‘दिनकर’
की कविता में क्रान्ति द्रष्ट शंकर का
हुंकार
कवि
त्रिकाल दर्शी होता है। वह अतीत के स्वर्णिग पंखों पर
बैठकर वर्तमान की संवारते हुये उज्जवल भविष्य का सृजन करता
है। कवि दार्शनिक भी होता है। जिस कविता में दर्शन नहीं
होता है। कविता मूल्यहीन और निष्प्राण होता है। आज की
छायावादोत्तर यानी प्रयोगवादी कविता भारतीय दर्शन के अभाव
में भोगवादी और क्षणिक बनती जा रही है। जिस कविता में
निष्प्राण में प्राण फूंकने की क्षमता न हो वह कविता ईरण
की तपन होती है। कवि युगद्रष्टा ही अपितु वह राष्ट्र के
सुप्त विचारों को नवस्पदन देता है। कवि श्री रामधारी सिंह
‘दिनकर’
अपने समय के युग द्रष्ट्रा थे। जिन्होने स्वतन्त्रता
आन्दोलन और चीनी आक्रमण की त्रसजी देख ली थी। उनकी शीतवाणी
आग उगलने लगी थी जिसकी परिणति
‘परशुराम
की प्रतिज्ञा’
काव्य में हुई । 1962 की चीनी आकक्रमण ने कवि को झकझोंर कर
रख दिया था। 45 वर्ष गुजर गए किन्तु आज तक परशुराम की
प्रतिज्ञा पूरी न हो सकी। तब तक देश में आतंकावाद की नीव
पड़ी । देश आतंकवाद की त्रासदी झेल रहा है जो हमारी
पुरूषार्थहीनता और कायरता की देन है।
‘मेरे
नगपति, मेरे विशाल । साकार दिव्य गौरव विराट्, मेरी जननी
के हिम किरीट ।’
कवि का ‘हिमालय’
आज तक रो रहा है। क्योंकि देश की भूमि आक्रमणकारी चीनी के
नियन्त्रण में है । आज तक चीन अधिकृत भारतीय भूमि मुक्त
नही हो सकी है। यह हमारे शौर्य के लिए शर्मनाक चुनौती हैं.
आज तो देस आतंकवाद से जूझ रहा है।
कवि श्री ‘दिनकर’
भारतीय संस्कृति और अतीत गौरव के अमर गायक है। वे देस में
व्याप्त आराजक तत्व और आंतक के संहार के लिए सत्यम् शिवम्
सुन्दरम् के देवता भोले शंकर को ताण्डव नृत्य करने के लिए
आवाहन करते हैं जिन्होने अपने युग के दुर्दान्त आतंकी
तारकाक्ष, विद्युन्माली और कमलाक्ष इन त्रिपुरो को
अग्निवाण के प्रक्षेपण से मार गिराया था। ये आतंकी आकाशगत
हो कर त्रिपुर विमान से धरती पर विस्फो्ट कर रहे थे ।
क्रान्तिद्रष्टा शंकर का हुंकार आतंकवादी के खिलाफ था।
उनके तीसरे नेत्र में निहित आणविक ऊर्जा के समक्ष महाकाल
की मारक शक्ति क्षीण रहती थीं । वे प्रलयंकर थे किन्तु
शान्तिप्रिय लोगो के शंकर थे।
‘नाचो
हे !
नोचो नटवर!’
चन्द्रचूड़ !
त्रिनयन !
गंगाधर !
आदि प्रलय !
अवढ़र !
शंकर !
‘नाचो
हे !
नोचो नटवर!’
आदि लास अविगति अनाति स्वन,
अमर नृत्य ,गति,काल, चिरन्वन,
अंगभंगि, हूंकृति,झंकृति कर थिरक है
!
विश्वम्भर ्!
‘नाचो
हे !
नोचो नटवर!’
‘दिनकर’
जी देश में सक्रिय अराजतत्व और आतंक को कुचने के लिए
प्रलयंकर शंकर के हुंकार का आवाहन करते है। भोले बाबा
प्रलय नृत्य कर राष्ट्र विरोधी शक्तियों को विध्वंस करने
में समक्ष है। उनके हुंकार मात्र से ब्रह्माण्ड काँप जाता
हैं। दिशाए सिहर उठती है। प्रकृति अपना संतुलन खो बैटती
है। दिन में आकाश में तारे निकल पड़ते है। कवि संहार के
देवता शंकर का स्तवन इस प्रकार करते है :-
‘सुन
श्रृंगी निर्धोण पुरातन,
उठे सृष्टि हृत में नव स्पन्दन,
विस्फारित लख काल नेत्र फिर,
स्वर स्वर भर संसार ,ध्व्नित हो,
नगपति का कैलाश शिखर,
नाचो हे !
नाचो नटवर !’
शांकर युग में घटुत त्रिपुर आतंकावाद देवजातियों के लिए
संहारक था। ये आतंकी धरती को छोड़कर नीले आकाश में
विश्वकर्मा निर्मित त्रिपुर में छिपकर आक्रमण करते थे । ये
त्रिपुर उड़ने लावे नगर कहे जाते थे। मय ने अपने यांत्रिक
कौशल से इनका निर्माण किय जाता था। ये त्रिपुर सोने,
चाँदी, और लोहे से बने थे जिनका भेदन करना असम्भव था।
देवों की रक्षा के लिए विश्वकर्मा द्वारा बनाए गए
‘सर्व
देव मय’
रथ पर आरूढ़ होकर भोले बाबा युद्ध क्षेत्र में आए ।
‘नते
तीव्र गति भूमि की पर’
अट्ठहास कर उठे धराधर
उपटे अनल, फटे ज्वालामुख
गरजे उथल पुथल कर सागर
गिरे दर्ग जड़ता का ऐसा, प्रलय बुला दो प्रलयंकर
!
नाचो हे !
नाचो नटवर !
घहरे प्रलय पयोद गगन में, अन्य धूम हो व्याप्त भुवन में ।
बरसे आग बहे झंझानिल, मते, त्रारि जग के आंगन में
फटे अतल पाताल, धंसे जग, उछल कुदे भूधर।
नाचो। नाचो नटवर !
आज की वैज्ञानिक सभ्यता विश्व में आणनिकी भय दिखाकर
निरीहजन को विस्थापित कर रही है तथा देश की संस्कृति और
जनपदों को उजाड़ने में लगी हुई है. असहायों का शोषण और
उत्हीड़न करने में आधुनिक सभ्यता आज आगे है। इसे आसुरी
सभ्यता कही जा सकती है। शांकर युग में आणविक शक्ति सम्पन्न
त्रिपुरीय आतंकियों ने कहर ला दिया था। शंकर ने
पाशुपत्यास्त्र का प्रक्षेपणकर तीनो नगरों को जला दिया था
। उन्होंने शठंप्रतिशाठ्यं की नीति अपनाई थी. आज देश में
हमारी शान्ति प्रियता और अहिंसा प्रेम की आड़ में हम पर
आक्रमण और आतंकी हमले हो रहे है। भगवान शंकर ने असुरो से
ऐसा नहीं होने दिया था। उन्होंने ईट का जवाब पत्थर दिया
था।
प्रभु !
तब पावन नील गगन तल,
विदलित अमित निरीह निवल दल,
मिटे राष्ट्र उजड़े दरिद्र जन,
अहा, सभ्यता आज कर रही,
असहायों का शोषित शोषण
पूछो, साक्ष्य भरेंगे निश्चय, नभ के ग्रह नक्षत्र निकर,
नाचो हे नाचो नटवर
कवि श्री ‘दिनकर’
विश्व में व्याप्त आंतक को समाप्त करने के लिए क्रान्ति
द्रष्टा शंकर का आवाहन करते है।
‘नाचो
अग्निखण्ड भर स्वर में, फूंक-भूंक ज्वाला अम्बर में,
‘अनिल
कोष द्रुमदल जल थल में, अभय विश्व के उत अन्तर में।’
गिरे विभव का दर्प चूणी हो, लगे आग इस आडम्बर में ।
वैभव के उच्चाभिमान में अहंकार के उच्च शिखर में,
स्वामिन अंधड़ आग बुला दे, जले पाप, जग का क्षण भर में।
डिम-डिम डंमरू बजा निजा निज कर में नाच तीसरी आँख तरेरे ।
रच दे फिर से इसे विधाता, तू शिव सत्य और सुन्दर ।
नाचो। नाचो नटवर !
अब देखना है कि आतंकवाद के खिलाफ शंकर की तीसरी आंखे कब
खुलती है ?
oबनवारी
लाल ऊमर वैश्व
डंकीनगंज,
मीरजापुर,
उत्तरप्रदेश,
231001
