रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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व्यक्तित्व

गिरीश पंकज एक ज़िन्दा दिल मित्र।

(व्यंग्यकार गिरीश पंकज के पचास वसंत पर विशेष)

         मैं भाग्य में विश्वास रखता हूँ। अन्यथा क्या कारण है कि भारत में पैंतालीस वर्ष बिताने के बाद और हिन्दी साहित्य से (उस समय तक) बीस वर्ष जुड़े रहने के बाद भी मैं कभी गिरीश पंकज नाम के व्यक्ति से नहीं मिला। मैं उसे मिला लंदन में बसने के बाद और मिलने का स्थान था त्रिनिदाद।

 

        भाई प्रेम जन्मेजय के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन का आयोजन त्रिनिदाद में किया गया था जहां सूर्यबाला, नरेन्द्र कोहली, सुरेश ऋतुपर्ण, अशोक चक्रधर, नरेन्द्र वर्मा, दिविक रमेश आदि साहित्यकारों से मुलाक़ात हुई। अधिकतर लोगों से पुरानी जान पहचान थी। ऐसे में एक युवक सम्मेलन में एक दिन देरी से पहुँचा, चेहरे पर बदहवासी लिये और परेशान क्योंकि एअरलाईन ने उसका सूटकेस खो दिया था।

 

        उस इन्सान के चेहरे पर कुछ ऐसी सच्चाई और सरलता थी कि आकर्षित हुए बिना रह नहीं पाया। उसकी पहली समस्या थी कि नहाने के बाद पहने क्या। सभी कपड़े तो खो चुके सूटकेस में बन्द थे। मैने खट से अपना प्रेस किया हुआ कुर्ता निकाला और उस युवक को थमा दिया। वह युवक नहाने चला गया और तरोताज़ा होकर, कुर्ता पहन कर बाहर निकला तो परिचय हुआ कि युवक रायपुर से आया है और नाम है गिरीश पंकज। जो चार दिन हमने त्रिनिदाद में गुज़ारे उसमें कुर्ता पुराण के ज़रिये हम एक दूसरे को हँसते हँसाते रहे भाईयो, यह हैं गिरीश पंकज, बहुत बड़े लेखक, व्यंग्यकार, रायपुर की जान। इनकी अपनी पत्रिका है, देश में नाम है, उपन्यास और लेख छप चुके हैं, हिन्दी रत्न हैं, रायपुर से सूटकेस गुमाते हुये त्रिनिदाद पहुँचे हैं, लेकिन भाइयो इस कुर्ते का कोई ज़िक्र नहीं। बस इसी तरह हँसते खेलते, हँसी मज़ाक में उस सम्मेलन के दौरान गिरीश पंकज बहुत अपना सा बन गया।

 

        फिर हमारी मुलाक़ात दिल्ली और ग़ाज़ियाबाद में हुई। हमारे मनों में  एक दूसरे के प्रति अपनेपन की भावना और अधिक बढ़ी।

 

        वर्ष 2006 के नवम्बर में गिरीश अपने रायपुर के मित्र जयप्रकाश मानस और सुधीर शर्मा के साथ लंदन एक हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने पहुँचे। वहाँ गिरीश का साहित्यकार रूप अलग ढंग से पहचानने को मिला।

 

        विदेश राज्य मन्त्री श्री आनंद शर्मा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। भारत से आये सभी साहित्यकार अपनी अपनी कृति की एक प्रति श्री आनंद शर्मा को मंच पर भेंट करने के लिये जैसे मरे जा रहे थे। अपना नवीनतम उपन्यास गिरीश भी लंदन लाये थे, शायद आयोजकों ने उनके आश्वासन दिया होगा कि उस उपन्यास का विमोचन सम्मेलन के दौरान हो जायेगा। गिरीश को भी कहा गया कि उस कतार में शामिल हो कर अपना उपन्यास विदेश राज्य मन्त्री को भेंट कर दें। गिरीश का वाक्य मुझे अब तक आंदोलित कर रहा है, भाई साहब व्यंग्यकार हूँ कोई घसियारा नहीं। मैं इस तरह अपमानित हो कर राजनीतिज्ञ को अपना साहित्य भेंट नहीं करूंगा।

 

        उस पल के बाद मुझे गिरीश अचानक एक बहुत बड़ा आदमी लगने लगा कहा जाये कि संपूर्ण इन्सान जो कि सरल है किन्तु साहित्यकार की आन उसमें ज़िन्दा है।

 

o तेजेन्द्र शर्मा

सचिव - कथा यू.के.

74-A, Palmerston Road

Harrow & Wealdstone

Middlesex, HA3 7RW

 

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