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चले जाना रज़ा के
‘आधा
गांव’
के स्थाई निवासी विभु कुमार का
अपने
दोनों बेटे निश्चय,
अभिनय और परिजनों के कंधों पर सवार विभु कुमार की काठी में
शामिल होते हुए आज से तीन दशक पहले साप्ताहिक हिंदुस्तान में
छपी विभु कुमार की पुरस्कार कहानी
‘यात्रा-सहयात्रा’
का स्मरण हो आता है। हूबहू वही परिवेश और लोगों की शांत-मुखर
प्रतिक्रियाएं ......। अपनी निजी ज़िंदगी में कथाकार एवं नाट्य
लेखक विभुकुमार एक ऐसा नाम है जिसका मकसद भले ही हंगामा खड़ा
करना न रहा हो लेकिन हंगामें हो ही जाया करते थे। अभी पिछले
नवंबर में रायपुर में सात दिवसीय नाट्य स्पर्धा के दौरान
प्रवेश पत्र को लेकर पहले दिन ही विभु ने एक छोटा-सा हंगामा
खड़ कर दिया था। बड़े ठाठ से छाती ठोकर यह जतलाया भी कि
‘रायपुर
में नाटक के पितामह वही हैं।' विभु के द्वारा उछाले गए इस जुमले
पर भी सहमति और असहमति के बीच द्वंद्व चलता रहा ।
दरअसल विभु कुमार, डॉ. राही मासूम रज़ा के उस
‘आधा
गाँव’
के तकरीबन स्थाई नागरिक थे, जहाँ गालियाँ भी छंदबद्ध हो जाया
करती हैं। मुझे याद नहीं पड़ता है कि पिछले 40 वर्षों में भाई
विभु कुमार और मेरे बीच कोई एक सुबह और एक शाम बिना सामिष
गांलियों के चुपचाप हमारे बीच से गुजर गई हो। देवेन्द्र नगर का
मकान अपने दो दशक के अस्तित्व में चाहे जितना धूसर दिख रहा हो
पर उसके आहाते के गेट पर विभु कुमार के द्वारा डिजाइन किया
गया ‘हस्ताक्षर’
रायपुर शहर में ‘लघु
पत्रिका’
की तीखी एवं स्पष्ट उपस्थिति का हस्ताक्षर बना रहा। इस
हस्ताक्षर की यात्रा शुरू हुई थी तात्यापारा वाले पुराने घर
से, इसी घर के आँगन में पिता की उन्मुक्तता और उदारता के
स्पर्श से विभु का अंतस विकसित हुआ था उसके हस्ताक्षर की तरह।
विभु एक साथ कई भूमिकाओं में दिख सकते थे। दुर्गा कॉलेज
का वह प्रोफेसर जो पढ़ाता
हिंदी था, लेकिन उसके आसपास सभी
निकाय के छात्र मित्र की तरह झूमते-मचलते रहते
थे। हाथों की
आंशिक विकलांगता विभु कुमार की दिनचर्या में कभी आड़े नहीं आई,
मेरी पीठ गवाह है कि विभु ने मुझे उन्हीं हाथों से दो-चार घूसे
भी जड़ दिए थे। वे अपने पूरे वजूद के साथ बहस करते थे। बीच बहस
में गालियों के साथ घूसों की भी गुंजाईश हरदम बनी रहती।
हस्ताक्षर सिर्फ ‘लघु
पत्रिका’
ही नहीं बल्कि करीब दो दशक पहले तक रायपुर की एक सक्रिय नाट्य
संस्था भी रही। चाहे आशोक मिश्र हो, चाहे जयंत हो, चाहे आनंद
चौबे हो हम सब से उम्र में बड़े विभु कुमार कभी
‘बड़े’
बनकर हमारे बीच नहीं रहे और
अपने को बड़ा कहलाना भी उन्हें
पसंद नहीं था क्योंकि निर्द्वंद्व गालियों से नवाज़ते रहने का
सुख उनसे छूटे नहीं छूटता था।
जब तीन दिवसीय नाट्य समारोह
‘हस्ताक्षर’
के बैनर में 1976-1977 में हुआ था और अमोल पालेकर के साथ
अमरीशपुरी और साधना प्रधान रायपुर आए थे। तब लगता था उनके साथ
जैसे पूरा शहर ही रंग-तरंग में नहा गया हो। विभु कुमार ने
नुक्कड़-नाटकों में भी अपनी भागीदारी को ने केवल स्पष्ट
किया बल्कि कई छोटी-बड़ी संस्था को अंकुरित करने में उनकी सक्रिय
भूमिका रही। अलखनंदन और विभु के साथ नाटकों की रचना प्रक्रिया
में उसके प्रथम, द्वितीय एवं कई-कई पाठ हमें सुनने और गुनने
पड़ते थे। अपने नाटकों पर उन्हें बहस करना अच्छा लगता था।
आनंद चौबे और अशोक मिश्र के साथ बहस का स्तर हाथापाई तक
पहुँचते-पहुँचते रह जाता था लेकिन दूसरे दिन वे ऐसे सहज होकर
मिलते थे जैसे कल कुछ हुआ ही नहीं। जितनी ताकत के साथ विभू का
नाटक ‘हवा
का विद्रोह’
आंदोलित करता था इतना उनका
‘ताले
में बंद प्रजातंत्र’
नहीं । यद्यपि इस नाटक को उन्होंने तीन- तीन बार रिराइट किया
। ‘रविवार’
में मैने हवाओं का विद्रोह नाटक की समीक्षा की तब विभु से कहा
था कि काश तुम
‘ताले
बंद प्रजातंत्र’
को भी इसी दृष्टि से देख पाते । विभु की कहानियाँ कुंठाओं का
जितना बड़ा विस्फोट थी उसके लिखे नाटक उतने ही गहरे राग-रंग
संयोजन के बलिष्ट उदाहरण हैं।
चाहे कमलेश्वर हों, चाहे
मनोहर श्याम
जोशी, चाहे
अशोक बाजपेयी,
डॉ. राजेन्द्र मिश्र,
डॉ.हरिशंकर
शुक्ल हों या हमारे शहर के ही कुछ दैनिकों के संपादक, विभु ने
किसी के साथ शाब्दिक तलवारबाजी में कोई परहेज़ नहीं किया।
अपनी शर्तों पर पूरी ज़िंदगी जीने को आमादा रहे और कमोबेश सफल
भी। उनका सच और उनके सुख, उनके दुख भी अपने ही नाखून से
छिल-छाल जाया करते थे, जिसे स्वयं की खरोंच की परवाह कभी नहीं
रही उसे सामने वाले की परवाह कैसे हो
?
इसका कतई यह अर्थ नहीं था कि वह संवेदानाओं से कन्नी काटते थे।
बल्कि अन्याय के विरोध में या सहधर्मियों के संकट में वे सबसे
आगे खड़े रहने से भी नहीं हिचकिचाए। इसका एक उदाहरण मेरे जेहन
में बार-बार कौंधता रहता है कि
डॉ. प्रमोद वर्मा के अकेलेपन को
लेकर विभु किस कदर चिंतित होकर मेरे पास बिलासपुर
पहुँचे थे।
अपनी स्पष्टता, अपने तीखेपन और अपनी तनी हुई ग्रीवा के साथ
विभु पूरी तरह अड्डेबाज भी रहे। न वह उम्र की सीमा समझते और न
दौलत की। तथाकथित सामाजिक कुलीनता का माखौल उड़ाते हुए गुबार
देखने के लिए भी वे कभी ठहरते नहीं थे बल्कि निर्लिप्त हो कर चल
भी पड़ते थे। कहीं पर भी धमाके के साथ पहुँचना और गर्दों गुबार
उठाकर चल देना विभु का प्रिय शगल था। ठीक उसी तरह एक संक्षिप्त
सी बीमारी में चल जाना भीउ सके अन प्रीडिक्टेबल होने को दुगुने
वेग से साबित कर गया-और हम ठगे से रह गए। आज के समय में न वे
कुनैन की गोलियाँ हैं कड़वाए सच की तासीर.....ऐसे में
भला विभु कुमार, हम तुम्हें याद करने के सिवाए और कर भी क्या
सकते हैं ?
oपरितोष चक्रवर्ती
स्थानीय संपादक, जनसत्ता
रायपुर, छत्तीसगढ़

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