मैं और मेरा अपना कमलेश्वर
कहानी को नया स्वरुप देने
वाली तिकड़ी कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव
में से अब मोहन राकेश के साथ कमलेश्वर भी नहीं रहे ।
महान
साहित्यकार कमलेश्वर जी की जीवन-यात्रा बहुत ही अद्भुत
दुख-मुफ़लसी से
गुजरी है। प्रांरभिक जीवन में कमलेश्वर इलाहाबाद में रात को पोस्टर
बनाते और उसे जो
पारिश्रमिक के रूप में 5-6 रुपये मिलते उससे अपना जीवन-यापन करते
। ऐसे दुर्दिन उन्होंने झेला कि अपनी बिटिया का मुँह नहीं
देख सके । क्योंकि जाने के लिए रेल का किराया देने का राशि
उनके पास नही थी।
पर उन्होने हिम्मत
कभी नहीं हारी
। उनका
‘परिक्रमा’
कार्यक्रम बहुत ही लोकप्रिय हुआ फिर
‘सारिका’
मासिक का सम्पादन तो
अद्भुत था। उसमें कई नई स्तंभ चालू
किया । उन्होंने सभी भाषाओं की पहली-कहानी प्रकाशित किया ।
हिन्दी की पहली कहानी-मेरे द्वारा प्रस्तावित माधव राव
सप्रे की कहानी
‘एक
टोकरी भर मिट्टी'(माधव
राव सप्रे) पर उन्होंने छापकर सारिका में बहस चलाई
। उसमें बड़े-बड़े साहित्यकारों ने भाग लिया और एक टोकरी भर
मिट्टी को
हिंदी की पहला कहानी माना गया ।
आगे ग्रंथ के रुप राजपाल से पहली कहानी, नायक ग्रंथ
प्रकाशित किया
जो अप्रतिम है । अब वह उपलब्ध नहीं है
।
इसके समानान्तर
‘गर्दिश के
दिन’
में सभी लेखकों के गर्दिश के दिन की चर्चा सबने अपनी
अपनी बातें सच्चाई के साथ रखा और यह भी पुस्तक के रुप में
प्रकाशित हुई ।
मेरे और कमलेश्वर का साथ बहुत पुराना रहा
है। जीवंत और निरंतर चलने वाला
। जब भी मैं दिल्ली जाता 3-4
दिन कैसे कट जाते पता ही नहीं चलता
। एक और वे किसी को
इन्टव्यू दे रहे हैं तो साथ ही पर
‘डिक्टेशनन’
।
न जाने कितने और क्या-क्या
लिखा है उन्होंने । कितने
ही ग्रंथों का सम्पादन
। अपनी
जीवन यात्रा
के तीन भाग । उनके उपन्यास,
उनके कहानी संग्रह
। वाकई उनका स्वर्गारोहण हिन्दी जगत्
की महान क्षति है और आश्चर्य है कि कार्यक्रम में भाग लेकर
लौटते समय गये । कार
में चलते-चलते
“बड़े
गौर से सुन रहा था ज़माना तुम्हीं चल दिए कारवां कहते कहते।
oडॉ. देवी प्रसाद वर्मा
चौबे कॉलोनी, रायपुर
छत्तीसगढ़
