रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

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समकालीन कविता

डॉ. नथमल शर्मा की दो कविताएं

नयन के काजल

याद में

भीगे हुए हैं

नयन के काजल

 

बिन तुम्हारे

आज सुनी

भाल की बिन्दिया

उड़ गई है

अब न जाने

रात की निंदिया

याद में

सूने हुए हैं

गगन के बादल

 

लग रही पूनम भी

मावस रात-

के जैसी

बन गई विकराल

देखो

ये निशा कैसी

याद में

डूबा हुआ है

ये मेरा आँचल

 

व्यर्थ जैसी

लग रही

सारी ऋचाएं भी

और निष्फल

हो रही

सारी कथायें भी

मच गया है

अब हृदय में

एक नई हलचल

 

ज़िंदगी की शाम

एक पल में

ढल गई अब

ज़िंदगी की शाम

 

हम न जाने

सैकड़ों पग

चल गए

एक उनकी आस में

अनगिनत तारे

ढल गए

पर प्रतीक्षा

आज तक की

सब हुई

निष्काम

 

चाहते थे बना लें हम

एक महल

जगमगाता रहे वो

आकाश में

प्रतिपल

लग गया पर

आज कैसा

हर गति को

विराम

 

बुन रहे थे स्वप्न

हम तो

संग-संग

रंग गई थी

ज़िंदगी भी

अपने रंग

भटकता ही रहा हूँ

पर मिल सका न

मुकाम

***

oडॉ. नथमल झँवर

झँवर निवास

मेन रोड़, सिमगा, रायपुर

छत्तीसगढ़ - 493191

 

              

 

आपकी प्रतिक्रिया

ज़िंदगियों के बीच से व़क्त का दरिया किनारे काटता हुआ निकल जाता है- कमलेश्वर

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