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कहानी |
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थोड़ा आसमान उसका अपना रवीन्द्र नाथ भारतीय
हमेशा की तरह, मैं खुश ही हूँ, तुम कैसे हो?कितने दिन हो गये तुमसे मिले । तुम्हारा क्या है, तुम तो अब भी वैसे ही कहते होगे सबसे बड़ी शान के साथ, "कविता, मैं किसी को याद नहीं रख सकता ! तुम तो एकदम याद नहीं आतीं, मैं तो हूँ ही ऐसा ।" पर मैं जानती हूँ तुम कैसे हो । ऐसा है ज्यादा हांकने की कोशिश मत किया करो । जैसे हो वैसे ही रहो तो अच्छा । अभी तो तुमने ऐसी दीवार उठा दी है कि तुमसे मिलना, पहले के जैसा ही हो चला है, पहले कम से कम एक आशा तो रहती थी कि तुम दिखोगे, अब तो तुमने वो भी गिरा ही दी है । क्यों किया तुमने ऐसा, क्या और कोई रास्ता नहीं था, जिस तरह मैं चल रही हूँ , तुम क्यों नही चल पाये । "क्या जो बीत गयी सो बात गयी" का पाठ स्कूल में बस मैनें पढ़ा था, सुनाते तो बहुत शान से थे तुम, जैसे सब समझ रहे हो, " अम्बर में एक सितारा था माना वो बेहद प्यारा था ", कहते कहते कैसे तुम धीरे से देखते थे आँखों से हँस देते थे, मुझे लगता मैं हरी दूब पर सुबह-सुबह नंगे पाँव चल रही हूँ । ताज़ी ठंड़ी हवा के बीच, ठंड से लिपटी , खुश्बू मे डूबी, फ़ूलों से भरे गुलदान सी शरम से लकदक! अब कहो कुछ, अब तो अच्छा लिखने लगी हूँ ना ...
घर में कैसे होंगे सब ? चाची के जोड़ों का दर्द अभी भी वैसा ही है या फ़ायदा हुआ उस दवा से जो चाचा जी लाये थे जब मैं आयी थी, देखा था मैंने । बेचारे कितने मन से लाये थे और चाची भी बस, सुन ही नहीं रही थीं । चाचा जी तो ठीक ही होंगे । अच्छा, उनकी वैचारिक गोष्ठियाँ नहीं होतीं क्या अब ? वो क्या नाम था, "फ़क्कड़ सभा ", अभी तक एक-एक गोष्ठी याद है मुझे तो, छुप छुप कर सुनते थे हम । नारी मुक्ति , दलित विमर्श और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और सबसे आगे हिन्दी की समस्या । खैर मुझे तो हंसी भी अयी थी यही बात याद करके जब तुम्हे चाचा जी ने इंगलिश स्कूल भेजा था पढ़ने के लिये, १२ के बाद, हास्टल में रहने । जाने कितनी बातें हैं बस बोलने और सुनने में अच्छी और आसान सी लगती हैं, हाँ करने में उतनी ही अजीब और मुश्किल....... । अच्छा उन गोष्ठियों की एक-एक बात समझाने में मुझे कितना समय लगता था, और तुम कैसे चिढ़ाते थे मुझे, दुष्ट कहीं के । याद है, कैसे हिमांशु जी ने वो कविता सुनायी थी, और फ़िर कहा था, "देश मे प्रेम सर्वाधिक प्राचीन और हाँ साथ ही सर्वाधिक उपेक्षित विषय है, घर-बाहर कितना अन्तर आ जाता है, इसके बारे में सोचने में, पढ़ तो सकते हैं, पर कर नहीं सकते, स्वीकार नहीं कर सकते, करता देख नहीं सकते । जिसने किया वो मानने से कतराता है, किसी और को देख उंगलियाँ भी उठाता है । और जाने कितने पड़े हैं जो कभी स्वीकार ही नहीं करते प्रेम, सफ़ायी मे बच्चन कि बातें, "प्रेम किसी से करना लेकिन करके उसे बताना क्या", झूठे , कपटी " । उन दिनों कैसे हम पर्दे के पीछे से सुनते रहते थे ये बातें , बाहर कौन जाये बाप रे, चाचा जी के गुस्से से तो अब भी डर ही लगता है । मेरे बाबू उनके इतने जिगरी दोस्त न होते तो मेरी ही क्या मजाल की मैं तुम्हारे घर आ भी सकती , और तुम भी इतने घर घुस्सू कहीं के, कि कहीं जाते क्यूं नही थे । फ़िर चले गये हॉस्टल अपनी पढ़ायी करने , और अब....अब तो ।
पता नहीं, अभी भी उनकी वो कविता मंड़ली वैसी ही है या अब कम हो गयी ?? कितनी कवितायें सुनी हैं हमने वहाँ । पराग जी, हिमांशु जी, अजय भैया सब अपने में मस्त ही होंगे ??? उनकी कवितायों की याद अभी भी आती हैं, कितनी बार इन लोगों की कवितायें सुन कर बस मन में नये नये अर्थ दुहराती, नयी- नयी कल्पनायें जोड़ती घर लौटती थी । अब लगता है वो सिर्फ़ अर्थ नहीं थे, इन्द्रधनुष के कुछ बिखरे टुकड़े थे, जिनसे पूरा आसमान नापना चाहती थी । एक किनारे खड़े तुम और दूसरा किनारा मेरा, इस इन्द्रधनुष के सहारे दूसरे किनारे पर, जैसे चिल्लाकर बोलती, " इतने किलोमीटर सुमित", तुम सुनने के बाद भी कान पर हाथ रख कर कहते "क्याSSSSSSSS ?"
जाने तुम्हारी बड़ी दीदी, मेरी प्यारी, मिताली दीदी भी कहाँ होंगी आज कल ?? उनकी कितनी याद आती है । अब, ये मत पूछ्ने लगना कि इतनी सारी यादों के बीच तुम्हारी नहीं आती क्या ? तुम हो ही ऐसे रास्ते के रोड़े जैसे, जब भी निकलती हूँ इधर से, कभी अंजाने और हाँ ज्यादातर जान बूझकर तुमसे चोट खाकर गिरना आदत सा बन गया है, और कितनी बार गिराओगे अभी ? खेलते-खेलते धक्का देकर गिराना तो आदत थी ही तुम्हारी, पर फ़िर भागते क्यों थे, भगोड़े, डरपोक, अभी भी गुस्सा ही आता है तुम्हारे ऊपर, मेरी कितनी नयी फ़्रोकें गंदी कीं तुमने, खेलना कभी आया नहीं तुम्हे बस लड़ाई करना आता था । पर लड़ाई करने की आदत यूँ भूल कैसे गये तुम, एक बार और लड़ नहीं सकते थे, जैसे मैं लड़ रही हूँ । दीवारों से लड़ाई अपने टूटे हाथों, पंखों के बाद भी, किसी खिड़की के खुलने की आशा में नही, बस एक ठंड़े हवा के झोंके के इन्तजार में, नये पंक्षियों के लिये आशा का दीप जलाती, कहीं भूल ही ना जायें ये नये पक्षी युद्ध लड़ना.. सुना था मिताली दीदी की शादी हो रही है, पर मैं जा नही पायी । इन्हें बहुत काम रहता है । मुझे ? मुझे तो कोई खास काम नही घर में, पर माता जी को देखने वाला कोई तो चाहिये । अब ये मत कहना कि सेठानी बनी बैठी रहती हूँ, खैर बैठी तो रहती ही हूँ पर सेठानी नहीं डाक्टरनी बनी । दाँत निकालो और कहो फ़िर तो दिन रात बीमार ही बनी रहती होगी ।
यहाँ पर भी सब अच्छे हैं । सुधा, इनकी छोटी बहन, का इस बार बी.एड. है, माता जी की पूजा में मैं भी बैठने लगी हूँ, अब ये मत कहना की पुरी भक्तिन ना बन जाना, तुम ये हर बात से नयी बात क्यों गढने लगते थे । नया घर अच्छी जगह लिया है इन्होंने, आस पास अच्छे लोग हैं । ये तो खैर इन्होंने ही बताया, मैं तो कहीं नहीं जा पाती । पता नहीं क्यों पर मुझे लगता है, जैसे इस घर की दीवारें बहुत ऊँची हैं, ठीक जैसे पुराने घर की थीं, जैसे मेरे घर की थीं, जैसे तुमने कभी कहा नहीं पर तुम्हारे घर की थीं, तुम भागते क्यों रहे सच से हमेशा । सुधा से भी मैनें पूछा एक दिन की क्या ये दीवारें हमेशा से ही ऐसी ही ऊँची रही हैं, उस पुराने घर में मैं तो नयी ही थी, उसने भी वही कहा जो मुझे अपने घर के बारे में लगता था, सच क्या है कौन जाने ? इतने मुखोटों के बीच असली चेहरे कहाँ है , कौन जाने ? वो भी मेरी तरह जान ही नहीं पायी कि दीवारें रातों-रात इतनी ऊँची हुईं कब, कैसे ? मजबूत हैं .... इतना आभास तो उसे भी रहा बचपन से, मेरी तरह, सड़क तक पार करने में बाबू की छंगुनिया के रूप मे, शाम कभी देर से आने पर माँ की डांट बन, और जाने कहाँ-कहाँ ।
सच, ऊँची दीवारों में रहती हूँ ये मुझे अपने घर में कहाँ पता था । उन दिनो जब मैं स्कूल में पढ़ती थी, और तुम शहर के हास्टल वाले स्कूल में, दिखती नही थी शायद ऊँचाई, रही जरूर होगी, मेरे बिना जाने तो कभी कुछ वहाँ बनवाया भी नही गया । पता नही शायद मैं सो रही होऊँ और रातों-रात दीवारें ऊँची हो गयी हों । हंसो मत, मुस्काये तो जरूर रहे होगे तुम, सुधर नहीं सकते तुम, कहीं भी रहो । सच कह रही हूँ , कभी जाना ही नहीं, कब मैं बढती गयी और वो दीवारें भी तो बढ़ ही रही थीं साथ-साथ ही । मेरा बढ़ना कुछ पसंद सा नही आया इन दीवारों को शायद, पर जाने जो अपनी सी लगती रहीं, जिन पर मैने खुद पैन्टिंग्स बना-बना कर सजावट की, झाड़ू मार-मार कर सफ़ायी की ,सजाया, जो मुझे धूप से, ठंड से बचाती रहीं, वही दीवारें धीरे-धीरे मेरे बिना जाने यों इतनी ऊँची, कैसे, क्यों होती गयीं.....
कई दिनो से देख रही हूँ ये मिट्ठू बहुत परेशान सा है । अब ये मत पूछ्ने लगना कि ये मिट्ठू कौन, नही तो समझ लो .., अरे वो हरियल जो मिताली दीदी ने दिया था मुझे, हरियल को यहाँ साथ ही लायी थी, बताया भी तो था तुमको, और तुम गुस्से में चले गये थे बाहर । भूल गये भुलक्कड़ ... हाँ इन्हे कुछ हरियल नाम पसन्द नही आया । इन्होंने कहा , तो मुझे भी लगने लगा कि हरियल कुछ गंवार सा नाम है, शहर का नाम, मिट्ठू , अच्छा है ना । पर फ़िर लगता है कि, नाम बदल गया ये उसे क्या पता, लगता है कि उसे इससे भी कोई फ़रक नही पड़ता कि उसका कोई नाम भी है । गाँव में रहे तो हरियल शहर में रहे तो मिट्ठू, पर रहेगा तो पिंजरे के ही भीतर, जो हम खाने को देंगे वही तो खायेगा ना । और उड़ना चाहे तो उड़ेगा कैसे, पिंजरा जो है । इसे आज कल जाने क्या हो गया है, इतने पंख फ़ड़फ़ड़ाता है, जैसे लड़ रहा हो किसी से, चाहे जो खाने को दो सुनता ही नही कुछ , इसका पिंजरा छोटा है शायद । अभी कुछ दिन पहले छत पर लेकर चली गयी थी इसे शायद आसमान देख लिय इसने भी, अब रह नहीं पा रह है , इसकी ऊँची-ऊँची, पिंजरे की दीवारें छोटी पड़ रही हैं शायद, काटने को दौड़ती हैं जैसे इसे, बस खुशी इस बात की है, खुद लड़ना भूला नहीं, रोता नहीं अपनी कैद पर, हार नहीं मानी इसने । अब कैसे पूछुं इससे इसकी भाषा भी तो नहीं आती । तुम्हे आती है? तुम्हें क्या आती होगी, आती होती तो.....
जाने आज क्यों वो सब याद आ रहा है, हमारा घर, उससे बस तीन गलियाँ दूर तुम्हारा घर, मिताली दीदी, तुम, चाचा जी, चाची, माँ, पिता जी, बुआ और भी बाकी सारे भी । और हाँ वो मैथ के सर क्या नाम था ...हाँ, मिश्रा जी, वो जाने कैसे होंगे । सच पूछो तो ऐसे कितने लोग हैं जिनकी याद आनी चाहिये पर नहीं आती । मिश्रा सर का वो चेहर तो अभी तक याद है, जब कितनी खुशी से वो पिता जी को बता रहे थे कि मैं मैथ में बहुत तेज हो गयी हूँ और मुझे बी.एस सी. करनी ही चाहिये, पर पिता जी का कहना था क्या करेगी, इसकी तो शादी की बात भी चल ही रही है । लड़का डाक्टर है, अच्छा ही है ये पढ़ायी में तेज है, पर बी .ए. कर ले, बहुत है, बी.एससी. है ही कहाँ यहाँ, कौन लेकर जायेगा इसे रोज-रोज कालेज तक २० किलोमीटर । अब भई इतनी मेहनत लड़कों के साथ चलो की भी जा सकती है, समझा करिये, बड़ी दिक्कत वाली बात है । दीवारें ऊँची लगने लगी थीं उसी दिन से, पर कितनी खुश हुई थी मैं जब अपने यहाँ भी बी. एससी. शुरु हो गया था, उसी साल । मिश्रा जी ने सबसे पहले पिता जी को ही बताया था, और मैं कहती थी ना कि पिता जी मान जायेंगे उन्होंने एडमीशन भी तो करवा दिया था ।
अभी सोच रहे होगे, कि मैने बी.एस.सी. पूरा क्यों नही किया । मुझे तो कोई जरुरत ही नही थी, क्या करती और अभी भी क्या कर रही हूँ बी.ए. का भी । हंसो और कहो डाकटरनी हो ना मजे से बैठी ही तो रहती होगी । घर की दीवारों में आँखें भी तो थीं, बड़ी बड़ी तेज़ आँखें, आंखें दीवारों की तरह एक जगह रुकी हुयी कहाँ थीं, घूमती रहती थीं, मेरे आगे पीछे, ऐसी ही किसी आंख ने क्लास के बाद , वो एक मुसलमान लड़का था ना , मुझे तो नाम भी याद नहीं अब, उससे बात करते देख लिया था । उस दिन के बाद दीवारों ने मुझे बस बी. ए. की परीक्षाओं के लिये ही निकलने दिया, और फ़िर यहाँ के लिये इनके साथ कार में, तुम्हारे घर भी तो कितना कम आने लगी थी । तुम क्या जानो तुम तो परदेसी ठहरे, आते ही कितना कम थे, कितनी पढ़ाई थी । उस दिन वो | |||||||||||||||