रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 12, मई, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

ग़ज़ल

सृजनगाथा का एक साल

सहभागी लेखकों को बधाई

ग़ज़ल

 

दो ग़ज़लेः शहरयार

एक

नज़र जो कोई भी तुझ सा हसीं नहीं आता ।

किसी को क्या मुझे ख़ुद भी यक़ीं नहीं आता ।।

 

तेरा ख़्याल भी तेरी तरह सितमगर है

जहाँ पे चाहिये आना, वहीं नहीं आता ।

 

जो होने वाला है अब, उसकी फ़िक़्र क्या कीजे

जो हो चुका है उसी पर यक़ी नहीं आता ।

 

यह मेरा दिल है कि मंजर उजाड़ बस्ती का

खुले हुए हैं सभी दर मकीं नहीं आता ।

 

बिछड़ना है तो बिछड़ जा इसी दोराहे पर

कि मोड़ आगे सफ़र में कहीं नहीं आता ।

 

दो

 

बिला सबब नहीं बेजार आसमान से हम ।

ख़रीद लाए हैं कुछ ख़्वाब इस दुकान से हम ।।

 

तमाम उम्र मगर इज़्तिराब में गुजरी

मिसाले-तीर निकल आए हर कमान से हम ।

 

हवा के साथ ने मिस्मार कर दिया उसको

सरों को फोड़ने निकले थे जिस चट्टान से हम ।

 

इसीलिए हमें जीने की थी हवस शायद

तुम्हारा नाम सुनें, ग़ैर की ज़बान से हम ।

 

समन्दरों को सफ़र ख़त्म हो गया होता

जुदा न करते जो कश्ती को बादबान से हम

शहरयार

पूर्व प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय

अलीगढ़

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

 

Google
WWW http://www.srijangatha.com