रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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व्यंग्य

गीत का फिल्मी होना और फिल्म का

        ह एक गुरु गंभीर साहित्यिक गोष्ठी का निमंत्राण था और उसमें भाग लेने के लिए मैं लगभग भागा - सा चला जा रहा था । मेरे भागने का कारण गोष्ठी की गुरुता का आतंक नहीं अपितु कहीं भी समय से पहुँचने की प्राध्यापकीय मानसिकता का सुफल था ।  ज्ञानीजन मास्टरी मानसिकता के उत्पादन को कुफल ही मानते हैं, यही कारण हे कि प्राध्यापकीय समीक्षा को एक गाली की तरह संत समाज में माना जाता है ।  कॉलेज में पीरियड में बंटा दिन आपको ऐसा मशीनी बना देता है कि समय पर जब घंटी नहीं बजती है तो मस्तिष्क में घंटी बजने लगती है और निगाहें कभी दीवार -घड़ी और कभी कलाई की घड़ी पर फिसलती बेचैन करती रहती हैं कि समय तो हो गया पर घंटी क्यों नहीं बजती । यह लगभग वैसा ही जैसे रेल की पटरियों के पास रहने वालों की नींद तब उचटती है जब रेलगाड़ी समय से नहीं गुजरती है, समय से गुजर जाए तो नींद के उचटने का सवाल ही नहीं पैदा होता है । समय की ये घंटियां अवसर मिलते ही बजने लगती हैं । जानते हैं कि सभी कार्यक्रम भारतीय समय के अनुसार ही होते हैं और भारतीय समय का कोई निश्चित समय नहीं होता है फिर भी यह घंटी आपको दौड़ाए लिए जाती है । गोष्ठी का समय पाँच बजे का था और मेरी घड़ी में पाँच बजकर दस मिनट हो चुके थे और अभी दस मिनट का समय और लगने वाला था पहुँचने में । मुझे सड़क किनारे आराम से चलने वालों से ईष्या हो रही थी । ऐसी ही ईष्या मुझे अपने से लगभग पंद्रह कदम आगे हस्त-मस्त चाल से चल रहे सज्जन को देखकर भी उपजी । थोड़ा पास पहुँचा तो किसी फिल्मी गीत के गुनगुनाहट ने मेरी ईष्या को और बढ़ा दिया । यदि आप दुखी है तो आपको अपना दुख तब तक इतना नहीं सालता है जब तक आप किसी सुखी को नहीं देख लेते हैं । और पास पहुँचा तो पाया, बेतरतीब दाढ़ी एवं अकलात्मक झोले से युक्त गुरु गंभीर साहित्यकार श्री श्री 1008 थे । उन्हें मैंनें आज तक मुस्कराते नहीं देखा था पर आज तो उन्हें मैं फिल्मी गाना गुनगुनाते सुन रहा था । मैंने उनकी संगीत साधना को भंग करने का अपराध किया और उनके गुरुत्व को प्रणाम किया । उनके गुनगुनाने पर जैसे आपातकालीन ब्रेक लग गई । चीं चींचीं क़ी आवाज तो नहीं आई पर ब्रेक तो लगी ही । उनका सरल चेहरा सख्त हो गया और उसपर गुरु गंभीरता छा गई पर उस गंभीरता में कहीं यह अहसास भी था कि चोरी पकड़ी गई है । आजकल सच्चा संत वही होता है जो आवश्यकता पड़ने पर सांसारिक राग विराग से ऊपर उठ जाता है और अपने विरुद्ध उठे स्वर को तिनके के समान देखता है तथा उसे तिनका सिद्ध करने के लिए गुरु गंभीर प्रश्न उठा देता है । श्री श्री 1008 भी ऐसे ही साहित्यिक संत हैं अत: उन्होंने गुरु गंभीर प्रश्न हवा में उछाला - हूँ आप भी बढ़ते हुए उपभोक्तावाद और फासीज़्म के विरुद्ध हुई एकजुट होने के लिए गोष्ठी में चल रहे हैं न । जानते हैं यह आज का बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल है ।''

 

         मेरे हाँ कहने पर उन्होंने इस सवाल पर अपने गुरु गंभीर चिंतन को  मुझे अकिंचन पर ऐसा लादा कि पता ही नहीं चला कि रास्ता कब तय हो गया और उन्होने जो वैचारिक खुराक पिलाई उससे लगा कि गोष्ठी तो हो गई ।

 

        गोष्ठी स्थल पर पहुँचे तो पाया कि आयोजक ही उपस्थित है और फिनिशिंग टच दे रहे हैं । मेरे साथ आए गुरु गंभीर साहित्यकार को आयोजको ने तेरा तुझको अर्पण की शैली में अर्पित कर दिया और अर्पित हुए गुरु गंभीर स्वास्थ्य के मामले में ऐसे गुरु थे कि पल भर भी खड़े होने पर उनके शरीर का गुरुत्वाकर्षण बिगड़ने लगता था । अत: उन्हें खाली -खाली कुर्सियां हैं वाले हॉल में ले जाने का दायित्व मुझे दिया गया । हॉल में हैलो हैलो माईक टेस्टिंग का स्वर गूंज रहा था । माईक टेस्टिंग के बाद खाली हॉल को स्वर से भरने के लिए 'आम आदमी' ने अपने पसंदीदा फिल्मी गानों को कैसेट लगा दी । गुरु गंभीर जी एक गंभीर विषय पर मुझे ज्ञान दे रहे थे । फिल्मी संगीत ने उनकी तपस्या को भंग कर दिया और उन्होनें आम आदमी को सही दिशा देते हुए चिल्लाकर कहा - ये कौन है जिसने वाहियात फिल्मी गाने लगा दिए हैं, बंद करो इसे । '' सहमे -से आम आदमी ने आदेश का पालन किया हाल में आम आदमी की चिंताओं पर होने वाले  साहित्यिक कार्यक्रम में गुरु गंभीर शांति पसर गई ।

 

        अनेक साहित्यिक उपमाओं से युक्त उस गाने - एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा - में कहीं भी कुछ वाहियात नहीं था, हाँ यदि कुछ वाहियात था तो उसका फिल्मी चोला जिसे श्री श्री 1008 सह नहीं पाए थे।

 

        हम सबके अंदर एक और इसांन बैठा हुआ है जिसके कारण अक्सर हम वो नहीं होते हैं जो हमें होना चाहिए । इसके कारण ही हमारे कर्म और चिंतन में अंतर आता हे । इस भीतरी इंसान के कारण ही अक्सर व्यक्ति भीतरी घात भी करता है । इस भीतरी इंसान के कारण ही व्यक्ति अविश्वसनीय कहलाता है और असत्यवादी भी  । किताब की दुनिया भी अजब दुनिया है । अपने ही घेरों में अनेक घेरे बना लेती है और अपने अपने दायरों में अति व्यस्त रहती है ।

 

        ऐसे में सवाल उठता है कि हम आम आदमी के बारे में साहित्य लिखते हैं या आम आदमी के लिए । दोनों में बहुत बड़ा अंतर है । आम आदमी के लिए लिखा साहित्य लोकप्रिय होता है और पापुलर साहित्य की कोटि में आता है । लोकप्रिय तो वही है न जिसे अधिक से अधिक लोग पढ़ते हैं । पर इसके साथ ही सवाल उठता है कि जिसे अधिक से अधिक लोग पढ़ते हैं, वह है क्या ? क्या वह लोकप्रिय मानवीय समाज का शुभचिंतक है ? क्या वह साहित्य के लिखित उद्देश्यों की पूर्ति करता है ?

 

        हिंदी में बहुत सारे ऐसे पापुलर लेखक हुए हैं जिन्हें हिंदी साहित्य के विद्वत् समाज ने अपने किशोर काल में पढ़ा है पर परिपक्व होते ही उसका विरोध किया है । गुलशन नंदा या ओम प्रकाश जैसे अनेक नाम हैं जो हर समय में नाम बदल- बदल कर किशोर मानसिकता लुभाते हैं । इन्हीं नामों के चलते हिंदी में घोस्ट राईटिंग का जन्म भी हुआ । प्रकाशकों ने लेखकीय नाम पंजीकृत करवा लिए और उनके नाम से लेखन की दुनिया में प्रवेश को इच्छुक लेखकों को अपने फंदे में फंसा । ऐसे लेखक अतिशीघ्र लोकप्रियता की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं और बहुत जल्दी धुंधला भी जाते हैं । इनकी लोकप्रियता अल्पकालीन होती है ।

 

        दूसरी ओर ऐसा भी साहित्य है जो धीरे- धीरे लोकप्रियता की सीढ़ियां चढ़ता है और देश काल की सीमा लांघता हुआ सार्वकालिक हो जाता है । हिंदी साहित्य में तुलसी, कबीर, सूर  भारतेंदु, प्रेमचंद आदि का साहित्य ऐसा ही लोकप्रिय साहित्य है । अंतर्राष्ट्रीय जगत में शेक्सपियर, टॉलस्टॉय, गोर्की, चेखव, ओ हैनरी आदि की लोकप्रियता निरंतर विकसित हुई है ।

 

        ऐसे में साहित्य के अलोकप्रिय होने को अच्छे साहित्य की कसौटी मानना समझदारी नहीं होगा । लोकप्रियता को अस्पृश्य मानना कहाँ तक उचित है? हिंदी साहित्य के अधिकांश साहित्यकारों की मानसिकता है कि लोकप्रिय होते ही साहित्य साहित्य नहीं रहता है

 

        ऐसा ही सवाल हिंदी फिल्मी गीतों के संदर्भ में उठाया जाता है । हमारा अस्पृश्यतावादी एवं साहित्यिक संप्रदायवाद से संकुचित मस्तिष्क बहुत ही घृणित दृष्टि से ऐसे सवालों को देखता है । वैसे तो इस प्रकार के सवालों पर नज़रअंदाज करने वाली उपेक्षणीय दृष्टि का प्रयोग किया जाता है और यदि कुछ कहने की विवशता हो तो इस अंदाज़ में बात किया जाता है जैसे बहुत ही लिजलिज चीज को छू लिया हो । मुझे याद आता है कि बहुत पहले रूस में कलाकारों, साहित्यकारों आदि का प्रतिनिधिमंडल गया था। इस प्रतिनिधिमंडल में डॉ0 नगेंद्र्र भी थे और राजकपूर भी थे । राजकपूर को रूस में लोकप्रियता तो मिलनी ही थी और उनकी तुलना में डॉ0 नगेंद्र को जो मिलना था उसकी आप कल्पना कर सकते हैं । डॉ0 नगेंद्र से जब एक जिज्ञासु ने उनकी यात्रा के बारे में पूछा और यह भी पूछा कि और कौन- कौन लोग थे आपके साथ तो उन्हें कुछ साहित्यिक तथा विद्वानों के नाम लेने के बाद कहा - और कुछ नट - नटी भी थे । इस प्रसंग का उल्लेख करने के पीछे मेरा मकसद डॉ0 नगेंद्र और राजकपूर की लोकप्रियता का तुलनात्मक अध्ययन कर किसी को एक दूसरे से कमतर सिद्ध करना नहीं है । दोनों की कलाओं का भिन्न क्षेत्र है, भिन्न पृष्ठभूमि है तथा भिन्न पाठ दर्शक वर्ग है । मेरा उद्देश्य उस मानसिकता की ओर इंगित करना है जो कला- जगत में संप्रदायवाद एवं अस्पृश्यतावाद को जन्म देती है ।

 

        त्रिनिदाद और टुबैगो में अतिथि आचार्य के रूप में जाने से पहले मैं भी ऐसी ही एक विसंगति का शिकार था । अपनी उम्र के अधिकांश सहयात्रियों की तरह मैं भी पुराने फिल्मी गीतों को पसंद करता और गुनगुनाता था । त्रिनिदाद में वेस्ट इंडीज विश्वविद्यालय के परिसर में जब मेरे एक छात्रा ने हिंदी फिल्मी गीत का अर्थ पूछा तो मैं एक ग्लानि से भर गया कि क्या मुझ जैसा प्राध्यापक इस काम के लिए यहाँ आया है ? पर जब मैंनें धीर- धीरे वहाँ के परिवेश को पढ़ना आरंभ किया तो पाया कि भारतीय मूल के ही नहीं अफ्रीकी मूल के अनेक हिंदी प्रेमी इनके दीवाने हैं । मैंनें देखा कि वह हिंदी के शब्दों को जानते तो हैं पर उनके अर्थ नहीं समझते, मुझे फिल्मी गीतों के माध्यम से नवसाक्षरों को हिंदी पढ़ाना अधिक उपयुक्त लगा भारतीय उच्चायोग एवं महात्मा गांधी सांस्कृतिक केंद्र में तो कक्षा के अंत में एक सार्थक लोकप्रिय हिंदी गीत को रफी हुसैन जैसे छात्रा गाते थे और उनका अर्थ समझाते हुए हिंदी भाषा का शिक्षण होता । यही नहीं जब हिंदी निधि द्वारा पहली बार द्वैभाषिक पत्रिका, 'हिंदी निधि स्वर' का मैंनें संपादन आरंभ किया तो उसके अंतिम पृष्ठ पर हर बार एक फिल्मी गीत का अनुवाद होता ।

 

        मेरे उपरोलिखित वक्तव्य से यह अर्थ न लिया जाए कि हिंदी फिल्मी गीतो का मैं बहुत सबल पक्षधर हू और हिंदी साहित्य में फिल्मी गीतों को पाठयक्रम के रूप में बल दे रहा हूँ । मैं मानता हू कि अधिकांश फिल्मी गीत निरर्थक एवं निरुद्देश्य हैं । वे हमारे समाज को कोई उचित दिशा नहीं देते हैं और न ही किसी सामाजिक जीवन मूल्य को स्थापित करते हैं । पर कुछ हिंदी फिल्मी गीत ऐसे हैं जो हमें मानसिक एवं कलात्मक संतुष्टि देते हैं । हिंदी को विदेशों में लोकप्रिय बनाने में हिंदी फिल्मों के योगदान की उपेक्षा नही की जा सकती है । हमें तो इसकी लोकप्रियता का सहयोग लेना चाहिए । मुझे लगता है कि हमारी हिंदी फिल्मो  के प्रति तिरस्कृत बौद्धिक दृष्टि का कारण एक विचित्रा मानसिकता है जिसके चलते हिंदी की तुलना में अंग्रेजी बोलने वाला अधिक विद्वान माना जाता है, दक्षिण दिल्ली में रहने वाला जमना पार रहने वालों से अधिक संभ्रांत माना जाता है । विदेश यात्रा पर जाने वाल सम्माननीय होता है, ऊँचे पद पर आसीन स्वामी होता है वैसे ही हिंदी फिल्मों के साथ है । हमें इस मानसिकता को बदलना होगा । जैसे मान लिया जाता है दूसरे धर्म को व्यक्ति होते ही गुंडे और बदमाश है । गुंडे और हत्यारे की कोई जाति नहीं होती, ऐसे ही कलाओं की कोई जाति नहीं होती जिसकी कसौटी पर उन्हें श्रेष्ठ या निकृष्ट सिद्ध किया जाए । अच्छे को अच्छा कहा जाए और बुरे को बुरा, चाहे वह किसी भी जाति, नस्ल या संप्रदाय का हो । हमें यह भी याद रखना होगा कि प्रेमचंद जैसे अनेक साहित्यकारों ने इस लोकप्रिय माध्यम के द्वार खटखटाए हैं और कमलेश्वर, मनोहरश्याम जोशी, भीष्म साहनी, शरद जोशी, साहिर, नीरज जैसे अनेक रचनाकार सफल भी हुए हैं ।

 

o प्रेम जनमेजय

73 साक्षर अपार्टमेंट्स

ए- 3 पश्चिम विहार नई दिल्ली - 110063

 

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कहानी तो एक जीवंत अस्तित्व है - कमलेश्वर

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