फिर उसका पूरा परिचय आदि लेकर उसे ‘एकाउन्टेन्ट के पोस्ट’ पर रख लिया, जहाँ उसने अपनी योग्यता के कारण उनके यहाँ जल्दी ही अपनी एक अच्छी पोजिशन बना ली थी ।
आज मोहन बाबू को यह अनुभव हुआ कि सचमुच भूख के कारण आदमी कितना मेहनती हो जाता है, क्योंकि उसे आभास रहता है कि वह काम कर रहा है सिर्फ अपनी भूख मिटाने के लिए ! अगर वह काम नहीं करेगा, तो फिर वह फूटपाथ पर ‘भूखा’ आ जाएगा । यह सोचकर उन्हें आज बहुत सकून मिला कि एक जरुरतमंद आदमी को मैंने नौकरी दी है !
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