रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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पुस्तकायन

            

" कभी यूँ भी तो हो" :'उम्मीदों'से भरे एक कहानीकार का 'उदय'

        संजय विद्रोही के नए कथा संकलन 'कभी यूँ भी तो हो' में कुल पन्द्रह कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ हमारी सामाजिकता की कई दृष्टियों से गहरी जाँच पड़ताल करती हैं। इसी कारण ये अपने कथ्य और शिल्प में बहुआयामी हैं। भारतीय समाज की देशज परिस्थितियों का इनमें एक विश्वसनीय आधार और स्वरूप परिलक्षित होता है। इस संग्रह की समस्त कहानियों को पाठक पूरी दिलचस्पी के साथ पढेगा, ऐसी मैं आशा करता हूँ। यह लेखन में प्राथमिकता पाने वाला गुण है, जो संग्रह की सभी कहानियों में भरपूर है। जहाँ तक इस संग्रह का सवाल है, निश्चय ही बहुत कम उम्र में संजय ने एक बड़ी 'उम्मीद' जगाई है जिसके लिए निस्संदेह वह बधाई का पात्र है।


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कम्बल' कहानी क्रूरता और करुणा की मिलीजुली दास्तान है। इसमें उन घर बार विहीन असहाय, दुखी, दरिद्रों की पीड़ा है जो कूड़ा-करकट, चिथड़े, पॉलीथीन बीनकर, भीख माँग कर अथवा जूता-पॉलिश वगैरह करके खुले आकाश तले हाड़कंपाती सर्दियों की दुखदायी रातें किसी प्रकार काटते हैं। इस पैशाचिक यथार्थ से कमोबेश हम सभी परिचित हैं। किन्तु संजय ने इसी संदर्भ को रेखांकित करते हुए सत्ता और व्यवस्था की जिस बेरहमी का पर्दाफाश किया है, वह पाठक के मर्म को गहरी पीड़ा से भर देता है। भरे जाड़े के दिनों में इन निरीह परिवारों को इनके शरण स्थलों से धकेल दिया जाता है। इनके आश्रय स्थल किसी भी नगर के फुटपाथों के अलावा और होते भी क्या हैं? और वहाँ रैन-बसेरा के 'उद्धाटन' का नाटक किया जाता है। कनातें तानकर, कुर्सियाँ जमाकर एक 'रैन-बसेरे' का विद्रूप खड़ा किया जाता है। कथित भद्रजनों की उपस्थिति में मन्त्री जी रैन बसेरे का उद्धाटन कर जाते हैं। नगर के किसी हिस्से से मरे-गिरों को एक ट्राली में भरकर लाया जाता है और उन्हें एक पंक्ति में खड़ा करके कम्बल बाँटने का प्रहसन किया जाता है। बाद में मन्त्री जी के जाते ही उन कम्बल-प्राप्त बदनसीबों के सारे कम्बल झपट लिये जाते हैं। उन छीने हुए कम्बलों के एवज में दस-बीस रूपये उन्हें पकड़ा दिये जाते हैं। इसी क्रम में खदेड़े गए एक भीखू नामक अभागे की पत्नी को रात के अंधेरे में दरोगा उड़ा ले जाता है। बाद में उस औरत के साथ मुँह काला करके, उसे बीस रूपये पकड़ा कर चलता कर देता है। कहानी का विद्रूप और बेपनाह दर्द यह है कि भीखू कम्बल पा लेने और पत्नी की अस्मत लुट जाने के एवज में बीस रूपये पा लेने पर भी गौरव अनुभव करता है। क्योंकि वह अन्य लुटेपिटों की अपेक्षा अधिक सुरक्षित तो है।
 

        'हम एक-से' समवयस्क युवक युवतियों की एक जैसी मारक पारिवारिक स्थितियों में एक दूसरे के प्रति सहानुभूति तथा आकर्षण की गहरी भावना को व्यक्त करने वाली कहानी है।


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झूठ के सहारे' विदेशी प्रभावों से प्रदूषित यौनोन्माद और हमारे परिवारों में फैलते यौनाचार का मुखर विवरण है। ऐसे परिवारों में खाए-अघाए पति-पत्नी के बीच मिथ्याचार का आचरण ही सम्बन्धों की पीठिका बनता है। वास्तविकता से बखूबी परिचित होने के बावजूद ऐसे लम्पट दम्पत्ती उसी झूठ को विश्वसनीय बनाने में लगे रहते हैं। यह विदेशों से आयातित लम्पटता हमारे दाम्पत्य सम्बन्धों में शनैः शनैः गहराई से पैठती जा रही है।

 
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कब तक आखिर' एक मार्मिक कहानी है। जो भारतीय, और खासकर हिन्दू समाज में दहेज की दरिन्दगी का आख्यान है। इस गर्हित समाज में बेटी के विवाह के लिये अपनी सीमाओं से बहुत बाहर जाकर पिता स्वयं को दाँव पर लगा देते हैं और वर पक्ष की दहेज के प्रति अमानुषिक बुभुक्षा उसे प्रोणोत्सर्ग करने पर विवश कर देती है। संजय ने इस कहानी को गहरी संवेदना के साथ बुना-सँवारा है, ''... पर उसके अन्दर का दर्द तीव्र होता जा रहा था। ऑंखों के डोरे सुर्ख हो चले थे और गालों पर ऑंसुओं की सूखी लकीरों से दहेज की दरिन्दगी टपक रही थी, बेहिसाब, लगातार।'

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झुलसे सपने' एक ऐसी औरत की कहानी है, जो नित नये आदमी के साथ रहने को विवश है। उसकी 'मौज' का साधन है। उसके भी मन में विवाह के और बच्चों के सपने हैं। सपनों के पूरा नहीं होने की पीड़ा भी है। तभी तो कभी वह कहती है ''... सुयोग्य वर कहाँ मिल पाता है?'' और कभी कहती है ''...हर किसी के भाग्य में बच्चों का सुख कहाँ?'' इस कहानी में एक युवती की अधूरी कामनाओं का बड़ा ही सच्चा चित्रण है।


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वह' एक नाजायज सन्तान की कथा है। जो, समाज और अस्तित्व के प्रति निरन्तर विद्रोही तेवर बनाए रखता है और अन्ततः माँ के पास पहुँचकर भी उसका नाम पाने की बजाए उसे छोड़कर चला जाता है। गहरी संवेदनाओं की एक अच्छी कहानी है।
 

        'अनकही' एक ऐसे व्यक्ति का दर्द है, जिसकी पत्नी और सन्तान उसके ससुराल में रहते हैं। पत्नी की नौकरी उसी नगर में हैं। जबकि उसे स्वयं नौकरी के लिए अन्य नगर में जाना पड़ता है तथा वहाँ मकान किराए पर लेने की भी बाध्यता है। वह सप्ताह में एक बार 'रविवार' की छुट्टी में घर यानि अपनी ससुराल आ पाता है। नौकरी, पत्नी, बच्चा सभी कुछ होने के बावजूद वह विस्थापित की स्थिति में जीने को अभिशप्त है। यह कहानी आज के जीवन की विसंगतियों और येन-केन प्रकारेण आर्थिक आधार बनाए रखने की विवशता पर एक बेबाक बयान है। युवक की मनोदशा को संजय ने इस कहानी में खूब वास्तविकता के साथ लिखने का प्रयास किया है।


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कभी यूँ भी तो हो' एक निम्नवर्गीय कामकाजी लडकी दीक्षा की अन्तर्व्यथा है। तीन भाई-बहनों और माता-पिता के परिवार के पोषण में खटते-खटते वह हाँफ उठती है। उसकी भी अपनी कोई निजी और अन्तरंग जिन्दगी हो सकती है, उसकी तो जैसे किसी को चिन्ता ही नहीं है। उसे प्रेम करने वाला युवक 'परिमल' उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखता है, किन्तु उसके परिवाजन इस ओर से पूर्ण-रूपेण विमुख दिखाई पड़ते हैं। दीक्षा को लगने लगता है कि जीवन उसके लिए महज एक बंजर भूमि अथवा रेगिस्तान बनकर रह गई है। शादी की उम्र निकल जाने के बाद कोई उसकी ओर ऑंखें उठाकर भी नहीं देखेगा। ऐसी दारूण स्थिति में वह अपने अस्तित्व के प्रति सजग होकर अपने प्रेमी से विवाह करने का फैसला ले लेती है। 'कभी यूँ भी तो हो' इस कहानी में निहित एक बेबाक संदेश है। इस कहानी में हमारे निम्न मध्यवर्गीय परिवारों का वह चेहरा भी बेनकाब होता है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपने ही स्वार्थ और 'स्व' में बंदी होकर रह जाता है और अपने लिए मूक रहकर बलिदान देते चले जाने वाले की ओर से ऑंखे मूँद लेता है।

 
        डिस्गस्टिंग एक अमीर बिगड़ैल लड़की की कहानी है, जो कि निहायत ही बेहूदा किस्म के रहन-सहन की आदी है। किस प्रकार उसकी गलतियों की सजा एक निर्दोष प्राध्यापिका को मिलती है, यह इस कहानी के मूल में है।
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विश्वासघात' एक ऐसी कहानी है, जिसमें एक युवती को एक ऐसा आदमी छल रहा है, जिसका आचरण ठीक नहीं है। 'जब वस्तुस्थिति मनःस्थिति के अनुकूल नहीं होती है, तो परिस्थिति हो जाती है।' नायक द्वारा कहे गए समझाईश के ये शब्द उसके मन में उस युवती के लिए गहरी सहानुभूति को दर्शाते हैं।

 
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उसके लिए' एक लम्बी कहानी है। जिसमें लेखक ने वर्षों लम्बा कथानक बुना है। एक लड़की, जिसको नायक छुप-छुप कर खिड़की से देखा करता था, कई बरसों बाद, वो उससे मिलता है। एक लडकी के त्याग और संघर्ष की इस कहानी के अन्त में नायक उसके बेटे को अपनाता है और उसे खूब पढ़ाता लिखाता है, विदेश भेजता है। गहरी संवेदनाओं से भरी यह एक पठनीय कहानी है।
 

        इसके अतिरिक्त 'ये कहानी नहीं', 'इन्वेस्टमेण्ट', 'कॉकटेल' और 'नई सुबह' कहानियाँ भी अच्छी बन पड़ी हैं। यहाँ 'नई सुबह' का विशेष जिक्र करना चाहूँगा। क्योंकि इसमें बालिका अशिक्षा और बाल विवाह जैसी दो महत्वपूर्ण समस्याओं को लेखक ने एक साथ प्रभावी ढंग से उठाया है और उनके कारण होने वाली समस्याओं को बखूबी रेखांकित किया है। समाज और समाज में स्त्री शिक्षा की स्थिति पर यह एक विशिष्ट कहानी है।


        संजय विद्रोही की प्रायः सभी कहानियाँ सामाजिक सरोकारों से गहरा साक्षात्कार तो कराती ही हैं, उनके सकारात्मक पहलू भी तलाश करने की दिशा में अग्रसर होने में सक्षम हैं। सभी कहानियों में एक बात जो विशेष उल्लेखनीय है, वह है 'नारी' की उपस्थिति। प्रत्येक कहानी किसी ना किसी रूप में 'नारी' से जुड़ी हुई है। नारी जगत की समस्याओं और विद्रूप स्थितियों का सूक्ष्म चित्रण करने के लिए संजय ने कड़े प्रयास किए हैं और एक हद तक उसमें सफल भी हुए हैं। इसके लिए उन्हें बधाई।
 

        दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि लेखक ने किसी वाद विशेष अथवा धारा विशेष को अपने लेखन में प्रश्रय नहीं दिया है। वह कहानी लेखन में सहज अन्तः-प्रेरणा का अनुगामी है। लेखक की भाषा पाठक से स्वाभाविक संवाद करने में कहीं व्याघात उपस्थित नहीं करती। उसके अनुभव और उन्हें कथ्य में ढालने की कुशलता उसके अच्छे लेखन का परिचायक है। मुझे एक विश्वास, एक बल मिलता है कि संजय विद्रोही का मनस्तत्व उन्हें सामाजिक मुद्दों से इसी प्रकार गहराई से जोड़े रहेगा और वो पाठकों को निरन्तर अपनी सृजनशीलता से अनुप्राणित करते रहेंगे।


    निस्संदेह 'गोदनामा' के बाद यह दूसरा कहानी संग्रह संजय विद्रोही की सृजनशीलता को नये आयाम देगा।

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n       समीक्षक: से. रा. यात्री

n       पुस्तक: कभी यूँ तो भी हो

n       लेखक: संजय विद्रोही

n       प्रकाशक: लोकभाषा प्रकाशन, कोटपुतली, जयपुर

n       मूल्यः 100 रुपए

n       पृष्ठः 120


oसे. रा. यात्री

एफ. ई. - 7, नया कविनगर

गाजियाबाद - 201002

 

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कहानी लिखना जितना कठिन है, उससे ज़्यादा कठिन है उसकी भूमिका लिखना - कमलेश्वर

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