|
भारतेन्दु हरिश्चन्द और
‘निज
भाषा’
छत्तीसगढ़ी
आधुनिक
“हिन्दी”
के युगप्रवर्तक भारतेंदु बाबू हरिश्चचन्द्र ने सन् 1877 के
जून मास (ज्येष्ठ सम्वत 1934) में काशी की हिन्दीवर्धिनी सभा
द्वारा आयोजित “हिन्दी
की उन्नति”
विषय पर जो लिखित व्याख्यान पढ़ा वह पूर्णतः पद्यमय था । कुल
17 पदों वाला उनका वह व्याख्यान समस्त श्रोतावृंद मंत्रमुग्ध
हो सुन रहा था क्योंकि वह काव्यमय भाषण अत्यंत ओजस्वी,
उत्तेजक, झकझोर देने वाला, सारगर्भित था । उस ऐतिहासिक भाषण का
ही एक ह्रदयस्पर्शी
प्रख्यात पद है-
“निज
भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।”
इसकी व्याख्या की आवश्यकता नहीं क्योंकि यह अपने आप में अत्यंत
सहज-सुबोध है । विडंबना तो यह है कि उनके इस
सार्वकालिक, सार्वभौमिक व सर्वस्पर्शी शाश्वत सत्यार्थ को
संकुचित समझ वालों ने मात्र
“हिन्दी
भाषा”
के संदर्भ में ही सीमित कर दिया है । उनके संपूर्ण व्याख्यान
की सटीक व्याख्या करने पर सहज समझ में आता है कि उनके
“निज
भाषा”
कहने का अर्थ संसार के सभी भाषाओं पर लागू होता है केवल
“हिन्दी”
पर ही नहीं । “निज
भाषा”
यानी “मातृभाषा”।
जो अपनी मातृभाषा से कट जाता है, अथवा अपनी मातृभाषा की
अवहेलना करता है वह हीनग्रंथि से ग्रस्त हो जाता है।
आत्मिवश्वास-शून्य हो जाता है। ऐसा व्यक्ति या समाज उन्नति से
कोसों दूर रहने को मजृबूर रहता है। प्रत्यक्ष प्रमाण है
छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्र जो आजादी के 58 वर्ष बीत जाने के
बावजूद पिछड़े के पिछड़े ही रह गये है। अपनी अखिल भारतीय
दृष्टि रखने के कारण “भारतेन्दु”
कहलाने वाले बाबू हरिश्चद्र ने उसी भाषण में कहा था-
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन ।
पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।
हीनता-बोध के बोझ तले दबे छत्तीसगढ़िया सार्वजनिक रुप से अपनी
मातृभाषा को ही नकारने लगता है। किसी भी पाठशाला में अथवा
दफ्तर में चले जाइये और उसके उस आवेदन पत्र को परखिये जिसमें
“मातृभाषा”
लिखने का खाना बना हो । घर में
“छत्तीसगढ़ी”
बोलता है, सारा व्यवहार अपने आसपास छत्तीसगढ़ी में करता है,
अपनी माँ से प्रथम शब्द ही छत्तीसगढ़ी का सुना-सीखा फिर भी
अपनी मातृभाषा
को ही नकारता है, बदल देता है। किसी भी
छत्तीसगढ़िया के लिए जो जन्म से ही छत्तीसगढ़ी बोलता है उसके
लिये “हिन्दी”
संपर्क भाषा, शिक्षा का माध्यम भाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा हो
सकती है किंतु “मातृभाषा”
कैसे हो सकती है ?
परंतु यहाँ इस प्रदेश में यह कडुवा सच कहीं भी साबित किया जा
सकता है। यहीं, इसी छत्तीसगढ़ी में विभिन्न भाषा-भाषी ( मराठी,
गुजराती, सिंधी, बंगाली, उड़िया, पंजाबी आदि) उपनी-अपनी
मातृभाषा सगर्व घोषित करते हैं छिपाते नहीं पर छत्तीसगढ़ी-भाषा
छिपा जाता है। रहा हीन का हीन
!
निज-भाषा याने मातृभाषा का महत्व बाताते हुए बाबू हरिश्चंद्र
कहते हैं कि जैसे सांचे में जो भी डाला जाता हैं वह वैसा
ही बनता है, बाद में बदलता नहीं वैसे ही बचपन में जो शिक्षा
संस्कार शिशु प्राप्त करता है उसे वह जीवन भर भूलता नहीं।
क्योंकि-
सो सिसु-शिक्षा मातु-बस, जो करं पुत्रहिं प्यार।
खान-पान खेलन समय, सकत सिखय विचार।।
लाल पुत्र करि चूमि मुख, विविध प्रकार खेलाइ।
माता सब कछु पुत्र को, सहजहि सकत दिखाइ।।
भारतेन्दु जी के अनुसार जो माता अपने शिशु को खेलते-खिलाते,
सुलाते, सेनेह करते सहज ही प्रथम सांसारिक शिक्षा सिखा देती है
वह तो अपनी मातृभाषा जानती नहीं-
“तासों
निंज भाषा
अहै, सबही को सिरमौर।”
इसीलिये यह सच है कि-
पढ़ो लिखो
कोउ लाख बिध, भाषा बहुत प्रकार
पै जबही
कछु सोचिहो निज भाषा अनुसार ।।
सुत सों, तिय सों, मीत सों, भृत्यन सों दिन रात।
जो भाषा मधि कीजिए निज मन की बहु बात।।
मातृभाषा की इसी महिमा को ध्यान में रखकर सारे शिक्षा आयोगों
ने, सभी न्यायालयीन निर्णयों ने एकमतेन मंतव्य प्रकट किया है
कि बच्चों की प्राथमिक शिक्षा उनकी अपनी मातृभाषा में ही दी
जानी चाहिए। क्योंकि सही व्यक्तित्व विकास मातृभाषा के माध्यम
से ही संभव है. सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं विश्वाविद्यालय
अनुदान आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर यशपाल की अध्यक्षता में
“राष्ट्रीय
अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद”
(एनसीईआरटी) ने साष्ट्रीय संचालन समिति गठित की है। उसके
द्वारा तैयार किये गये मसौदे के अनुसार स्कूली पाठ्यक्रम में
आमूल-चूल परिवर्तन की घोषणा करते हुए प्रो. यशपाल ने गत जून
2006 को पत्रकारों को बताया कि
“अब
शिक्षा में आजादी की लड़ाई की शुरुआत हो रही है। शुरु में घर की
भाषा में ही पढ़ाई होनी चाहिए । भाषाविदों का कहना है कि एक
भाषा सीखने के बाद दूसरी भाषा सीखना अच्छा होता है ।”
पर छत्तीसगढ़ी का दुर्भाग्य यह है कि अलग राज्य दर्जा पा जाने
के बावजूद भी व्यक्तित्व विकास हेतु शिक्षा की इस अत्यावश्यक
मूलभूत अवधारणा से अब तक अछूता है यह प्रदेश।
“छत्तीसगढ़ी
तो भाषा नहीं, बोली है”
कह- कर जिस छत्तीसगढ़ी में वर्षों पूर्व
“मातृभाषा”
के प्रति योजना-बद्ध ढंग से हीनभावना का भरपूर संचार किया गया
हो वहाँ के बच्चों को उनकी मातृभाषा
“छत्तीसगढ़ी”
में प्राथमिक शिक्षा देकर उनके व्यक्तित्व विकास की जेहमत कोई
क्यों उठाने चला ?
घोर कुतर्क दिया जाता है कि छत्तीसगढ़ी में अनेक खामियाँ
है-व्याकरण की कमी है, शब्द भंडार की कमी है, साहित्य की कमी
है आदि । भारतेन्तु बाबू के ज़माने में भी इसी प्रकार के कई
कुतर्क देकर अपनी निज भाषा के प्रति उदासीन रहते थे, कई तो
उसकी अवहेलना करने से भी बाज नहीं आते थे। ऐसी हीन मानसिकता के
भारतीयों को सीख देते हुए भारतेन्दु जी उसी अपने थभाषण में
कहते हैं कि अनेक कमियाँ होने के बावजूद अंगरेज़ अपनी मातृभाषा
अंग्रेजी की उन्नति कर कैसे उन्नत हुए, उसे देखें-
लखहूं न अंगरेजन करी, उन्नति भाषा माहि। सब विद्या के ग्रंथ,
अंगरेजिन मॉह लखाहिं।।
सब्द बहुत परदेएश के, उच्चार हु न ठीक । लिखत पठि जात कछु, सब
बिधि परम अलीक।।
पै निज भाषा जानि तेहि, तजत नहिं अंगरेज। दिन दिन याही को करत,
उन्नति पै अति तेज।।
कहां जौन को गुन लह्मो लियो जहां सो तौन। ताहीं सो आग-रेज अब
सब विद्या के भौन।।
तासों सबही भांति है इनकी उन्नति आज । एकहि भाषा में अहै जिनकी
सकल समाज।
अपनी मातृभाषा “छत्तीसगढ़ी”
की ऐसी उन्नति करने के बजाय उसकी कमियों का रोना रोते हुए
योजनापूर्वक उसे राज- भाषा बनने से रोका गया है। तीस मार्च
2001 को सर्व सम्मति से छत्तीसगढ़ी विधानसभा ने
“छत्तीसगढ़ी”
को संविधान की 8वीं सूची में शामिल कर उसे राजभाषा बनाये जाने
बाबत् प्रस्ताव पारित किये जाने के बावजूद नहीं बनाया गया।
उसमें कमियाँ गिनाने वालों को जवाब देते हुए प्रसिद्ध
भाषा-शास्त्री डॉ. रमेशचंद्र मेहरोत्रा ने लिखा-
“मणिपुरी
आदि कैसे राज़भाषाएं बन गई
?
जिन भाषाओं के लिए भारत में पृथक राज्य नहीं है, वे भी
राजभाषाकएं बन गई - सस्कृत, उर्दू, सिंधी (31 वें संशोधन),
नेपाली(71 वें संशोधन से),जिनके राज्य का क्षेत्र-फल बहुत कम
है, वे भी राजभाषाएं बन गई, कोंकणी (गोवा), मणिपुरी (मणिपुरी),
जिन भाषाओं को मातृभाषा के रुप में प्रयुक्त करने वालों की
संख्या हमारे देश में
खूब कम है वे भी राजभाषाएं बन गई और तो और उर्दू भी हमारे देश
की राजभाषा है, जो हिन्दी से बेहद कम, अलग है- उतनी भी अलग
नहीं है, जितनी उदाहरण के तौर पर छत्तीसगढ़ी के कोई दो रूप परस्पर अलग है।”
अपनी निज भाषा (मातृभाषा) के प्रति ऐसी
अक्षम्य उदासीनता बरतने वाले देशबांधवों का आव्हान करते हुए भारतेन्दु ने कहा-
छोड़हुं स्वारथ बात सब, उठहु एक चित होय।
मिलहु कमर कसि भ्रातजन, पावहु सुख दुख खोय।।
या दुख सों मरनो, भलो, घिग जीवन बिन मान।
तासों सब मिली अब करहु,
बेगहि ज्ञान विधान।।
निज भाषा, निज धरम, निज मान करम ब्यौहार।
सबै बढ़ाबहु बेग मिलि, कहत पुकार-पुकार।।
करहु विलंब न भ्रात अब, उठहु मिटावहु सूल।
निज भाषा उन्नति करहु, प्रथम जो सब को मूल।।
ऐसे थे हमारे, भारतमाता के भालचंद्र भारतेन्दु हरिश्चंद्र जो
“निज
भाषा”
छत्तीसगढ़ी के लिये भी उतने ही पूजनीय व प्रांसगिक है जितने
राष्ट्र-राजभाषा हिन्दी के लिये ।
oनंदकिशोर शुक्ल
(स्वतंत्र पत्रकार)
बिलासपुर
|