रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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मीडिया-विमर्श

बुश, लादेन और गाँधीगिरी

जिस दुनिया में हमारी आपकी ज़िंदगी का फैसला बुश और लादेन के हाथों में हो वहाँ गाँधीगिरी जैसे अस्त्र भोथरे पड़ जाते हैं । ईराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को कठघरे में देखकर ऐसा लगता है मानो यह दुनिया पूरी तरह से शक्ति की आराधना में ही लीन हो। यहाँ आप तभी सफल हो सकते हैं जब आपके बुश की ताकत, लादेन की हिंसक विचारधारा या मुर्शरफ की कुटिलता हो। गाँधीगिरी अब एक ऐसी सैध्दांतिकता का नाम है जिसका पुरातात्विक महत्व तो हो सकता है किंतु इस जटिल और निर्मम समय में वह सहमी सी दिखती है। अपने जीते जी भी गाँधी इस तरह की अतिवादी विचारधाराओं से जीत नहीं पाए ।

अंगरेज़ देश छोड़कर क्यों गए यह सवाल आज भी कई व्याख्याओं और कई तर्कों के साथ प्रस्तुत किया जाता है। इन विवादों में पड़ने का कोई अर्थ नहीं है। किंतु यह सच है कि अंगरेज़ जाते-जाते अपनी राजसत्ता कांग्रेस को सौप गए जिसके निर्विवाद सबसे बड़े नेता उन दिनों महात्मा गाँधी ही थे। महात्मा जी की गाँधीगिरी की बेबसी इसी से साबित हो जाती है कि वे न तो देश को बंटने से रोक पाए ना ही देश के बंटवारे के बाद हुए व्यापक नरसंहार को। यह धर्मान्धता की आँधी इतनी बेलगाम थी कि महात्मा जी को अपना बलिदान भी देना पड़ा । यह साधारण नहीं है कि गाँधी के हत्यारों से सहानुभूति रखने वाले आज भी नाथूराम गोडसे को अपना हीरो मानते हैं और गांधी जी की निर्मम हत्या को वध करार देते हैं । ऐसी बेशर्म दुनिया में गाँधीगिरी का पाठ क्या मायने रखता है कहने की जरूरत नहीं है। गाँधीगिरी की रही सही कसर पं. जवाहर लाल नेहरू ने निकाल दी। शायर निदा फ़ाजली गलत नहीं कहते कि गोडसे ने तो उनका कत्ल किया जबकि गांधी का वैचारिक कत्ल पं. नेहरू ने किया।

 दुनिया में जैसे हालात बने हुए हैं। उसमें अमरीका सबसे बड़ा दरोगा है उसके रास्ते में पड़ने वाला बिना पुष्ट प्रमाणों के भी आतंकवादी करार देकर सद्दाम की तरह पेशियां भुगतेगा और अमरीका के सामने नतमस्तक होने वाले मुर्शरफ जैसे लोग अपने सारे अतिवादी तेवरों के बावजूद सुरक्षित रहेंगे। कश्मीर के मुख्यमंत्री समेत तमाम दिग्गज नेता एक आतंकी की पैरवी में खड़े नज़र आएंगे । यह आजादी के छः दशक बीत जाने के बाद एक ऐसी सच्चाई है जो हमें मुँह चिढ़ा रही है। गाँधीगिरी सभ्य समाज में विकसित होने वाली समाजनीति है। वह उन्हें अपील करती है जो कहीं थोड़ी बहुत संवेदनाओं से युक्ते हों । जलियांवाला बाग रचने वाले को गाँधीगिरी से नहीं ऊधमसिंह की गोलियों से ही जवाब दिया जा सकता था । इसमें दो राय नहीं कि अंगरेज़ी शासन ने हम पर बहुत अत्याचार किए, वे भारत के स्वाभिमान और यहाँ की आम जनता की अस्मिता को चुनौती देने लगे सो स्वराज्य का नारा लेकर तिलक सामने आए । गाँधीगिरी तब कहीं चित्र में नहीं थी । आम जनता में स्वराज्य का मंत्र गूंजने लगाए। गांधी जी इस आंदोलन की प्राथमिक दीक्षा दक्षिण अफ्रीका में ले चुके थे। अपने नेतृत्व कौशल से उन्होंने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन को शीघ्र ही अपने हाथ में ले लिया । राजनीति की भी गाँधी जी गहरी समझ रखते थे जिसे सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं को कांग्रेस से अलग-थलग कर देने की उनकी रणनीति से समझा जा सकता है । किंतु इतने बड़े देश के आंदोलन और उसकी आजादी की लड़ाई का श्रेय निश्चय ही किसी एक नेता को नहीं दिया जा सकता ।

आज गाँधी होते तो उन्हें अपने प्रयोगों पर विचार करना पड़ता । परमाणु बमों की होड़ में लगी दुनिया, लादेन जैसे अपराधी, बुश जैसे शासक, मुर्शरफ जैसे पड़ोसी विश्व मानवता के लिए एक बड़ा खतरा हैं। गाँधी के पास इस संगठित आतंकवाद का मुकाबला करने की ताकत नहीं है। अपने व्यक्तित्व की विशालता और आंदोलन पर अपनी पकड़ के बावजूद वे न तो जिन्ना को रोक पाए न ही अपने अनुयायी पं. नेहरु को इस बात के लिए सहमत कर पाए कि वे प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी जिद छोड़ दें। देश भी बंटा और इस धरती ने सदी का सबसे बड़ा कत्लेआम भी देखे। गाँधी अपनी जिंदगी के आख़िरी दिनों में जितने बेबस और असहाय दिखायी देते हैं, वह प्रसंग एक महानायक की बेबसी का ही कथा है। हर समय अपने नायक तलाशता है और ख़ारिज भी करता है। गाँधी निश्रय ही अपने दौर के महानायक थे। उन्होंने इस देश के सबसे बड़े जन आंदोलन का नेतृत्व किया किंतु उनके ही लोगों ने उन्हें ख़ारिज कर दिया ।

 

गाँधी की कथा एक ऐसे नायक की कथा है जिसने रास्ता दिखाया, लाखों लोंगों को उस मार्ग पर चलाया और आज भी उनके अनुयायी उनके दिखाये रास्ते पर चल रहे हैं । गाँधी का रास्ता अब एक व्यक्ति का रास्ता हो सकता, वह जिंदगी जीने का एक व्यक्तिगत संकल्प भर रह गया है। मुन्नाभाई भी जब गाँधी के रास्ते पर सरपट दौड़ता दिखता है तो व्यवस्था उसे पागल करार देने पर जुट जाती है। सिनेमा में तो मुन्नाभाई जीत गया पर क्या असल जिंदगी में भी उसके जीत पाने की गुंजाइश बची है। अगर हो तो बताइगा जरूर ?

oसंजय द्विवेदी

स्थानीय संपादक, हरिभूमि

रायपुर

 

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