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कहानी |
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एक और पितामह अमल रायचौधरी
रात के सन्नाटे को चीरती हूई आज भी करीम चाचा की कण्ठ से एक चीख निकलती है – नहीं-नहीं ऐसा मत करो । किसी भौगोलिक सीमा रेखा या किसी भूखंड को लिकर उठे वाद-विवाद से बेखबर, उन शांत, भोले-भाले लोगों को सताओ मत । प्रकृति की उदारता लिए प्रकृति की गोद में पले उन शांति के पुजारियों का खून बहाकर, उनको बेघर करके तुम्हें क्या मिलेगा ? क्यों उजाड़ना चाहते हो उनकी छोटी सी दुनिया को ? उनके घर जलाकर तुम्हारे मन में ठंडक कैसे पहूँच सकती है । अपनी ही ज़िंदगी के बोझ तले दबे उन निर्जीव प्राणों को क्यों इन असहाय, कमज़ोर लोगों के खूंन से रंगते हो । किसके इशारे पर अल्ला-ताला के बनाए हुए सर्व-श्रेष्ठ प्राणी नर से तुम लोग नर-पिशाच बन रहे हो । क्या मिलेगा तुम्हें गुनाह के इस दलदल में फँसकर ...... अंधेरे कमरे में बिस्तर पर बैठे-बैठे अभी भी बड़बड़ा रहे थे करीम चाचा । अपने मियाँ की चीख से जग जाती है शिरीन बीबी, जग जाता है नूर मोहम्मद भी, करीम चाचा का जवान बेटा । परेशान तो होते हैं पर आजकल और कोई कुछ नहीं कहता है करीम चाचा को, क्योंकि वे भी जानते हैं कि एक अनजान बिमारी से ग्रस्त है, एक मानसीक बीमारी । शिरीन बीबी एक गिलास पानी लाकर देती है, बत्ती जलाकर पसीने से तर-बतर करीम को फिर सोने की कोशिश करने की हिदायत देती है । फैन की स्वीच तेज करके बत्ती बुझाकर अपने कमरे की ओर चल देती है । अंधेरे करमे में बिलकुल तन्हा और उदास करीम चाचा फिर से सपने में उभरे उन भयानक दृश्यों के जड़ को टटोलने की कोशिश करता है । कुछ महीनों से शाम ढलते ही दिन-दुलिया से बेखबर करीम चाचा विशाल आसमान के दरबार में अपनी अनकही उलझनों को, अल्ला-ताला के दरबार में इंसालियत के दुश्मनों के विरुद्ध फरियादें पेश कर इंसाफ माँगता है । आसमान के विशाल आईने में कुछ तस्वीरों में छूपे कुछ वीभत्स चेहरों को ढूँढ़ता है और उनसे उनके कुकृत्य का जवाब माँगता है, और एक समय थक-कर जाकर सो जाता है । नींद के आगोश में समा जाना चाहता है पर उनकी तकदीर में नींद-चैन कहाँ । आँखे बंद करते ही कुछ भयानक तस्वीरें जीवंत होकर उनके सामने आकर खड़ा होने लगती हैं, उनको साथ लेकर भागना चाहता है देश के एक कोने से दूसरे कोने तक । वहाँ जाकर अपने साथी, हमसफर, जाने पहचाने लोगों को इंसान के और इंसानियत के दुश्मन बनते देख भयभीत हो जाता है। हजार कोशिशों के बाद भी उन तस्वीरों से, वीभत्स चेहरों से पीछा नहीं छुड़ा पाता और तभी अनजाने ही उनके कण्ठ से इस तरह की चीख निकल पड़ती है । क्या सचमुच ये एक बीमारी है, क्या करीम चाचा सचमुच बीमार हैं ?
शायद नहीं, सारे गली, मोहल्ले और सारा शहर जिसे करीम चाचा-करीम चाचा कहते थकते नहीं, बच्चे सभी प्यार से, अदब से उनके सामने सर झुकाते हैं उनको इस किस्म के भयानक डरावने सपने क्यों आते है, इस सवाल के जवाब की जड़ कहीं और है दिल की गहराई में । इस तरह के भयानक तस्वीरें, वीभत्स चेहरे जो उनके अंतर्मन में बस चुके हैं, एक अमीट छाप छोड़ गये हैं, शायद उनकी आँखों देखी हो, समाज की ऐसे ही विसंगतियों का सामना शायद उनकी ज़िंदगी की राहों पर बार-बार करना पड़ा हो, उनके कोमल मन को झकझोर दिया हो । उनके मन में इस समाज की, देश की राष्ट्र नेताओं की, इंसान से इंसान के जज़बाती रिश्तों की कुछ और ही तस्वीर, आजादी के पहले से अपने दिल में बसाए होंगे ।आज पचास वर्षों के बाद भी उसके विपरीत परिस्थितियों को देखकर दुःखी हो जाते हैं । शायद अपने आपको बार-बार यही सवाल पूछते होंगे क्या इसीलिए परिवार के सम्पन्न होते हुए भी मैं एक क्रांतिकारी बना था? क्या बेवकुफ थे कि वतन में फैले इस कदर अराजकता, भ्रष्टाचार को पनपते देखने के लिए ही उस दिन इतनी यातनाएँ, इतनी पीड़ा सहे थे ? आजा़दी – रूपी लड्डू मिलते ही देशवासी हमें, हमारे त्याग और बलिदानों को भूल जाए ? आज़ाद भारत में सिर्फ दो वक्त की रोटी के लिए दर-दर भटकना पड़े ? क्या आजादी के लिए वतन का, भाई-भाई में विभाजन जरुरी था ? क्या देश की जनता की इसमें सहमति थी ? क्या पचास वर्षों बाद भी दिलों को बाँटने की प्रक्रिया को न केवल जीवित रखना, उसको और तेज गति से चलने देना उचित है ? मज़हब के नाम पर, भाषा के नाम पर और जात-पाँत के नाम से वतन को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटना क्या ज़रुरी है ? क्या रोटी-कपड़ा-मकान-शिक्षा सामुदायिक विकास के लिए त्रस्त आम-जनता की इसमें सहमति है ? आगर नहीं तो ऐसे षड़यंत्र को रचने वाले कौन लोग हैं ? मुट्ठी भर लोग इस प्रकार की जघन्य कृत्य के लिए दोषी पहचाने जाने के बाद भी करोड़ो, असहाय शोषित जनता के अगवा-कर्णधार बन बैठने का हिम्मत कैसे कर रहे हैं । ऐसे ही हजारों सवाल समुंदर की लहरों की तरह करीम चाचा की दिमागी सतह पर टकराकर बिखर जाते हैं । इन सवालों के जवाब और उन जवाबों से जुड़े और सवाल, मस्तिष्क के कोने-कोने से टकराकर करीम चाचा को परेशान कर देते हैं, वह अपने दिमागी संतुलन को खो बैठते हैं ।
शीरिन बीबी भी क्या करती, वो भी तो ज़िंदगी के इस लम्बे सफ़र में अपने शौहर के करीब रहकर, उनके सोच-विचार उनके आदर्शों से भली-भाँति परिचित थी । अपने शौहर को समझाने की, उनको इस मानसिक हालत से बाहर लाने उनके पास कोई शब्द भी तो नहीं है । आज़ाद भारत में करीम चाचा के आदर्श, सपने, हर ख्वाहिश को टूटते-बिखरते देखने वालों में शायद शीरिन बीबी अकेली ही मूक गवाह बनकर आज भी जिन्दा है । बाकी किसी को भी उनके आदर्शों, भावनाओं को समझने की फुर्सत ही कहाँ है । केवल शीरिन-बीबी ही जानती है कि करीम चाचा की ज़िंदगी में सबसे ज्यादा उथल-पुथल, एक आकस्मिक परिवर्तन तबसे आने लगा था जब अपने बीबी बच्चों की दो वक्त की रोटी के लिए कड़ी मेहनत व कोशिशों के बाद एक पत्रकार के रुप में काम करने का मौका मिला, देश के कई हिस्सों में घुम-घुमकर कठोर, सच्चाईयों का सामना करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । कुछ दिनों तक स्वछंद रुप से पूरी लगन के साथ हर छोटी-बड़ी घटनाओं में निहित सच्चाई को उजागर करके मानवीय संवेदनशीलता के साथ हर घटना का विश्लेशण करके वह कितना खुश होते थे, कितना सुकून महसूस करते थे । पर कुछ दिनों के बाद ही वे कुछ परेशान अपने कामों से नाखुश होने लगे थे । तथाकथित निरपेक्ष कहलाने वाले कुछ अखबारों को वर्ग विशेष के स्वार्थ में सच्चाई को तोड़-मरोड़कर भोली-भाली जनता के समक्ष पेश करने की साजिश को देखकर बौखला उठते थे, अन्दर ही अन्दर टूटते जा रहे थे और शीरिन बीबी अपने शौहर की आत्मा में व्यवस्था के दिये हुए हर जख्मों से खून रिसते देखकर बिलकुल टूट गये, एक मानसिक तनावग्रस्त रोगी की तरह तड़पने को विवश हो गये थे । उफ क्या दर्दनाक दृश्य था.... करीम चाचा तो क्या, स्वयं अल्ला-ताला भी ऐसे जघन्य हादसे के आगे अपने मानसिक संतुलन खोने को विवश हो जाते ।
उस समय उड़ीसा में कुछ मजहबी दंगे और तत्पश्चात राजनैतिक उथल-पुथल होने का अंदेशा था और इसी सिलसिले में कवरेज के लिए करीम चाचा को भुवनेश्वर जाना पड़ा था । वहाँ पहुँचने के पहले ही करीम चाचा को एक स्कूप न्यूज मिल गया था कि महाराष्ट्र के किसी व्यापारी ने दवाई के साथ एक वैन में करोड़ो रुपये के ड्रग्स मध्यप्रदेश के रास्ते उड़ीसा ले जाने की कार्य योजना बनायी है । भनक लगते ही करीम चाचा ने तुरंत उसकी सूचना उड़ीसा पुलिस तथा आबकारी विभाग को पहुँचा दी । पुलिस के उस ड्रग्स से भरी वैन को पकड़ने की पूरी तैयारी करने के पहले ही शासनतंत्र में छुपे हुए किसी मुखबिर के ज़रिये ये ख़बर उस स्मगलर तक पहुँच जाती है, यहाँ तक कि पुलिस को सूचना देने वाले का नाम और पहचान भी । उसके बाद जो होना था वही हुआ ।
न जाने कैसे दूसरे ही दिन सवेरे भुवनेश्वर के एक इलाके में अचानक एक मजहबी दंगे तथा लूटमार शुरु हो जाती है । सारे पुलिस फोर्स को पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार स्मगलिंग के सामान को पकड़ने के बजाए दंगा ग्रस्त इलाके की ओर कूच करा दिया जाता है । पुलिस मजहबी दंगे पर काबू पाने के पहले ही नौकरी के सिलसिले में भुवनेश्वर में रह रहे करीम चाचा की पुत्री के घर में आगजनी व लूटमार हो जाती है और उस आगजनी के लपट में करीम चाचा की इकलौती पुत्री नुसरत, उसके पति तथा दो बच्चे एक साथ जलकर स्वाहा हो जाते हैं । करीम चाचा अपनी बेटी-दामाद और उनेक फूल से बच्चों के जले हुए शवों के पास बैठकर तड़पता रहा, चिल्लाता रहा- “ये दंगा हुआ नहीं करवाया गया, गौतम-गाँधी के इस देश में के इस देश में सदियों से भाई-भाई की तरह रहने वाली शांतिप्रिय जनता कभी भी दंगे-फसाद चाहती नहीं । कुछ अदृश्य काले हाथ हमेशा ऐसा दंगा करवाते रहे-करवाते रहेंगे”, कहते कहते होश खो बैठता है ।
उसके बाद होश आया भी तो आधे-अधूरे । एत जिंदा चलते-फिरते जिस्म में एक दहकती आत्मा जो हर वो अन्याय, हर वो अत्याचार, हर वो गुनाह, हर एक गुनहगार को देखते तो है, आज के महाभारत में हर शकुनी की चाल को समझ तो सकते हैं पर एक भी अर्जुन को न्याय-युद्ध के लिए तैयार नहीं कर सकते, एक भी अभिमन्यु को चक्रव्यूह को भेदने की कला चाहकर भी समझा नहीं सकते । अपने ही दिले से निकले न्याय के बाणों से अपने आपको घायल तो कर सकते हैं, शर-शैय्या में सो तो सकते हैं । घर समाज में व्याप्त अन्याय युद्ध से दूर रहने के हिम्मत नहीं कर सकते। इस देश में महामारी जैसे फैल रहे बेइमानी, घूसखोरी, भ्रष्ट्राचार, राजनैतिक, वेश्या-वृत्ति की ओर आँखें तो बंद कर सकते हैं पर स्वार्थी भेड़ियों के कंठ से निकली वो आवाजे़- दार्जिलिंग को गोरखालैंड़ बनाओ, पंजाब को खालिस्तान बनाओ, अलग पर्वतांचल, उत्तराखंड, वनांचल, पृथक छत्तीसगढ़ चाहिए, रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा नहीं, मंदिर चाहिए, मस्जिद चाहिए, आदि को अपने कानों के पर्दे पर टकराने से रोक नहीं सकते । अपने आदर्श, अपने मानव धर्म को सीने में दफ़नाकर एक और पितामह बन सकते ।
32/बी, अकांक्षा कुंज, रिसाली भिलाई (छ.ग)
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