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हिन्दी साहित्य में म.प्र. एवं छ.ग. गीतकारों का
योगदान
साहित्य
की विभिन्न विधाओं में गीत विधा एक महत्वपूर्ण एवं सामर्थ्य
विधा है, जिसे आज के परिप्रेक्ष्य में लोग हाशिये पर छोड़ने को
तुले हैं। गीत विधा का भी एक महत्वपूर्ण इतिहास रहा है। समय की
गति के साथ-साथ गीत
ने निरंतर विभिन्न सोपानों पर चढ़ते-उतरते
अपना एक विशेष मुकाम हासिल किया है। अगर हम इसकी इतिहास से
लेकर आज के नवगीत तक के पायदानों की व्याख्या करें तो मध्यकाल
जिसे भक्तिकाल भी कहते हैं, उस कालखंड से शुरूआत करना पड़ेगा ।
जब संत-कवियों ने आध्यात्मिक व ईश्वरीय चिंतन को आधार मानते
हुए, भक्ति गोतों की रचना की थी। इन संत-कवियों के गीतों में
लोक गीतों एवं लोक संगीत की प्राधान्यता के साथ पदों के प्रकार
भिन्नता लिए हुए उनके भाषायी संस्कार भी उनके गीतों में
माधुर्य का दर्शन कराते रहे । मध्यकाल के कवियों में शिक्षा के
लिहाज से भले ही कमजोर रहे, किन्तु उनके भक्ति पदों में गीत की
आहट आती रही । कालांतर में इन्होंने गीतों को एक ज़मीन देने में
अपना बहुमूल्य योगदान किया । इस काल में प्रमुख रूप से जिन
संत-कवियों का योगदान रहा, उनमें से कवि कुम्भदास, सुरदास,
रहीम, रसखान आदि का नाम आता है। स्वतंत्रता के पूर्व गीतों की
जो बहुकोणीय धारा प्रवाहित हुई, उसका प्रभाव आज तक परिलक्षित
है। परंतु स्वतंत्रता के बाद गीत न केवल प्रयोगधर्मी धरातर पर
आया, वरन उसने बेहतर सोपान चढ़े ।
अगर छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश के परिप्रेक्ष्य में देखें तो इन
राज्यों में गीतों की एक समृद्ध परंपरा है। हाँ कहीं-कहीं इसकी
अपरिपक्वता का आभास होता है । इसका कारण मूलतः मंच के प्रति
मोहग्रस्तता अधिक होना और अध्ययनशीलता की कमी होना है।
स्वतंत्रता आंदोलन और क्रांति के युग में भी गीतों का अवदान कम
महत्वपूर्ण नहीं था, जिसमें दादा माखनलाल चतुर्वेदी ने
बलिदानी परंपरा के गीतों के सर्जक के रूप में गीत के लिए जो
जमीन तैयार की, जिसका प्रतिफल आज यह विधा बहुआयामी स्तर पर
विद्यमान है। छत्तीसगढ़ के कुछ कवियों एवं गीतकारों का भी इस
विधा को समृद्ध करने में
बहुत बड़ा योगदान रहा है । जिनमें से प्रमुख रूप से रायगढ़ के
स्व. मुकुटधर पांडेय ने गीत के समृद्ध परंपरा में छायावादी रचना
सौष्ठव के दर्शन कराये । मध्यप्रदेश जबलपुर के स्व. भवानी
प्रसाद तिवारी ने गीत को न केवल संभावनाओं के मुकाम तक लाया
वरन उसको नया स्वरूप भी दिया।
जबलपुर के ही राजकुमार सुमित्र और जवाहर चौरसिया ने
गीत को विविध धर्मों दृष्टिकोणों में लालित्य की आहट प्रदान
की। राम कृष्ण दीक्षित, नर्मदा प्रसाद खरे, रामेश्वर
शुक्ल ‘अंचल’
आदि ने गीतों को प्रयोगधर्मिता के चक्रव्यूह से बचाते हुए
अच्छा प्रचार-प्रसार वैशिष्टता तथा गतिशीलता प्रदान करते हुए
परंपरागत गीत सर्जकों में अग्रणीय भूमिका अदा की। उज्जैन के
स्व. डॉ. शिवमंगल सिंह
‘सुमन’
ने साहित्य और मंच की कसौटी पर गीत को समान रूप से आदर दिलाया।
वे अपनी पीढ़ी के अन्यतम गीत सर्जक थे। आज के वर्तमान पीढ़ी के
लिए पाथेय है। इस परंपरा व दिशा में स्व. कौशल मिश्र एवं भगवंत
शरण जौहरी का नाम भी उल्लेखनीय है।
असल में गीत कविता ही है इसलिए परंपरा से लिखे जा रहे गीत को
अनावश्यक रूप से नकारकर उसे नवगीत का नाम दिया गया है।
बुनियादी तौर पर नवगीत और पारंपरिक गीतो रचना के
चरित्र में
कोई अंतर परिलक्षित नहीं होता । ग्वालियर के वीरेन्द्र मिश्र
ने विभिन्न प्रकार के छन्दों को जन्म दिया जिससे गीत की लय
में नयापन आया। परंतु वीरेन्द्र मिश्र ने गीतों को काफी हद तक
क्लीष्टता से जोड़ दिया । आगे चलकर गीतों की श्रवणीयता तथा पठनीयता
दोनों स्तर
पर स्व. राम अवतार त्यागी, गोपाल दास
‘नीरज’
और रामनाथ अवस्थी ने बनाये रखा। इन्होंने आम आदमी के दर्द को
अपने दर्द के साथ जोड़ दिया । स्व. आनंद मिश्र ने गीतों में
विविध आयाम देते हुए उसे ओज तक ले गया, जिसमें साहित्यिक
आल्हाद और श्रवणीयता के समान गुण विद्यमान है। स्व. मुकुट
विहारी सरोज भी अपने ढंग से अलग गीतकार हैं । उनके कत्थ के
शैली के मद्देनजर लोग उन्हें गीत के व्यंग्य करने वाला गीतकार
कहकर गीत का अपमान कर रहे हैं । सही मायने में वह हिन्दी गीत
में वर्तमान को जीने वाले गीतकार हैं। मोहन अम्बर ने गीत को
साधना और संघर्ष के साथ जीकर उसे ऊँचाई दी।
छत्तीसगढ़ धमतरी के
स्व. नारायण लाल परमार ने भी गीत को छत्तीसगढ़ से उठाकर पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से देशव्यापी पहचान दी है। उनके अधिकांश
गीत छोटे छन्दों के कारण गीत के लालित्य की पहचान है। राम प्रताप सिंह विमल ने गीतों में सुक्ष्म वैचारिकता के धरातल
प्रदान की । इस परिप्रेक्ष्य में अंचल के विद्याभूषण मिश्र का
नाम अग्रणी गीतधर्मियों में बहुत ही आस्था से लिया जाता है।
वे संवेदना को गीत में पिरौने में सिद्धहस्त
हैं । लालित्य को
भावनात्मक और संवेदनात्मक बना देने
का उनमें एक अलग ही कौशल
रहा है । डॉ. रतन जैन का नाम भी अच्छे गीतकारों में
गिना जाता है,
लेकिन वह अपने पंख फैलाने में पीछे रह गये। यह बात भी
उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ के स्व. भगवान स्वरूप सरस ने नवगीत
के स्तर पर देशव्यापी पहचान बनाई थी, लेकिन वह
ज़्यादा दिन जीवित नहीं रह
सके। शहरी संत्रास और आम आदमी के दर्द को
बयान करने में उनकी
श्रमता अद्बूत रही है।
गीत अपने परंपरागत समय के धारा में अनेक ऊँचाईयाँ व बदलाव के साथ बहते हुए वर्तमान
पीढ़ी तक यानी कि आज जिस पायदान पर पहुँचा है, उसका इतिहास बहुत ही
लम्बा है, जिसे एक आलेख
में समेटना संभव नहीं है, फिर
भी उपरोक्त नामों के अलावा गीत व नवगीत को समृद्ध बनाने में
जिन-जिन महत्वपूर्ण हस्ताक्षर का योगदान रहा
उनमें पुराने पीढ़ी में बिलासुपर के
प. द्वारिका प्रसाद तिवारी, रायपुर के बद्री विशाल परमानंद के बाद अग्रिम पीढ़ियों में
विद्यानंद राजीव, राम कुमार चतुर्वेदी चंचल, नईम, ओम प्रकाश, डॉ.श्याम सुन्दर दुबे, इसाक अश्क,
डॉ. श्रीराम परिहार, श्रीकान्त जोशी, हरीश निगम, चन्द्रसेन अनुरागी, महेश संतोषी
श्री उपेन्द्र पांडेय, बाल कवि
बैरागी, नरेन्द्र
श्रीवास्तव, डॉ. बलदेव, पं. दानेश्वर शर्मा, डॉ. श्याम सुन्दर त्रिपाठी, मोहन
भारतीय, इसके बाद की पीढ़ियों में मुकुंद कौशल, डॉ. चितरंजन
कर, रामेश्वर वैष्णव आदि अनेक उल्लेखनीय नाम हैं । इसके अलावा
महिला गीतकारों में इंदिरा परमार, कुमारी वर्षा सिंह,
कु. शरद सिंह, श्रीमती संतोष झांझी आदि ने भी गीतों को बहुत ही
ईमानदारी से लिखा। इधर छ.ग. में
हिंदी के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी में लिखे गये
गीतकारों में स्व. हरि ठाकुर का नाम बहुत ही आदर पूर्वक लिया
जाता है। लक्ष्मण मस्तुरिया, प्रेच चंद्राकर एवं ममता चंद्राकर
ने छत्तीसगढ़ी में सिर्फ लिखा ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी गीत
को मंच के माध्यम से लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचाया ।
छत्तीसगढ़ी गीतों की बात चली है तो जयप्रकाश मानस का जिक्र भी
किया जा सकता है जिनके जसगीतों का खूब बाजार गर्म रहा । उनके
आठ जसगीतों से तैयार एक आडियो सीड़ी का पहला संस्करण
'तोला
बंदौ'
एक ही माह में 30,000 प्रतियों में बिका था ।
आज के दौर की वास्तविकता यह है कि समकालीन कविता गीत को हाशिये पर छोड़ने पर तुली
हुई है। इससे गीत को जितना खतरा नहीं उससे कहीं अधिक खतरा है, उन
तथाकथित गीतकारों से जो इसकी आत्मा और
चरित्र को अपने सतही लेखन से सतत आहत कर रहे हैं। अधिकांश
नवोदित कविया कवियत्रियाँ बिना अध्ययन के गीत को मंचीय प्रस्तुति के एक प्रवंचना भाव
से सबसे बड़ा नुकसान पहुँचा रहे है। नवोदित रचनाकारों से
निवेदन ही किया जा सकता
है कि वे साहित्य के चाहे किसी विधा में लिखें उसे
गंभीरता से लें । सिर्फ समय काटने या क्षणिक प्रसिद्धि पाने की
ललक में लिखने का प्रयास न करें । लेखन के साथ-साथ अध्ययन एवं
पूर्ण संवेदना जरूरी है।
नवोदित लेखकों को समर्पित चंद पंक्तियाँ :
शब्द-शब्द से फूटने लगे सच्चाई की चिंगारी,
आओ ! कविता
में जलती हुई ऐसी आग लिखें।
छन्द-छन्द से थिरक उठें हर एक पाँव,
आओ !
गीतों में जीवन का ऐसा राग लिखें
!
दिल की गहराई तक उतर जाये दर्दीला नशा,
आओ !
ग़ज़लों में आँसुओं का ऐसा दाग लिखें
!
हर शख्स अपने में झाँकने को हो मजबूर,
आओ !
कहानियों में शख्सियत का वह भाग लिखें
!
अंधेरे से जूझने को मिले सबको रोशनी,
आओ !
अपने खून से आज हम ऐसा चिराग लिखे
!
oगोविंद पाल
203/ बी, न्यूरूआबांधा
सेक्टर
भिलाई, दूर्ग (छ.ग.)

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