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इन दिनों |
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जो मनुष्य बनना सिखाए, वही धर्म है विश्वनाथ सचदेव
इस गीता यज्ञ की शुरुआत अचानक ही हो गई थी, 1997 में उन्हें इस मंदिर में रामनवमी के अवसर पर व्याख्यान के लिए बुलाया गया। उस दिन उनकी भाषण सुननेवाले सारे कट्टर ब्राह्मण थे। और सब उनकी विद्धता से प्रभावित थे। फिर तो हर रामनवमी पर मंदिर में प्रोफेसर सलाम का भाषण जैसे अनिवार्य सा हो गया। फिर कब यह भाषण प्रवचन बन गया, किसी को पता ही नहीं चला. स्वयं सलाम को भी नहीं।
धार्मिक सौहार्द्र सात साल पहले मंदिर के पदाधिकारियों ने प्रोफेसर सलाम से आग्रह की कि वे गीता पर साप्ताहिक प्रवचन दिया करें, हिंदू और मुसलमान, दोनों ही समुदायों के कुछ कट्टरपंथियों को यह बात रास नहीं आती थी लेकिन सलाम और उनके प्रशंसकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा । प्रवचन का क्रम जारी रहा । प्रोफेसर सलाम गीता का रहस्य समझाते रहे और उसे ब्राह्मण श्रोता लगन और श्रद्धा से सुनते रहे। वे सलाम से प्यार करते हैं। वैष्णव साहित्य में उनकी रुचि और उनके पांडित्य को सलाम करते हैं । मजे की बात यह है कि अब मीलाद-उन-नबी पर मस्जिद में भी सलाम को तकरीर के लिए बुलाया जाने लगा है।
किसी मुसलमान द्वारा हिंदू धर्म ग्रंथ की व्याख्या करना कोई नई बात नहीं है। ‘ऐसे मुसलमान पर कोटिन हिंदु वारिये’ वाली बात सलाम जैसे लोगों के लिए ही कही गई । राम और कृष्ण के दीवाने मुसलमान भक्तों की गाथाएं और उनकी कृतियाँ भारतीय साहित्य का हिस्सा है। और ऐसे हिंदू भी अनेक हुए हैं। जिन्होंने मुस्लिम, धर्मग्रथों का विशद अध्ययन किया है। धार्मिक भावना की दृष्टि से यह सब निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन गीता को इस मुसलमान व्याख्याता का महत्व इसलिए कहीं अधिक है कि वह साम्प्रदायिक विद्वेष की दीवारों को ढहाने में लगा है, स्वतंत्र भारत में जिस तरह से बार-बार साम्प्रदायिक की आँच पर राजनीतिक स्वार्थों की रोटियाँ सेंकी गई हैं और जिस तरह भोले-भोले हिंदुओं और मुसलमान को साम्प्रदायिकता का मोहरा बनाया गया है। उसे देखते हुए दक्षिण तमिलनाडु के कोथांदरमार मंदिर में सात साल से चल रहा यह गीता यज्ञ प्रेरणा भी देता है और इस विश्वास की भी पुष्टि करता है कि कोई भी धार्मिक चिंतन आपस में लड़ाने के संदेश नहीं देता ।
हर गुरुवार को प्रोफेसर सलाम का प्रवचन सुनने के लिए जाने वाली सुधा नारायणन ने इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण बात कही है। उनका कहना है कि भले ही सामान्यतः गैरे अर्थ वालों को ध्वजम् स्तंभ से आगे न जाने दिया जाता हो, लेकिन यह कोई नियम नहीं। श्रद्धा और भावना के साथ आने वाले हर व्यक्ति के लिए मंदिर के दरवाजे खुले रहने चाहिए । सुधा नारायणन सिर्फ गीता प्रवचन सुनने आती है। लेकिन, उनका यह कथन स्पष्ट बताता है कि वे प्रोफेसर सलाम से गीता सुनती ही नहीं, उस गुनती भी हैं। किसी सलाम का मंदिर में गीता प्रवचन और किसी सुधा की यह टिप्पणी तब कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। जब उसे इस पृष्ठभूमि में समझने की कोशिश की जाए कि 21 वीं सदी के भारत में ऐसे भी उदाहरण हैं । जब गैर अर्थ वाले का मंदिर में प्रवेश ‘शुद्धिकरण’ का कारण बना है। जिस दिन अखबार में प्रोफेसर सलाम के मंदिर में प्रवचनों वाली यह खबर छपी थी, उसी दिन एक खबर और भी अखबार में, इस खबर के मुताबिक पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में हजारों किलों भात इसलिए गडढा खोदकर दबा दिया गया था कि किसी विधर्मी ने मंदिर में प्रवेश करके सारा प्रसाद अपवित्र कर दिया था। उसे हजारों किलों भात को भूखों में बाँटने लायक भी नहीं माना गया।
मानसिकता और यह उसी उड़ीसा में हुआ, जहाँ कुछ ही अर्सा पहले एक माँ ने अपनी नन्हीं सी बेटी को इसलिए 10 रुपए में बेच दिया था कि बेटी को पेट भरने वाला मिल जाए और माँ का पेट भरने के लिए दस रुपए । यह भी 21 वीं सदी का भारत है। सवाल सिर्फ भूख मिटाने का नहीं है। सवाल उस मानसिकता का है, जो किसी को सिर्फ इसलिए अस्पृश्य और अपवित्र बना देती है कि वह किसी और धर्म का है। फिर भले ही वह कितना ही नहाया धोया या कितना ही विद्वान क्यों न हो।
जगन्नाथ मंदिर के सारे प्रसाद को अपवित्र बना देने वाला वह व्यक्ति उस देश से आया था, तहाँ का अनाज हमने बरसों खाया है और बहुत संभव है। उस दौरान मंदिर का प्रसाद भी उसी अनाज से बनता हो। प्रसाद का सीधा रिश्ता भावना से होता है। और जिस प्रसाद को अपवित्र मानकर गड्डे में दबा दियागया था, उसका रिश्ता उस भूख से भी हो सकता है। जो आज भी हमारे देश के कई हिस्सों का अभिशाप बनी हुई है।
बहरहाल तमिलनाडु औ पुरी के मंदिर को यह दो उदाहरण समूचे भारतीय समाज की आँखे खोलने वाले हैं अथवा आँख खोलनेवाले होने चाहिए ? किसी मुसलमान द्वारा मंदिर के प्रागण में बैठकर हिंदुओं को गीता समझाने के दृश्य की कल्पना ही एक सुखद अहसास दे जाती है और इसके बरक्स है पुरी का उदाहरण। क्या यह संभव नहीं है कि हम मनुष्य को मनुष्य के रूप में स्वीकारें, उसे जाति और धर्म की दृष्टि से न देखें ? तब किसी सलाम के गीता पढ़ने-पढ़ाने से आश्चर्य नहीं होगा, एक स्वाभाविक और जरूरी बात लगेगी यह । स्वाभाविकता का यह अहसास जबतक नहीं जगता, तब तक हमें तमिलनाडु के मंदिर के इस उदाहरण को एक प्रेरणा के रुप में स्वीकार करना चाहिए और पुरी के मंदिर के उदाहरण को एक विसंगति के रूप में कोई भी धर्म भेदभाव की शिक्षा नहीं देता और कोई भी धर्म भूख को न पहचानने की बुद्धि भी नहीं देता। धर्म नहीं है जो हमें मुनष्य बनना सिखाए; हमें जोड़े, बाँटे नहीं ।
संपादक, नवनीत मुंबई, महाराष्ट्र
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