|
|
||||||||||||||
|
|
||||||||||||||
|
|||||||||||||||
|
◊अपनी बात◊कविता◊छंद◊ललित निबंध◊कहानी◊लघुकथा◊व्यंग्य◊संस्मरण◊ कथोपकथन◊ भाषांतर◊संस्कार◊पुस्तकायन ◊बचपन◊हलचल◊विशेषांक◊सृजनधर्मी◊लेखकों से◊संपादक बनें◊चतुर्दिक्◊शेष-विशेष◊पुरातनअंक◊अभिमत◊मुख्यपृष्ठ |
|
|||||||||||||
|
हस्ताक्षर |
|
हस्ताक्षर |
|||||||||||||
|
राष्ट्रकवि सोहन लाल द्विवेदी अच्युतानंद मिश्र
राष्ट्रकवि पण्डित सोहन लाल द्विवेदी का यह जन्मशती वर्ष है, कानपुर के पास बिन्दकी में सौ साल पहले उनका जन्म 22 फरवरी 1906 को हुआ था,लेकिन जन्मशती के बहाने ही सही, उनकी स्मृति जगाने का कोई केन्द्रीय आयोजन सरकारी या गैर सरकारी हिन्दी संस्थाओं द्वारा भी नही किया गया। सोहनलाल जी के साथ जुड़ा राष्टकवि का अलंकरण सरकारी कृपा ही नहीं बल्कि भारतेन्दु की तरह फनकी लोक स्वीकृति का प्रमाण है।
मैथिलीशरण गुप्त,
माखनलाल चतुर्वेदी,
बालकृष्ण शर्मा नवीन,
रामधारी सिंह दिनकर,
रामवृक्ष बेनी
पंडित सोहनलालजी, महत्मा गाँधी के अहिंसा दर्शन के लिए पूर्ण समर्पित थे, और हिन्दी राष्ट्रीयता का स्वाभिमान, खादी का सम्मान और देश के नन्हें नौनिहालों के लिए अटूट आशीर्वाद उनके जीवन का लक्ष्य बन गया था, उन्होंने अपने साहित्य सेवा को राजनीतिक लाभ, सम्मान या व्यवसाय कभी बनने नहीं दिया इसी लिए उनके कवि मानस को पूर्वाग्रहहीन और जनोन्मुखी माना गया है। 2 अक्टूबर 1944 को, उन्होंने महत्मा गाँधी को उनके 77वें जन्मदिवस पर स्वयं सम्पादित गाँधी अभिनन्दन ग्रन्थ भेंट किया था, जिसमें भारतीय भाषाओं में गाँधी पर लिखी गई सुन्दर रचनाओं का संकलन था,इस ग्रन्थ की भूमिका डा.सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने लिखी थी गाँधी पर वह पहला अभिनन्दन ग्रन्थ था। गाँधी जी ने 12 मार्च 1930को अपने 76 सत्याग्रही कार्य कर्त्ताओं के साथ साबरमती आश्रम से 200 मील दूर दांडी मार्च किया था। भारत में पद यात्रा, जनसंपर्क और जनजागरण की ऋषि परम्परा मानी जाती है। आज उस परिघटना की 45 वीं जयन्ती देश में बडे.गौरव से मनाई जा रही है। उस यात्रा पर अंग्रेजी सत्ता को ललकारते हुए सोहनलाल जी ने कहा था -"या तो भारत होगा स्वतंत्र, कुछ दिवस रात के प्रहरों पर या शव बनकर लहरेगा शरीर, मेरा समुद्र की लहरों पर, हे शहीद, उठने दे अपना फूलों भरा जनाजा आज दांडी मार्च के उत्सव में सोहनलालजी का जिक्र कहीं है ?
पंडित बैजनाथ द्विवेदी उर्फ डा0 हजारी प्रसाद द्विवेदी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में सोहनलालजी के सहपाठी और मित्र थे। उन्होंने अपने मित्र पर एक लेख लिखा था।
विश्वविद्यालय के विद्यार्थी समाज में उनकी कविताओं का बडा गहरा प्रभाव पडता था। उन्हें गुरूकुल महामना मदनमोहन मालवीय का आशीर्वाद प्राप्त था। अपने साथ स्वतंत्रता संग्राम में जूझने के लिए नवयुवकों की टोली बनाने में वे सदा सफल रहे भाई सोहनलालजी ने ठोंकपीट कर मुझे भी कवि बनाने की कोशिश की थी, छात्र कवियों की संस्था ‘ सुकवि समाज 'के वे मंत्री थे और मै संयुक्त मंत्री, बहुत जल्दी ही मुझे मालूम हो गया कि यह क्षेत्र मेरा नहीं है, फिर भी उनके प्रेरणादायक पत्र मिलते रहते थे। यह बात शायद वे भी नहीं जानते थे कि हिन्दी साहित्य की भूमिका 'मैने उन्हीं के उत्साहप्रद पत्रों के कारण लिखी थी।
उस दौर की राष्ट्रीयता चेतना प्रधान रचनाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सोहनलालजी के खाते में है, सन् 1941 में देश प्रेम से लबरेज भैरवी, उनकी प्रथम प्रकाशित रचना थी। उनकी महत्वपूर्ण शैली में पूजागीत, युगाधार, विषपान, वासन्ती, चित्रा जैसी अनेक काव्यकृतियाँ सामने आई थी। उनकी बहुमुखी प्रतिभा तो उसी समय सामने आई थी जब 1937 में लखनऊ से उन्होंने दैनिक पत्र अधिकार का सम्पादन शूरू किया था। चार वर्ष बाद उन्होंने अवैतनिक सम्पादक के रूप में " बालसखा'' का सम्पादन भी किया था देश में बाल साहित्य के वे महान आचार्य थे। उनके सहज और बाल सुलभ ह्वदय को, उनकी मृत्यु 1 मार्च 1988 तक, जिन्होंने देखा था, उनकी संख्या अंगणित है। शिशुभारती, बच्चोंके बापू , बिगुल , बाँसुरी , और झरना, दूध बतासा, और दर्जनों रचनाएँ भी बच्चों को आकर्षित करती हैं। 1969 में भारत सरकार ने आपको पद्दश्री उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया था।
सोहनलाल द्विवेदी की अविस्मरणीय रचना
युगावतार गांधी (अंश)
चल पड़े जिधर दो डग,
मग में,
चल पड़े कोटि पग उसी ओर
हे युग-दृष्टा,
हे युग-स्रष्टा, (लोकमंच्र डॉट कॉम से साभार)
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल, मध्यप्रदेश
|
|||||||||||||||
|
|||||||||||||||
|
|
|||||||||||||||
|
|||||||||||||||
|
|||||||||||||||