अनेक खूबियों के धनी थे कमलेश्वर
मिर्जा
ग़ालिब ने अपनी अद्भुत शायरी का परिचय अपने इस शेर द्वारा
दिया था-
'हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे-
कहते हैं कि ग़लिब का है अन्दाज़-ए-बयां और ।’
बेशक इस दुनिया में तमाम शायर पैदा हुए
और चले भी गए,
परन्तु मिर्ज़ा ग़ालिब ने फ़ारसी व उर्दू शायरी को जिस नई
मंज़िल पर पहुँचाया उसकी दूसरी मिसाल नहीं मिलती। ठीक उसी
तरह भारत मे अनेक साहित्यकारों व लेखकों
ने जन्म लिया, परन्तु उनमें कुछ ही लेखक ऐसे हैं जो अपनी
बेबाक लेखनी, स्पष्टवादिता तथा निष्पक्ष लेखन की बदौलत आम
आदमी के दिलों में अपनी जगह बना पाने में सफल हुए ।
निश्चित रूप से कमलेश्वर ऐसे लेखकों में सर्वोपरि थे। अपनी
तीन दशक के संबंध के दौरान मुझे अनेक बार कमलेश्वर जी के सम्पर्क में
रहने का अवसर मिला । यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे उन जैसे
महान लेखक का आशीर्वाद तथा संरक्षण प्राप्त था। वे हमेशा
मेरी हौसला अफ़जाई किया करते थे।
मुझे याद है वह दिन जब 8 अक्टूबर 2000 को कमलेश्वर जी मेरे
निमंत्रण पर पहली और अन्तिम बार अम्बाला शहर में आयोजित
अखिल भारतीय सर्वधर्म सम्मेलन में पधारे थे
!
उनके इस कार्यक्रम में शरीक होने की ख़बर से कमलेश्वर के
प्रेमियों में बड़ा उत्साह हो था ही साथ-साथ इस बात का डर
भी था कि कहीं वे अम्बाला आने का कार्यक्रम रद्द न कर दें
। क्योंकि उनके बारे में आम धारणा यही थी कि वे बड़े ही
‘मूड़ी’
स्वभाव के व्यक्ति हैं । उन्हें अपने किसी भी कार्यक्रम को
कभी भी रद्द कर देने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती। वही
हुआ, 6 अक्टूबर को मुझे कोरियर सेवा के माध्यम से कमलेश्वर
जी का एक लम्बा-सा हस्तलिखित पत्र प्राप्त हुआ जिसमें
उन्होंने कार्यक्रम में शिरकत न कर पाने की बात लिखी थी।
उन्होंने लिखा था कि-
‘8
अक्तूबर को दिल्ली में मेरी मेडिकल जाँच होनी है जिसका समय
3 डाक्टरों ने मिलकर स्वयं निर्धारित किया है। अतः इन हालात
के तहत तुम्हारे कार्यक्रम में मेरा पहुँचना मुमकिन नहीं
होगा।’
इस पत्र को पाकर मैं बहुत मायूस हुआ। फ़ौरन कमलेश्वर जी से
फ़ोन पर मेरी काफी लम्बी बात हुई तथा मैंने उनसे उनके
पूर्व निर्धारित कार्यकक्रम के अनुसार 8 अक्टूबर को अम्बाला
पहुँचने का भरसक निवेदन किया । परन्तु उन्होंने अपने
स्वस्थ्य के दृष्टिगत मुझे यही समझाया कि 8 अक्टूबर के बाद
तुम जब कहोगे, मैं आ जाऊँगा । मेरे मित्र द्वारा बार-बार
आग्रह किए जाने पर कमलेश्वर जी ने कहा कि-‘क्या
आप चाहते हैं कि आपके कार्यक्रम के दौरान मैं मर जाऊ
?’
यह सुनकर मेरे मित्र ने भी कमलेश्वर जी को जवाब दिया कि-
‘एक
साहित्यकार के लिए इससे बढ़कर और हो भी क्या सकता है कि वह
अपने प्रशंसकों के बीच अपने प्राण त्यागे ।’
निःसंदेह कमलेश्वर जैसा ही महान व्यक्तित्व था जिसने उक्त
वाक्य की गहराई व उसकी मर्यादा की क़द्र की । कमलेश्वर जी
अगले दिन 8 अक्टूबर 2000 को अपने पूर्व निर्धारित
कार्यक्रम के अनुसार अम्बाला शहर पधारे तथा अपने बेबाक
विचारों से श्रोताओं को नवाज़ा ।
जब भी उनसे मेरी बातचीत होती थी मैं हमेशा उन्हें देश न
समाज से जुड़ी कई प्रमुख समस्याओं के प्रति अत्यन्त गंभीर,
चिंतित व दुखी पाता था। कश्मीर समस्या का समाधान न हो पाने
से वे काफ़ी दुखी थे। भारत-पाक विभाजन का दर्द हमेशा उनके
सीने में रहा । 6दिसम्बर 1992 को अयोध्या में हुए बाबरी
मस्जिद विध्वंस ने उन्हें बहुत दुख पहुँचाया । देश में
बढ़ती साम्प्रदायिकता तथा
कट्टरपंथी विचारधारा की गहरी होती
जड़ें हमेशा व्याकुल करती रहती थीं। भ्रष्ट्राचार तथा सरकारी
कार्यालयों सें पारदर्शिता का अभाव उन्हें बहुत कष्ट
पहुँचाता था । आडम्बर, दिखावा, औपचारिकता आदि उन्हें कतई
पसंद नहीं था। एक महान चिंतक, विचारक
साहित्यकार, पत्रकार, पटकथा-लेखक, समीक्षक, कथाकार,
प्रस्तोता (एंकर) और न जाने कितनी विशेषताओं के स्वामी
होने के साथ-साथ वे सादगी भरे जीवन की भी अभूतपूर्व मिसाल
थे।
उनका लेखन केवल पठन-पाठन पर आदारित नहीं होता था
बल्कि वे स्वयं संबंधित विषय की पूरी जानकारी लेने के लिए
उस क्षेत्र में जाते थे तथा पूरी गंभीरता, गहराई व
निष्पक्षता से मामले की जाँच पड़ताल किया करते थे। कश्मीर
समस्या पर उनके कई आलेख प्रकाशित हुए । इसके लिए उन्हें
कई बार वहाँ रहकर आये लोगों से मिलकर उनके विचारों को सुनना
पड़ा । इसी प्रकार वे अयोध्या भी गए । बाबरी मस्जिद विवाद
के संबंध में उन्होंने जी बुनियादी तथ्य खोजकर निकाला वह
केवल वहीं था जो आम भारतीय कल भी महसूस कर रहा था, आज भी
कर रहा है और आने वाले समय में भी उसका विश्वास यही रहेगा
कि मंदिर-मस्जिद मुद्दा एक राजनीतिक विवाद के सिवा और कुछ
नहीं । कमलेश्वर की अयोध्या यात्रा पर आधारित 1988 में
प्रकाशित एक पुस्तक
‘सुलगते
शहर का सफ़रनामा’
में तथ्यपूर्ण खोज करने के बाद इस मुद्दे को हवा देने वाले
हिन्दुओं व मुसलमानों से कई ऐसे प्रश्र पूछे गए हैं जिनका
कोई जबाब नहीं । शत्-शत् नमन है कमलेश्वर जैसे उस महान
लेखक को जिसने अपने तमाम साहित्य के द्वारा आम आदमी को
झकझोरने का सफल प्रयास किया है । जिसने सम्मानों व
अलंकारों की परवाह किए बिना उन्होंने अपनी साहित्यक
यात्रा को उस बुलंदी तक जारी रखा जिसके लिए शायर कहता है-
‘खुदी
को कर बुलन्द इतना कि हर तक़दीर से पहले’
खुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
?
भारतीय धर्म निरपेक्षता के इस सजग प्रहरी को धर्म
निरपेक्ष विचारधारा रखने वाले भारतीय समाज की ओर से
अक्षुपूरित श्रद्धांजलि व नमन ।
तनवीर जाफ़री
अम्बाला, हरियाणा
