नैतिकता
नहीं अवसरवादिता के उदाहरण
उच्च
न्यायालय ने जब भाजपा सांसद नवजोत सिंह सिद्धू को गैर
आदतन हत्या का
दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष की सजा सुनाई थी तो
इस निर्णय से न सिद्धू संतुष्ट थे और न ही उन पर मुकदमा
चलाने वाले । दोनों उच्चतम न्यायालय में गए। सिद्धू सजा
समाप्त करवाने के लिए और प्रतिपक्षी सजा बढ़वाने के लिए ।
इस बारे में उच्चतम
न्यायालय का निर्णय आना अभी बाकी है,
पर अदालत ने उच्च न्यायालय द्वारा दी गई
सजा का
क्रियान्वयन स्थगित अवश्य कर दिया है। इसका एक मतलब यह भी
है कि अब सिद्धू फिर से चुनाव लड़ सकते हैं। अदालत को भगवान
कहने वाले सिद्धू अपनी पार्टी के आदेश पर फिर से उसी सीट पर
चुनाव लडेंगे, जो उन्होंने उच्च न्यायालय के द्वारा सजा
सुनाए जाने के बाद नैतिकता के आधार पर छोड़ दी थी। भारी
बहुमत से अमृतसर से चुनाव जीतने वाले सिद्धू ने जब यह
निर्णय घोषित किया था तो आम प्रतिक्रिया उनके प्रति
प्रशंसा की थी।
आम आदमी को अच्छा ही लगा था कि कोई राजनेता तो है जो
नैतिकता की सिर्फ बात ही नहीं करता, बल्कि उस पर अमल भी
करता है। लेकिन उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई छूट के बाद
जिस तरह भाजपा ने सिद्धू को फिर से अपना उम्मीदवार घोषित
किया है और जिस तरह से सिद्धू ने
‘पार्टी
के द्वारा आदेश’
का पालन करने की तत्परता दिखाई है, उससे नैतिकता वाली बात
फिर उभरकर सामने आ गई है। अभी उच्चतम न्यायालय ने सिद्धू को
दी गई सजा का क्रियान्वयन ही स्थगित किया है, उसे गलत नहीं
बताया है। ऐसे में यदि सिद्धू का पहला कदम नैतिक दृष्टि से
सही था, तो बिना निर्दोष घोषित हुए फिर से चुनाव
बड़ने-लड़ाने के इस निर्णय को अनैतिक क्यों न कहा जाए
?
सिद्धू का संसद की सदस्यता से त्याग पत्र देना सचमुच
प्रशंसनीय कार्य है, इस तरह की नैतिकता हमारे राजनेताओं
में अक्सर नहीं दिखाई देती । सच तो यह है कि ऐसे उदाहरण
हमारी राजनीति में अपवाद ही हैं। लेकिन इसी नैतिकता का
तकाजा यह भी था कि सिद्ध उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्दोष
घोषित होने तक इंतजार करते । सजा का स्थगन उनकी निर्दोषता
का प्रमाण नहीं है जैसे जमानत मिलना यह तय नहीं करता कि
व्यक्ति अपराधी नहीं है। इसीलिए जब जमानत मिलने के बाद जेल
से छूटने पर सिद्धू का स्वागत किया गया था, उनकी जय-जयकार
की गई थी, तब भी यह सवाल उठा था कि हमारे राजनेता अक्सर
जिस नैतिकता की दुहाई देते हैं, वह कितनी गहरी होती है
?
बहरहाल, उच्चतम न्यायालय ने अमृतसर से विजयी हुए इस सांसद
को उच्च न्यायालय द्वारा दी गई सजा स्थगित करते हुए तर्क
यह दिया है कि यदि ऐसा नहीं किया जाता तो उन्हें ऐसा
नुकसान
होगा जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती। अर्थात सिद्धू उस सीट पर
फिर से चुनाव नहीं लड़ पाएंगे जो उन्होंने नैतिकता के आधार
पर छोड़ी थी। न्यायालय ने इस कार्य के लिए उनकी प्रशंसा भी
की है । सवाल यह उठता है कि यदि सिद्धू ने नैतिकता के आधार
पर त्याग पत्र दिया था, तो फिर से चुनाव लड़ने की
जल्दबाजी क्यों ?
आखिर यह त्यागपत्र जनता के प्रति जवाबदेही या जनता के
विश्वास के संदर्भ में तो दिया नहीं गया था
?
बार-बार सिद्धू यह घोषणा करते रहे हैं कि न्यायालय में उनका
पूरा विश्वास है और न्यायालय द्वारा दोषी ठहराए जाने के
कारण नैतिक जिम्मेदारी के आधार पर उन्होंने त्यागपत्र
दिया है, तो फिर किस नैतिकता के आधार पर उन्होंने चुनाव
लड़ना जरूरी समझा है
?
सजा घोषित होने के बाद उनकी पार्टी भाजपा ने भी त्याग दिए
जाने के उन्के निर्णय की प्रशंसा की थी और इसे पूरी पार्टी
की नैतिक प्रतिबद्धता करार दिया था। पार्टी ने यह भी कहा
था कि यदि उच्चतम न्यायालय ने उसके सांसद को निर्दोष परार
दिया तो उन्हें फिर से चुनाव लड़ाया जाएगा, लेकिन अभी तो
सिद्धू निर्दोष साबित नहीं हुए । सिद्धू भारी बहुमत से चुनाव
जीते थे। अब तो उनके साथ महानता वाली बात भी जुड़ी हुई है।
बहुत संभव है कि उन्हें पहले से भी ज्यादा मत मिलें, लेकिन
सवाल उनके फिर से जीतने का है ही नहीं, सवाल तो उसे
नैतिकता का है जिसके नाम पर त्याग का खेल दिखाया गया था।
यदि इस तरह फिर से चुनाव लड़ना ही था तो त्याग पत्र देकर
चुनाव की स्थिति हो क्यों पैदा की गई
?
क्या यह उपचुनाव जनता के पैसे का अपव्यय नहीं है
?
नैतिकता के नाम पर त्याग पत्र देकर इस तरह फिर से चुनाव
वड़ने का यह पहला उदाहरण नहीं है। इससे पहले भी दो सांसद
इस तरह का उदाहरण प्रस्तुत कर चुके हैं। कांग्रेस अध्यक्ष
सोनिया गांधी ने भी अपनी सीट से त्याग पत्र दिया था और फिर
से उसी सीट से चुनाव चड़कर सांसद बनीं। तेलंगाना राष्ट्र
समिति के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव ने भी ऐसा ही कियाथा।
दोनों ने अपनी नैतिक ईमानदारी प्रमाणित करने के लिए यह कदम
उठाया था। सिद्ध ने भी यही किया। उनसे तो कहा भी गया था कि
उनके लिए त्याग पत्र देना जरूरी नहीं है, लेकिन भाजपा का
नेतृत्व अपनी नैतिक ऊंचाई प्रदर्शित करना चाहता था।
सच पूछा जाए तो ये तीनों नैतिक ऊँचाई के नहीं, राजनीतिक
अवसरवदिता के उदाहरण हैं, अनावश्यक उपचुनाव कराकर जनता के
पैसे बर्बाद करने के उदाहरण हैं। भाजपा ने सिद्धू को त्यागपत्र देने के लिए बाध्य किया था, ताकि कथित राजनीतिक
नैतिकता का उदाहरण प्रस्तुत किया जा सके। अब सिद्धू
को फिर से उसी सीट पर खड़ा करके वह उस सहानुभूति की फसल काटना
चाहती है, जो उसने कथित नैतिकता के नाम पर बोई थी। सोनिया
गांधी ने भी रायबरेली में यही किया था। किसी अदालत ने
उन्हें ऐसा करने के लिए नहीं कहा था। लेकिन राजनीतिक दल
जानते हैं कि नैतिकता का दिखावा करना राजनीतिक लाभ उठाने
का आसान तरीका है। जबकि हमारी राजनीति में नैतिकता के लिए
शायद ही कोई जगह बची हो।
oविश्वनाथ सचदेव
संपादक, नवनीत
मुंबई, महाराष्ट्र
