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संपादकीय |
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संपादकीय |
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।। कृतज्ञता के दो शब्द ।।
इ
प्रिंट जगत् और खास कर हिंदी लघुपत्रिका वालों में भी पनप रही गुटवादिता, कुंठा और रूढिवादिता से विमुखता की वजह से ही वैश्विक मंच अतंरजाल पर लघुपत्रिका प्रकाशन का मार्ग पकड़े थे - ठीक आज से एक वर्ष पहले । कि यहाँ स्वस्थ परंपरा से हिंदी साहित्य को वैश्विक बनाने की दिशा में प्रयास किया जाय । भले ही वह गिलहरी सा प्रयास क्यों न हो । इस एक वर्ष का अनुभव हमें दो पाठ देता है - पहला यह कि यहाँ भी कुछ हद तक वही माहौल है जो प्रिंट पत्रकारिता की दुनिया में है । वही शिविरबाजी, साहित्य को लेकर वही निजी मान्यताएं, तथाकथित अनुभवी होने के नाते अहंमन्यता और कछुवे और शुतुरमुर्ग सी पैंतरेबाजी । जो अंतरजाल में साहित्य को लेकर पनप रहा खतरा है । और इस खतरे से बचना जरूरी होगा ।
दूसरा यह कि यहाँ हिंदी की वरिष्ठ पीढ़ी अभी भी नकारात्मक रवैये में है । सच कहें तो हिदीं की समकालीन रचनाशीलता का भी यहाँ अभी प्रदर्शन होना शेष है । जो इंटरनेट की टायपिंग कार्य में पारंगत हैं और खास कर शहरी इलाकों से हैं, वे ही अब तक अंतरजाल पर लिख-पढ़ रहे हैं । यहाँ यह भी दोहराना उचित होगा कि नयी पीढ़ी खासकर शहरी और अंतरजाल पर सक्रिय रचनाकार (?) अब तक केवल चिट्ठाकार की तरह निर्बंध लेखन को साहित्य समझ रहे हैं और खास तौर पर साहित्य के प्रति असतर्क हैं । अंतरजाल की भाषा भी इससे प्रदूषित हो सकती है । इसके लिए उनसे निवेदन ही तो किया जा सकता है । और यह भी कहा जा सकता है कि प्रलाप और प्रलेखन के बीच स्पष्ट अंतर है जिसे पहचानना भी होगा । तभी हिंदी का विकास होगा । अन्यथा अंतरजाल यानी कि वेब पत्रिकाएं भोथरे पन्नों का पुलिंदा साबित होगीं ।
गाँव से सृजित साहित्य अभी अंतरजाल की पत्रिकाओं में न के बराबर है । यह चिंता का भी विषय है । वैसे हमने प्रयास किया है कि लगातार उन्हें प्रकाशित किया जाय जो दूरस्थ इलाकों से हैं । आने वाले समय में हम निश्चय ही गाँव की माटी से सृजित रचनाओं को प्राथमिकता देंगे । दरअसल हिंदी लेखन का जो हिस्सा गाँव-गलियों से आ रहा है वह समकालीन समय की चुनौतियों से मुठभेड करने में ज्यादा कारगर भी नज़र आ रहा है । वहाँ वैश्वीकरण, बाजारवादी ताकतों, साम्राज्यवादी मानसिकता का पुरजोर विरोध भी मुखरित हो रहा है जो नये ज़माने की कृष्णपक्षीय शक्तियों से टकराने के लिए आवश्यक है । तो कहने का मतलब यह है कि आने वाले दिनों में अंतरजाल पर हिंदी को उसके अपने मूल चरित्र के साथ प्रस्तुत करने के लिए जरूरी है कि अंतरजाल से दूर रहने वाले साहित्यकारों को भी जोड़ा जाय । हमने इसी दृष्टि से कुछ खास विधाओं के शास्त्र पर भी सामग्री देने का प्रयास इस बीच किया है । भविष्य में लगातार इस पथ पर चलते रहेंगे ताकि अंतरजाल पर नयी पीढ़ी को जो खासकर केवल अंतरजाल पर सक्रिय हैं विधागत ज्ञान निरंतर मिल सके ।
हम यह सीख ले रहे हैं । देने की स्थिति में नहीं हैं । सीख देना हमारा कर्तव्य भी नहीं है । जो कर पायेंगे हम यहाँ सृजनगाथा के माध्यम से करेंगे । इस अंक से ब्रिटेन की डायरी नामक नया स्तम्भ प्रारंभ हो रहा है । राकेश दुबे इसे नियमित बनाये रखेंगे । आने वाले दिनों में चीन और अमेरिका से भी क्रमशः पंडित नरेन्द्र शर्मा की बेटी लावण्या शाह और राजनंदन जी अपने देश की पड़ताल हिंदी को लेकर किया करेंगे । कुल मिलाकर हम यहाँ विश्व में हिंदी और उसकी संस्कृति का मूल्याँकन लगातार करने का प्रयास करेंगे ।
हमें यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हमारे पाठकों के लिए जाने माने कथाकार सूरज प्रकाश हर माह एक कहानी लिखेंगे । जिस तरह देश के प्रख्यात पत्रकार और संपादक श्री विश्वनाथ सचदेव जी ने हमारे लिए नियमित लिखना स्वीकारा है वह उनकी उदारता का परिचायक है, जिनके प्रति हम आभार मानते हैं । भविष्य में हम साहित्य के सभी पक्षों पर सारगर्भित सामग्री दे सकेंगे । ऐसा हमारा विश्वास है और निष्ठा भी ।
आप सभी लेखकों, पाठकों से इस निवेदन के साथ कि आपका सहयोग हमें लगातार मिलता रहेगा । जयहिंद!
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