रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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संस्कार

संस्कृति, तकनीक और  कला समकालीन सन्दर्भ में‍‍ 

        संस्कृति, तकनीक और कला इन तीनों का आयाम इतना विशद है कि इन्हें परिभाषित करना जटिल है। फिर भी यदि इन्हें परिभाषाओं के दायरे में लाने की कोशिश की जाए तो  सामान्य रूप में कहा जा सकता है कि  संस्कृति एक ऐसी संहति है जिसमे समान आचार, विचार, व्यवहार, मान्यताओं, रूढ़ियों और विश्वासों का पालक समुदाय आपसी तालमेल बैठाते हुए वैश्विक परिवेश में अपने को स्थापित करता है। संस्कृति समुदाय को प्रकृति से कुछ परे ले जाती हुई एक ऐसे कृत्रिम वातावरण का निर्माण कर देती है जो कृत्रिम होते हुए भी कृत्रिमता का आभास नहीं देता। वहीं तकनीक एक ऐसी प्रक्रिया है जो जीवन को सरल बनाने और विश्व के अन्य तत्वों के बीच अपने वर्चस्व को बनाए रखने के उद्देश्य से मानव और समाज द्वारा निर्मित होती है। इसमें निरन्तर विकास की संभावनाएँ होती हैं। कला इन दोनों की सहगामिनी होते हुए भी अपने विशिष्ट स्थान रखती है। यह मानव के मानसिक विकास के साथ साथ भावनात्मकता , कल्पनाशीलता और सृजनशीलता को उल्लेखित करती हुई उसके कृत्यों को सृष्टि निर्माण के सहतत्वों के रूप में स्थापित करती है।

 

        उल्लेखनीय है कि ये तीनों तत्व सहगामिनी तथा परस्पर आधारित हैं। कला एवं तकनीक संस्कृति परिवर्धन के महत्वपूर्ण उपादान है। किसी भी संस्कृति की श्रेष्ठता इस बात पर निर्भर करती है कि वह कला तथा तकनीक की दृष्टि से कितनी उत्तम है। इनमें प्रकृति से अलगाव है ऐसा अलगाव जो अपनी उपस्थिति का भास देते हुए अनुपस्थित रहता है। अर्थात प्रकृति से दूरी भासित   होते हुए भी उपस्थित है। दूसरे अर्थों में ये तीनो कृत्रिमता की ओर कुछ कदम हैं, किन्तु ऐसी कृत्रिमता जो केवल मानव अपितु सृष्टि के हित में हो। ये मूल्यों से आबद्ध होते हैं, समय समय पर इन मूल्यों  में अवपतन की संभावना भी उपस्थित हो जाती है जिस पर रोकथाम की कोशिश संस्कृति समाज को जीवित रखने में सहायक होती  है। किसी भी मानव समाज की उन्नति में इन तीनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। किसी भी समाज की उन्नति तकनीक के बिना संभव नहीं है वहीं तकनीक कहीं कहीं कला से जीवन शक्ति लेती है। तकनीक निरन्तर विकासशील है इसका आरंभ मानव समाज के विकास की यात्रा से ही आरंभ हो गया था। पहिया, या फिर चिमटा या बेलन आदि इसके आरंभिक उपादान रहे हैं। नवीन तकनीक पुरातन का स्थान लेती है अधिकतर ये अपने को पुनरावृत्ति से बचाती है। किन्तु कला के बारे में ऐसा नही कहा जा सकता है, विकास कला की प्रकृति में हैं, इसमें कोई संदेह नहीं किन्तु कला के विषय में श्रेष्ठता की मुताहिज नहीं है, कभी कभी पुरातन कला नवीनता की अपेक्षा अधिक समकालीन प्रतीत होती है। संस्कृति भी समवर्धन की अपेक्षा रखती है, किन्तु यह नवीन एवं पुरातन में सामंजस्य बैठाने का कोशिश करती है। किसी संस्कृति विशेष के नाश के साथ साथ उससे जुड़ी तकनीक वा कला नष्ट हो जाती हैं किन्तु उन्हें  एक सीमा तक सश्रम जीवित किया जा सकता है।

 

        अब बात करें समकालीन सन्दर्भ में तो यह निश्चित है कि आज इन तीनों का स्वरूप काफी बदल गया है। या फिर यह भी कहा  जा सकता है कि इनके अपने स्वरूप में ही इतनी विविधता है कि सही रूप को रेखांकित करना संभव नहीं है। यहाँ एक बात और कही जा सकती है कि संस्कृति सदैव भूत की ओर देखती है, वर्तमान सदैव उसकी आलोचना करता है। लेकिन तमाम आलोचना के बावजूद संस्कृति वर्तमान में ही स्वरूप बनाती है। यहाँ मैं उस संस्कृति की बात नहीं कर रही जिसका हवाला देकर छाती पीटो अभियान चलाता हुआ हर कोई चला आता है। या जिसकी दुहाई देते हुए सत्य से आँखे मूँदी जा रही हैं। मैं बात कर रही हूँ उस संस्कृति की जो अपने स्थान और काल में एक स्थाई जगह बना लेती है , ऐसी जगह जो उसके रहने के उपरान्त भी भाव लोक में क्रियाशील होता है़   आज जिसे हम संस्कृति का नाम देते हैं उसमे स्थान भाव लुप्त होता जा रहा है।  आज ऐसी संस्कृति बन रही है, जिसका चेहरा स्पष्ट नहीं है, वस्तुतः यह एक संक्रमण काल है। ऐसा नहीं कि ऐसा संक्रमण काल पहली बार उपस्थित हुआ है, पहले भी ऐसी स्थितियाँ उपस्थित होती रहीं हैं।  किन्त अधिकतर समाज उस पर लगाम कसने का काम करता है। किन्तु आज अधिकतर स्थानों में समाज का स्थान नगण्य होता जा रहा है। जहाँ पर समाज की लगाम की बात आती भी है तो वहाँ कभी कट्टर धार्मिकता हावी हो जाती है तो कभी राजनीति, जो समाज हित में होकर किसी समूह विशेष के  हित में काम करती है। सब कुछ व्याप्त होते हुए भी अजीब से घालमेल की स्थिति है। आज गाँवों में लडकियाँ शेम्पू आदि का उपयोग कर रही हैं तो शहरों में हर्बल ट्रीटमेन्ट का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। गोरी चमड़ी वाले धूप में रंग काला करना चाहते हैं तो काली चमड़ी वाले गोरे होने के तरह तरह के साधन प्रयोग में ला रहे हैं। एक अजीब सी स्थिति यह भी है कि मंगोल मूल की लड़कियाँ जिनमे कोरिया, जापान , चीन प्रमुख हैं, अपनी आँखे लम्बी और नाक ऊँची करवाने के लिए आपरेशन भी