जो साहित्य में कमलेश्वर ने जिया
हिन्दी
कहानी को यथार्थवादी कलेवर प्रदान करने के लिए जिन कथा
शिल्पियों को बराबर याद किया जाता रहेगा, उनमें कमलेश्वर
का नाम अग्रिम पंक्ति में शुमार रहेगा । चाहे साठोत्तरी
कहानी का प्रश्न हो या समांतर कथा आंदोलन का जिक्र,
कमलेश्वर ने अपने अन्य साथियों मोहन राकेश एवं राजेन्द्र
यादव के साथ नयी कहानी के परचम को ककई बहसों के बीच ऊँचे
उठाये रखा । यह किसी ने सोचा नहीं था कि निर्मल वर्मा और
मनोहर श्याम जोशी के निधन के इतने जल्दी बाद हिन्दी जगत की
एक और अपूर्णीय क्षति है । निर्मल वर्मा के निधन के बाद
कमलेश्वर ने यह टिप्पणी की थी-
‘निर्मल
के लिए 72 वर्ष की उम्र जाने की उम्र नहीं थी।’
कौन जानता है कि स्वयं कमलेश्वर कुछ दिन बाद 75 वर्ष की
उम्र में इस तरह चले जायेंगे।
उनके परम मित्र राजेन्द्र यादव ने कमलेश्वर की श्रेष्ठ
कहानियों की भूमिका में मेरा हमदमः मेरा दोस्त के तहत उनके
स्वभाव को लेकर लिखा था
–
“(उसमें)
शांति और एकाग्रता केवल उस समय (देखी जा सकती (थी) जब कलम
हाथ में हो, वरना कमलेश्वर से कभी मिल लीजिए...... वह या
तो कहीं से भागता दौड़ता चला आ रहा है, या जल्दी-जल्दी
सामने के काम खत्म कर उसे कहीं भागना है । यह शब्द आज से
चार दशक पूर्व क्यों न लिखे गये हो कमलेश्वर की रचनात्मक
सक्रियता व कर्मशीलता पर इससे अच्छी टिप्पणी और क्या हो
सकती है ?
साहित्य, पत्रकारिता और फिल्म लेखन में अपनी एक साथ
कद्दावर मौजूदगी के बावजूद उनका यह ताज़ा वक्तव्य कि- जो
मैं लिखना चाहता था वह लिख नहीं सका, उसका कब वक्त मिलेगा?
- उनकी रचना धर्मिता को लेकर बहुत कुछ कहा जाता है। मानो
साहित्य को इतना कुछ देने के बावजूद उन्हें अपनी ओर से कुछ
श्रेष्ठतम देना था। लेकिन उसका वक्त नहीं मिल पाया। इस पर
भी उन्होंने अपनी ढेरों रचनाओं के माध्यम से जो कुछ हिन्दी
साहित्य को दिया है उसकी अन्यत्र तुलना सरल नहीं है ।”
एक सड़क सत्तावन गलियाँ, मांस का दरिया, तीसरा आदमी, काली
आँधी, एक समुद्र में खोया आदमी जैसे चर्चित उपन्यासों के
बाद एक नयी भावभूमि को लेकर लिखा गया उनका कालजयी उपन्यास-‘कितने
पाकिस्तान’-एक
अलग मिसाल कायम कर चुका है। अब तक उसके करीब 12 संस्करण छप
चुके हैं जबकि अँगरेज़ी सहित कुछ भारतीय भाषाओं में उसका
अनुवाद हो चुका है।
‘नई
कहानियाँ’
एवं ‘सारिका’
जैसी प्रतिष्ठित कहानी पत्रिकाओं के कुशल सम्पदान के अलावा
उनकी सैकड़ों कहानियाँ, हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि बनी
हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया है - मुझे अपनी सभी
कहानियाँ पसंद नहीं है मैं जिन कहानियों को ठीक से लिख
सका, वे ही मुझे अच्छी लगती हैं। ऐसा कम ही होता है कि
कमलेश्वर की तरह किसी साहित्यकार ने विभिन्न
विधाओं-साहित्य, पत्रकारिता और फिल्म लेखन में इनकी गहरी
छाप छोड़ी हो। भाषा पर भी उनकी गहरी पकड़ थी। दूरदर्शन के
अतिरिक्त महानिदेशक और दैनिक भास्कर एवं दैनिक जागरण का
सम्पादन उनकी कर्मयात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव रहे हैं।इन
सभी विधाओं को एक साथ रखकर देखने पर भी रचनाधर्मिता
साहित्य एवं समाज के प्रति कमलेश्वर की ठोस प्रतिबद्धता का
कहीं कोई मुकाबला नहीं हो सकता । कुछ आलोचक उन्हें कई
हिस्सों में बंटा व्यक्तित्व क्यों न करार देते रहे हों,
ऐसा करते हुए वे उनके बहुआयामी लेकिन सम्पूर्ण व्यक्तित्व
को नज़रअंदाज करते हैं।
कमलेश्वर
के उपन्यासकार, कहानीकार, पटकथा लेखक एवं चिंतक पत्रकार
में से कौन किससे आगे रहा होगा यह तो समय तय करेगा। लेकिन
उन सब में अपनी ज़मीन एवं ज़मीर से जुड़ा कमलेश्वर
सर्वप्रिय बना रहा है। सारिका में उनका सम्पादकीय स्तम्भ
‘मेरा
पन्ना’
सामयिक स्थितियों पर विचारपूर्ण टिप्पणियाँ लिये रहता था।
कभी उत्तर-प्रदेश के मैनपुरी कस्बे से उठकर इलाहाबाद,
मुम्बई और दिल्ली जैसे क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान
बनाने वाले कमलेश्वर ने कस्बे और आम आदमी को थामे रखने के
साथ-साथ उस महानगरीय संस्कृति को भी निशाना बनाया जो अपनी
चमचमाहट के बावजूद भीतर से भोथरी रही है। इसी तरह दलित एवं
सर्वहारा वर्ग भी कमलेश्वर से दूर नहीं रहे हैं। दूसरी ओर‘आँधी’
और ‘मौसम’
जैसी बहुचर्चित फिल्मों के अलावा
‘परिक्रमा’,
‘दर्पण’,
‘चन्द्रकाता’
जैसे टीवी धारावाहिक उनके लेखन को नया आयाम दे पाये थे।
दूरदर्शन को उसके शैशवकाल में नयी दिशा देने में भी
कमलेश्वर की महती भूमिका रही थी।
हाल में
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनेक सामाजिक मुद्दों तथा समाज
में व्याप्त विसंगतियों को लेकर लिखे गये धारदार लेख उनकी
प्रतिबद्धता और साफ वयानी के परिचायक होने के अलावा एक नई
सोच पैदा करते थे। कमलेश्वर विचारधारा से ठेठ वामपंथी रहे
थे। उन्होंने जो कुछ भी कहा काफी बेबाकी से कहा और लिखा।
साम्प्रदायिकता के खिलाफ़ उनके ज़ेहाद ने कइयों को ख़फा
किया होगा । लेकिन सच कहने का साहस नहीं छोड़ा । सारिका के
सम्पादन के अन्तिम दिनों में उन्होंने देश का तत्कालीन
स्थितियों के ख़िलाफ अपनी टिप्पणियों के कारण पद से चिपके
रहने के बजाय उसे छोड़ना बेहतर समझा था । उन दिनों देश में
आपात स्थिति लागू थी। कलम और कंठ की आजादी पर सवाल उठ रहे
थे। लेकिन कमलेश्वर उसके बाद भी साहित्य के क्षेत्र में
बराबर छाये रहे। उनके लेखन पर उन्हें साहित्य अकादमी
पुरस्कार 2003 में (कितने पाकिस्तान के लिए) तथा पद्म भूषण
(2005) देर से क्यों न मिले हों, यह वास्तव में उनकी
प्रतिबद्धताओं का सम्मान रहा है, जिसके केन्द्र में समय और
समाज शामिल रहे थे। कलम को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना
कमलेश्वर से बढ़कर कौन जानता रहा होगा। उनके कंठ की ताकत
भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करती थी।
समाज पर हो रहे अत्याचार का प्रश्न हो या समाज विरोधी
कार्रवाइयाँ अथवा दलितों का दमन कमलेश्वर का विचारक सदा एक
ऊँचे स्तर पर नज़र आया । कमलेश्वर ने जहाँ अपनी रचनाओं के
माध्यम से शब्दों का नया संसार बुना वहीं सर्जनात्मकता को
बढ़ावा देने में भी उनकी भूमिका कम उल्लेखनीय नहीं है।
स्वभाव से काफी शालीन कमलेश्वर से मिलने वाले हर क्यक्ति
को उनमें एक अपनापन झलकता था। शायद तभी उनके पास जाने के
बाद हर कोई उनके निकट होने का दावा करता दिखाई देता है।
ऐसे लोग भी जिनके यहाँ उनके फोन की घंटी कभी शायद न भी बजी
हो।
आज भी कुछ लोग छठे दशक के समान्तर कहानी आन्दोलन एवं भोगे
हुए यथार्थ पर भिन्न राय क्यों ने रखते हों । इस दौर ने
हिन्दी कहानी को एक अलग तेवर प्रदान करने के अलावा नवलेखन
को भी एक नई दिशा दी। उसमें सारिका के सम्पादक के तौर पर
उनकी भूमिका सदैव याद रहेगी। सारिका ने उन दिनों हिन्दी
साहित्य को रचनाकारों की जो नई पीढ़ी प्रदान की उसकी सूची
काफी लम्बी है। मुझे आज भी वे दिन याद हैं जब 1970-71 में
कमलेश्वर जी के सान्निध्य में कुछ समय के लिए सारिका में
काम करने का मौका मिला था।मेरा चयन टाइम्स ऑफ इंडिया की
ट्रेनिंग स्कीम में हुआ था। उस समय प्रशिक्षणार्थियों को
उनकी रुचि के अनुसार नवभारत टाइम्स, धर्मयुग, सारिका,
माधुरी में भिजवाया जाता था। तब तक मेरी कहानियाँ अन्यत्र
छपती रही थी। ऐसे में अपने एक प्रिय लेखक को सम्पादक के
तौर पर पाना मेरे लिए किसी सुखद संयोग से कम न था।
कमलेश्वर के सम्पादन काल में सारिका में कहानी के चयन और
सम्पादन से लेकर प्रकाशन की प्रक्रिया तो काफी सटीक थी ही,
नई प्रतिभाओं को भी उचित स्थान मिलता रहा था। सारिका में
मेरा पहली कहानी भी उन्हीं दिनों कमलेश्वर जी ने निमंत्रित
कर छापी थी। सारिका कालान्तर में बंद हो गयी, उसे दिल्ली
भिजवा दिया गया। कन्हैयालाल नंदन उसके सम्पादक रहे। लेकिन
सारिका के माध्यम से कथा साहित्य में कमलेश्वर का योगदान
आज भी हिन्दी साहित्य का एक स्वर्णिम अध्याय बना हुआ है।
कालान्तर में मैं भी कहानी से पत्रकारिता की तरफ मुड़ गया।
कुछ कहानियाँ भी छपती रहीं लेकिन किसी न किसी तरह कमलेश्वर
जी से सम्पर्क बना रहा । वे अपने सहयोगी रह चुके साथियों
के कैरियर ग्राफ को बड़े चाव से देखा करते थे। दैनिक
ट्रिब्यून में कहानी प्रतियोगिता के दूसरे वर्ष हमने
कुरूक्षेत्र में उन्हें व्याख्यान के लिए निमंत्रित किया
था । वे बड़ी खुशी से आये और उन्हें यह देखकर प्रसन्नता
हुई थी कि मूल्यहीनता के इस दौर में आज भी दैनिक ट्रिब्यून
साहित्य के प्रति अपनी आस्था बनाये हुए है, और उसने नये
लेखकों को मंच प्रदान किया है। इस बात की वे हाल तक तारीफ
करते रहे थे। यहाँ इस बात का उल्लेख आत्म प्रशस्ति के तौर
पर नहीं लेकिन उनके साहित्य पारखी होने की दृष्टि से किया
जा रहा है।
जिन दिनों चंड़ीगढ़ से दैनिक भास्कर की शुरूआत हुई,
कमलेश्वर उसके जयपुर संस्करण के मुख्य सम्पादक रहे थे।
उन्होंने भाई श्रवण गर्ग से कह कर मुझे तब बतौर सम्पादक
दैनिक ट्रिब्यून के उद्घाटन पर आमंत्रित किया था। लेकिन
मैं शहर के बाहर होने के कारण नहीं जा पाया । बाद में भी
कई ऐसे अवसर आये जब उन्होंने कई मंचों पर मेरे
‘सारिका’
से संम्बद्ध रहने का उल्लेख किया। अपनी पुस्तक आधारशिलाएँ
में भी इस बात का जिक्र किया । पिछले दिनों
‘नवनीत’
में मेरी कहानी छपने के बाद उनसे फोन पर बात हुई थी। वे
बहुत खुश थे। दिल्ली जाने पर मुलाकात की बात भी तय हुई थी
। लेकिन लिखा कुछ और ही था ।
उस दिन उनके दिवंगत होने की सूचना पाकर उनसे न मिलने का
मलाल ही रह गया । कमलेश्वर इस दुनिया में अब भले न हों,
उनका रचनाकार अमर रहेगा । लेकिन एक बात सदा सालती रहेगी ।
पिछले कुछ दिनों से अपनी स्वास्थ्य से जोखिम लेकर जिस तरह
कमलेश्वर देशाटन करते हुए जितने सक्रिय बने रहे थे, वह कुछ
डर पैदा करता था । हुआ भी कुछ ऐसा ही
‘बड़े
शौक से सुन रहा था जमाना, हमीं सो गये दास्तां कहते कहते’
की तरह कमलेश्वर अनायास विदा हो गये । उन्होंने कहा था कि
लेखक की शाम कभी नहीं होती । यह बात कुछ हद तक सही भी है ।
कमलेश्वर आज चले क्यों न गये हों, उनकी साहित्यिक विरासत
की चमक सदा बनी रहेगी ।
0विजय सहगल
