रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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स्मरणः कमलेश्वर

कभी न खत्म होने वाली बेचैनी

भी ज्यादा दिन नहीं हुए जब निर्मल वर्मा गुजरे थे। उसके पहले भीष्म साहनी गए। और अब कमलेश्वर नहीं रहे। और भी कुछ नाम मसलन विद्यानिवास मिश्र, आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री इनके आगे-पीछे जाने वालों में याद दिए जा सकते हैं। कमलेश्वर  के जाने को मोटे तौर पर नई कहानी आंदोलन के एक दूसरे महत्वपूर्ण स्तंभ के ढहने की तरह देखा जा सकता है। इस आंदोलन की त्रयी का पहला स्तंभ मोहन राकेश के रूप में आज से लगभग चौंतीस साल पहले ढहा था। नई कहानी को एक व्यवस्थित आंदोलन का रूप देने और उसे इसी रूप में मनवाने में कमलेश्वर  का योगदान काफी मह्त्वपूर्ण था । इस सिलसिले में उनकी पुस्तक नई कहानी की भूमिका को अक्सर याद किया जाता है। भैरव प्रसाद गुप्त के बाद जब उन्होंने नई कहानीयाँ पत्रिका का संपादन संभाला तब इस आंदोलन को और गति मिली थी। अब यह बात अलग है कि नई कहानी के प्रमुख तीनों सूत्रधार-मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर में से किसी की भी कहानी को पहली नई कहानी होने का श्रेय न देकर डॉ. नामवरसिंह ने यह श्रेय निर्मल वर्मा की कहानी परिन्दे को दिया था।

 

        खैर, जिन लोगों को सिर्फ किसी एक भूमिका में याद नहीं किया जा सकता कमलेश्वर भी उन्हीं में से थे। एक कथाकार, संपादक, अनुवादक, पत्रकार, फिल्म लेखक, आंदोलनकर्मी वगैरह जैसी दसियों भूमिकाएँ थीं जिनमें कमलेश्वर याद किए जा सकते हैं। बेशक उनकी पहली और सबसे अहम् पहचान एक कथाकार की है। सैकड़ों कहानियाँ और लगभग एक दर्जन उपन्यास एक बड़ा कथा फलक बनाते हैं। राजा निरबंसिया, जार्ज पंचम की नाक, खोई हुई दिशाएँ, मांस का दरिया जैसी कहानियाँ और डाक बंगला, समुद्र में खोया हुआ आदमी, एक सड़क सत्तावन गलियाँ, कितने पाकिस्तान जैसे उपन्यास लगातर चर्चा के केंद्र रहे हैं। इन्हें शामिल किए बगैर पिछले पचास साल के हिन्दी कथा साहित्य का चित्र पूरा नहीं बन सकता। कितने पाकिस्तान जैसा उपन्यास सिर्फ इसीलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उसे साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया और कि वह एक रचनाकार की कभी न खत्म होने वाली सामाजिक, मानसिक सदियों लंबी बेचैनी को सामने लाती है बल्कि वह इसलिए भी मह्त्वपूर्ण है कि वह उपन्यास के उस पारंपरिक ढाँचे में गंभीर तोड़-भोड़ करता है जिसके लिए इधर का उपन्यास काफी बदनाम रहा है। शायद इसीलिए बहुत सारे आलोचक उसे उपन्यास तक मानने से इंकार करते हैं । नई कहानी त्रयी के मोहन राकेश अगर शहरी जीवन के लेखक थे तो कमलेश्वर कस्बाई जीवन के ! इस त्रयी के शेष दोनों लेखकों की तरह ही कमलेश्वर के कथा साहित्य का मूल केंद्र मध्यमवर्गीय जीवन रहा है। मोहन राकेश का मध्यम वर्ग अगर महानगर तक फैला हुआ है तो कमलेश्वर के यहाँ यह वर्ग मूलतः कस्बों और छोटे शहरों का है, कमोबेश राजेन्द्र यादव की ही तरह । निर्मल वर्मा के यहाँ वह बिलकुल अलग तरह से नज़र आता है।

 

        एक संपादक के रूप में कमलेश्वर की काफी ख्याति रही है। वैसे तो वे कई पत्रिकाओं से जुड़े, लेकिन नई कहानियाँ, सारिका और कथा-यात्रा जैसी पत्रिकाओं के जरिए उन्होंने हिन्दी कहानी को एक विशेष दिशा तो दी ही साथ ही कहानीकारों की पीढ़ियाँ तैयार की । एक संपादक के रूप में उन्होंने अपने लेखकों से निरंतर सीधा संपर्क बनाए रखा संपादक के रूप में नई काहनियाँ और सारिका के माध्यम से उन्होंने काफी काम किया इनके मुकाबले कथा-यात्रा और गंगा उतनी दीर्घजीवी नहीं हो सकीं । उल्लेखनीय है कि सारिका के जरिए ही उन्होंने समांतर कहानी आंदोलन भी शुरू किया था, जिसे लेकर उनकी काफी आलोचना भी हुई थी और जो नई कहानी आंदोलन की तरह सफल भी नहीं हो सका था। एक बात और, उनके संपादन में निकले गणिका आदि विशेषांक तो चर्चित हुए ही थे, इसके अलावा उन्होंने मराठी के दलित आंदोलन को पहली बार हिन्दी पाठकों के सामने लाने का काम किया था । बल्कि कहा जाना चाहिए कि हिन्दी में दलित लेखन की पीठिका तैयार करने में भी काफी महत्वपूर्ण योगदान किया था सारिका जैसी पत्रिका के ज़रिए कमलेश्वर यह करके दिखा पाए थे कि एक नितान्त व्यावसायिक पत्रिका को भी किस हद तक जन धर्मी बनाया जा सकता है। इस तरह की कोई पत्रिका अपनी सारी व्यावसायिक सीमाओं के बावजूद सिर्फ पत्रिका न रहकर एक आंदोलन भी हो सकती है ! कमलेश्वर का आंदोलन कर्मी रूप सारिका के ज़रिए भी सामने आया। एक रचनाकार किस हद तक एक एक्टिविस्ट भी हो सकता है इसका काफी कुछ पता कमलेश्वर के सारिका के दिनों में किए गए कामों को देखकर भी चलता है। उन दिनों वे एक लेखक, संपादक, फिल्म स्क्रिप्ट राइटर के साथ-साथ एक आंदोलन कर्मी के रूप में भी काफी सक्रिय थे।

 

        जाहिर है कि वे विवादों के केंद्र भी बने हुए थे। अपने इसी काम को उन्होंने विस्तार दिया था। मुंबई दूरदर्शन के परिक्रमा जैसे अपने कार्यक्रम से ! आज के सास-बहू मार्का कार्यक्रम के दर्शकों के लिए कल्पना कर पाना मुश्किल हो सकता है कि अपनी पूरी रचनात्मकता का निर्वाह करते हुए भी कोई कार्यक्रम कितनी दूर तक अपने आप को आम आदमी के पास ले जा सकता है।

 

        कमलेश्वर टीव्ही से काफी शुरू से जुड़े रहे । एक स्क्रिप्ट राइटर के अलावा कार्यक्रम प्रस्तोता और बाद में दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक जैसी भूमिकाएँ उन्होंने सफलतापूर्वक निभायी । दृश्य माध्यम की यही समझ उन्हें एक सफल फिल्म लेखक भी बना पाई । गुलजार (आँधी, मौसम) के अलावा सावन कुमार (सौतन), बीआर चोपड़ा (द बर्निग ट्रेन) जैसे कई निर्देशकों के लिए उन्होंने फिल्में लिखीं हिन्दी फिल्म उद्योग में लेखक का दर्जा सिर्फ एक मुँशी से उठाकर सम्मानित लेखक का बनाने का काम जिन कुछेक लोगों ने किया उसमें कमलेश्वर भी एक थे। पत्रिकाओं के संपादकियों (मेरा पन्ना-सारिका) के अलावा समाचार पत्रों में समय-समय पर लिखे जाने वाले उनके आलेखों ने एक बड़ा पाठक वर्ग तैयार किया। अपनी पक्षधरता और वैचारिक दृष्टि का निर्वाह उन्होंने हमेशा करने की कोशिश की चाहे फिर इसके लिए कतनी ही आलोचना का सामना करना पढ़ा हो !

 

        सरिका या अन्य पत्र-पत्रिकाओं के मालिक वर्ग से उनके विवाद और अंततः संपादन छोड़ देना इसके प्रमाण रहे हैं। बेशक इस सबको लेकर वे कई बार उग्र विवाद के भी शिकार हुए लेकिन इसकी उन्होंने परवाह नहीं की। उनके सामाजिक सरोकार उनके दूरदर्शन के लिए बनाए बंद फाइल, जलता सवाल जैसे वृत्तचित्रों के जरिए भी सामने आए कि कभी बांग्लादेश युद्ध और कश्मीर : रात के बाद जैसी पुस्तकों के जरिए आए थे इसी दौर में उनका वह विवादास्पद बयान भी आया था कि रंगीन दूरदर्शन देश की गरीबी दूर करने में सहायक होगा ! उन्होंने तीन खंड़ों में अपने जो संस्मरण लिखे हैं वे उनकी रचनात्मक सक्रियता के साथ-साथ एक लंबे दौर के घटनाक्रम को भी सामने लाता है। पिछले दिनों उन्होंने बताया था कि कितने पाकिस्तान के जैसा ही एक दूसरा उपन्यास वे लिख रहे हैं। बहरहाल, इतने सारे अलग-अलग मोर्चों पर कोई रचनाकार निरंतर कैसे सक्रिय रह सकता है इसकी एक मिसाल तो वे थे ही । दरअसल, वे एक कभी न खत्म होने वाली और निरंतर सक्रिय बनी रहने वाली रचनात्मक बेचैनी का पर्याय थे।(नई दुनिया से)

oप्रकाश कांत

 

 

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मनुष्य ईश्वर के साथ सघन और उदात्त संबंध नही बना पाया है - कमलेश्वर

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, संजीव ठाकुर, कामिनी, प्रगति

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