हिन्दी में कविता के पिछले तीन दशक
सन्
1930 के आते-आते छायावाद का सूर्य अस्ताचलगामी हो चला था।
तत्कालीन परिस्थितियों से प्रभावित छायावादी कवियों की
प्रवृत्तियों का उदय हो रहा था। 1936 तक एक ओर
स्वछन्दतावादी प्रवृत्तियाँ जोर मारने लगीं थीं तो दूसरी
और मार्क्सदर्शन पर आधारित प्रगतिवाद का उदय होने लगा था।
छायावाद के उत्तरार्ध और प्रगतिवाद की इस उदयकालीन
संधि-बेला में जिन कवियों का नाम उभर कर सामने आया । उनमें
दिनकर, नरेन्द्र शर्मा, शिवमंगल सिंह सुमन, सोहनलाल
द्विवेदी, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, नागार्जुन, भवानी
प्रसाद मिश्र, गिरजा कुमार माथुर, मुक्तिबोध नेमीचंद, भारत
भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे तथा रामबला शर्मा आदि अनेक
ऐसे कवि थे जिन्होंने प्रगतिशील साहित्य की परमपरा को
समृद्ध किया। शीर्षक को ध्यान में रखकर बात करें तो हिन्दी
में कविता के तीन दशक तारसप्तक परम्परा के चौंथे तारसप्तक
जो लगभग 1979 में प्रकाशित हुआ, हिन्दी में कविता की तीन
दशक के समय को छूता दिखाई देता है । नयी कविता का प्रथम
संकलन तारसप्तक के रुप में प्रकाशित हुआ । नयी कविता को
प्रतिष्ठित करने में तारसप्तक एवं परवर्ती सप्तकों का
महत्वपूर्ण स्थान है । पहले तो प्रयोगवादी रचना फिर 8-9
वर्षों के पश्चात् हिन्दी में नयी कविता का नाम व्यवहार
में आया । वस्तुतः प्रयोगवादी कविता तथा नयी कविता में
कोई तात्विक भेद नहीं है । नयी कविता में प्रयोगवाद,
प्रगतिवाद, नवगीत, अकविता आदि सभी काम काव्यान्दोलनों के
समन्वय के रुप में ही नयी कविता का जन्म हुआ ।
यों तो प्रत्येक युग का साहित्य युगीन प्रेरणाओं का
प्रतिफलन होता है किन्तु नयी कविता एवं समकालीन साहित्य
मुख्यतः युग चेतना से अनुबद्ध है। युगबोध से अभिप्राय
समुन्नत भावबोध के प्रतिफलन से है। यह इतना व्यापक शब्द
है कि इसकी परिधि में राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, नैतिक
और सांस्कृतिक मूल्यों तथा आदर्शों से जुड़ा समस्त चिन्तन
इसके माध्यम से अभिव्यंजित हो जाता है। आदर्शवाद,
व्यक्तिवाद, समाजवाद, मानवतावाद आदि से संबंध सभी
प्रवृत्तियाँ युगबोध में अन्तर्भूत है। किसी भी साहित्यिक
संरचना के महत्ता, सार्थकता का सही मुल्याँकन युगसंबोधक
प्रवृत्तियों के आधार पर ही किया जा सकता है।
चौथा तारसप्तक में ही ऐसी बहुत सी कवितायें हैं जिनमें
रचनाकार युग जीवन के ज्वलन्त प्रश्नों और समस्याओं से संवेदन
स्तर पर जूझता है । अवधेश कुमार की
“लड़ाई”
शीर्षक कविता में शोषण पर आधारित व्यवस्था का विरोध है । उन्होंने एक रुपक के माध्यम से बताया है कि हाथ या
पैर या फिर सिर काट कर धड़ को जूझने के लिये छोड़ दिया
जाता है । समूचे व्यक्तित्व से लोहा लेने में व्यवस्था भी
कतराती है ।
वे कहते हैं
–
“समूचा
मुझे कोई नहीं नोचता
समूचा मुझसे कोई नहीं टकराना नहीं चाहता
उन्हें चाहिये मेरा कोई अंश
उनके अपने मतलब का”
राजकुमार अम्बुज की
“इस
हिमपात में”
रचना में भी आतंक, दहशत और शोषण के कुचक्र की भर्त्सना की
गयी है । यथा-
“बदबू
फैला रही लाश का इंतजाम
उस सरकारी दुकान पर मत खोजो
मत खोजो जिस पर अनाज का बंदोबस्त हो ही नहीं पाता
ठीक से उम्मीद करना बेकार है
कि सरकारी दुकान ज़िंदा रहने की कोई छत होगी”......
“चौथा
तारसप्तक”
की रचनाओं में तत्कालीन परिस्थितियों के प्रतिफलित बोध के
विविध आयामों के अनुशीलन से रचनाकारों के संवेदी स्तर
मानसिकता और चिन्तन प्रक्रियाओं और यौन चेतना संदर्भित
प्रसंगों के मूल्यांकन से रचनाओं की वैचारिकदृढ़ता स्पष्ट
होती है ।
अकविता –
1960 के पश्चात् हिन्दी कविता संरचना के क्षेत्र में ही
नहीं वरन संपूर्ण साहित्य में अस्वीकृति का एक चक्र चल
पड़ा । नई कविता के बहुत से कवियों ने नये तरुण कवियों के
आक्रोश को स्वीकार नहीं किया । सप्तक कवि किसी विचारधारा
विशेष से बंधकर नहीं रहना चाहते थे । दूसरी ओर तरूण कवियों
पर परिवेश की वास्तविकताओं का गहरा प्रभाव पड़ा । बढ़ती
हुई बेकारी, भुखमरी, राजनैतिक भ्रष्ट्राचार और खोखले आदर्शों
की निर्ममता ने देश के वातावरण को कुण्ठित, उदासीन और
आक्रोशपूर्ण बना दिया । धूमिल, दूधनाथ सिंह, मणी मधुकर,
मृत्युंजय, कैलाश बाजपेयी आदि कवियों की रचनाऐं प्रस्तुत
संदर्भ में उल्लेखनीय है।
अकविता शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम नई कविता के संयुक्तांक
में किया गया था। अतुल, विभव, गिरजा कुमार माथुर आदि
कवियों का सहयोग प्राप्त कर डॉ. श्याम परमार ने अकविता
पत्रिका को नये ढंग से प्रकाशित किया। उसमें परम्परा को
नकारा गया है
। नारायणलाल परमार का कहना है कि अकविता जीवन की
अभिव्यक्तियों को न मारकर जीवन के सही संदर्भों को उजागर
करने में विश्वास करती है। गिरजा कुमार माथुर ने अकविता को तीसरे विकास चरण का प्रारंभ कहा है। इसके
पश्चात् तो हिन्दी अकविता में विभिन्न मोड़ आये जैसे
वीटनिक कविता, विचार कविता और हाईकू।
हाईकू-
नई कविता में हाईकु किस्म की कविताओं का सर्वप्रथम
सूत्रपात अज्ञेय ने किया था। श्री जगदीश कुमार का मत है कि
बिम्बवादियों ने भी क्षणिक निरीक्षणों का जापानी हाईकु
जैसी लघु कविता में निबद्ध किया है। अज्ञेय ने जापानी कवि
वाशों के प्रसिद्ध हाईकू का अनुवाद इस प्रकार किया है
–
“झरना-झरना
पत्ता
हरि डाल से
अटक गया”
दतिया के कवि गोस्वामी ने गीता संपूर्ण अध्यायों को हाईकू
में लिखा है । गुना के कवि नलिन ने भी हाईकू पर पुस्तक
लिखी है। ऐसे अनेक कवि हैं जिन्होंने हाईकू के माध्यम से
अपने विचार व्यक्त किये हैं।
ग़ज़ल-
गालिब को ग़ज़ल का बादशाह माना जाता है। हिन्दी में भी
अनेक कवियों ने ग़ज़ल को अपने-अपने ढंग से अभिव्यक्ति दी
है। निराला, शमशेर बहादुर सिंह, दुष्यंत कुमार, रघवीर सहाय
आदि कवियों ने हिन्दी में ग़ज़ल के प्रयोग किये हैं ।
ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसा दौर आता है कि जब तकलीफ गुनगुनाहट
के रास्ते बाहर आना चाहती है।
इश्क और हुस्न से ऊबकर तकलीफ
का बयान इन ग़ज़लों में किया है। यथा दुष्यन्त कुमार कहते
हैं-
“कैसे
मंजर सामने आने लगे हैं
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं
वो सलीकों के करीब आते तो हमको
कायदे कानून समझाने लगे हैं
ग़ज़ल के माध्यम से कवियों ने जीवन विचारों और कार्य की
विसंगतियों को स्पष्ट किया है।
नवगीत-
गीत हिन्दी काव्य परम्परा की चिरपरिचित काव्य प्रवृत्ति
है। किसी भी युग की किसी भी काव्य धारा से गीत असम्प्रक्त
नहीं रहा है। छायावादी गीत परम्परा में केदानराथ,
नागार्जून आदि स्वच्छन्दतावादी भावधारा
के प्रभावशाली गीत
शैली में नीरज, वीरेन्द्र मिश्र आदि नवगीतकारों ने
शम्भूलाथ सिंह, केदारनाथ एवं भारती प्रमुख हैं। नवगीतकारों
में प्रमुखरूप से उमाकान्त मालवीय, ठाकुर प्रहलाद सिंह,
सूर्यभान गुप्त, लक्ष्मीकान्त सरस, सुधा गुप्ता, प्रेमशंकर
आदि हैं। इस प्रकार नई कविता के समानान्तर अनेक
काव्यान्दोलन और काव्य रचना शैलियाँ हिन्दी में विकसित हुई
है।
विदेश में कविता-
पिछले 12 वर्षों में हिन्दी कविता विदेशों में अत्यन्त
प्रभावशाली रूप में उभरकर सामने आयी है। ब्रिटेन से निकलने
वाली एक मात्र हिन्दी की पत्रिका पुरवाई द्वारा कम
से कम 50 कवि प्रकाश में आये हैं जिनमें लगभग 20 कवियों के
एक से अधिक काव्य संग्रह छप चुके हैं। अधिकांश कवियों ने
पुरवाई के माध्यम से अपनी पहचान बनाई है । कवियों की मुक्त
छंद आदि विविध शैली विविध विषयों पर निष्ठा, गंभीरता और
बेबाक ईमानदारी के साथ लिखी जा रही है। जिसमें रसावाद,
चिन्तन, चुनोती, समस्या, ललकार, पीड़ा, हास्य व्यंग्य आदि
सभी विषय देखने को मिलते हैं । हिन्दी समिति द्वारा
प्रकाशित “दूर
बाग में सौंधी मिट्टी”
संकलन ने कवियों को हिन्दी मंच की पहचान दी है।
ब्रिटेन
में गीत ग़ज़ल के लिये सोहन राही मूलतः हर्ष उल्लास के कवि
माने जाते हैं। प्राण शर्मा एक अच्छे ग़ज़लकार हैं। अक्षर
भू पत्रिका के माध्यम से सोहन राही, प्राण शर्मा, अचला
शर्मा,गौतम सचदेव, मोहन राणा, ऊषा राजे, पदमेश गुप्त,
दिव्या माथुर, शैल अग्रवाल, अमृता, चिरंजीव शर्मा आदि की
प्रतिनिधि कविताओं को प्रकाशित किया है।
गत वर्ष
"यहाँ से वहाँ तक"
नामक एक कविता संग्रह (संपादक-जयप्रकाश मानस) भारत से
प्रकाशित हुई है जिसमें ब्रिटेन के सतत् सक्रिय कवियों की
शताधिक कविताएं को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया गया
है ।
इस प्रकार इटली,
जर्मन, जापान, मॉरीशस, फिजी, अमेरिका, आस्ट्रेलिया जैसे
देशों में हिन्दी कविता पर बहुत कार्य हो रहा है।
आज की कविता में प्रमुख प्रवृत्तियाँ निम्न प्रकार हैं-
01).
आस्था-अनास्था का स्वरूप।
02).
वेदना और नैराश्य की प्रवृत्ति।
03).
अहम् निर्दिष्ट व्यक्तिवाद।
04).
आक्रोशजन्य विद्रोही स्वर
05).
आंचलिक चेतना का समाहार।
06).
अनुभूति की प्रमाणिकता का आधार ।
07).
नवीन बिम्ब योजना।
08).पौराणिक
प्रतीकों का प्रयोग।
09).
लय और मुक्त छंद।
10).
नवीन उपदान विधान।
इस प्रकार हिन्दी में कविता के तीन दशक को इतने कम समय में
व्यक्त करना एक कठिन कार्य है। संक्षेप में हिन्दी कविता
अपने विकास की ओर अग्रेषित हो रही है। वह अपने नये रूप में
भारत में ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में अपनी पहचान बनाती हुई
दिखाई दे रही है।
O
रामसेवक सोनी
अशोक नगर, मध्यप्रदेश
