|
|
||||||||||||||
|
|
||||||||||||||
|
|||||||||||||||
|
◊अपनी बात◊कविता◊छंद◊ललित निबंध◊कहानी◊लघुकथा◊व्यंग्य◊संस्मरण◊ कथोपकथन◊ भाषांतर◊संस्कार◊पुस्तकायन ◊बचपन◊हलचल◊विशेषांक◊सृजनधर्मी◊लेखकों से◊संपादक बनें◊चतुर्दिक्◊शेष-विशेष◊पुरातनअंक◊अभिमत◊मुख्यपृष्ठ |
|
|||||||||||||
|
ग़ज़ल |
|
ग़ज़ल |
|||||||||||||
|
दो ग़ज़लेः शहरयार एक नज़र जो कोई भी तुझ सा हसीं नहीं आता । किसी को क्या मुझे ख़ुद भी यक़ीं नहीं आता ।।
तेरा ख़्याल भी तेरी तरह सितमगर है जहाँ पे चाहिये आना, वहीं नहीं आता ।
जो होने वाला है अब, उसकी फ़िक़्र क्या कीजे जो हो चुका है उसी पर यक़ी नहीं आता ।
यह मेरा दिल है कि मंजर उजाड़ बस्ती का खुले हुए हैं सभी दर मकीं नहीं आता ।
बिछड़ना है तो बिछड़ जा इसी दोराहे पर कि मोड़ आगे सफ़र में कहीं नहीं आता ।
दो
बिला सबब नहीं बेजार आसमान से हम । ख़रीद लाए हैं कुछ ख़्वाब इस दुकान से हम ।।
तमाम उम्र मगर इज़्तिराब में गुजरी मिसाले-तीर निकल आए हर कमान से हम ।
हवा के साथ ने मिस्मार कर दिया उसको सरों को फोड़ने निकले थे जिस चट्टान से हम ।
इसीलिए हमें जीने की थी हवस शायद तुम्हारा नाम सुनें, ग़ैर की ज़बान से हम ।
समन्दरों को सफ़र ख़त्म हो गया होता जुदा न करते जो कश्ती को बादबान से हम
पूर्व प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय अलीगढ़
|
|||||||||||||||
|
|||||||||||||||
|
|
|||||||||||||||
|
|||||||||||||||
|
|||||||||||||||