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चींटी
चीटियाँ इतिहास में
नहीं होती :
उनकी कतारें उसके
भूगोल के आरपार फैल जाती हैं;
किसी चींटी अपनी नन्हीं सी
काया पर
इतिहास की धूल पड़ने देती है
।
चींटियाँ सच की भी
चिंता नहीं करतीं :
सच भी अपने व्यास में
रेंग रही चींटी को शामिल करना
ज़रूरी नहीं समझता ।
चींटी का समय लंबा
न होता होगा :
जितना
होता है उसमें वह उस समय से परेशान होती है
इसका कोई ज्ञात प्रमाण नहीं
है ।
इतिहास, सच और समय से परे और
उनके द्वारा अलक्षित
चींटी का जीवन फिर भी जीवन है :
जिजीविषा से भरा-पूरा,
सिवाय इसके कि चींटी कभी नहीं
गिड़गिड़ाती
कि उसे कोई देखता नहीं, दर्ज
नहीं करता
या कि अपने में शामिल नहीं
करता ।
कवि की मुश्किल यह नहीं कि वह
चींटी क्यों नहीं है
बल्कि यह कि शायद वह है,
लेकिन न लोग उसे रहने देते
हैं,
न इतिहास, सच या समय ।
oअशोक
बाजपेयी
नई
दिल्ली

नीरव पथ, सूर्य रथ
एक नीरव पथ
!
सोचती हैं ठिठककर
इस पर दिशाएँ
अब यहाँ से कहाँ जाएँ
या यहीं पर ठहर जाएँ -
फूल-पत्तों की महक से
हो रही हैं श्लथ
!
एक नीरव पथ ।
उड़ रही हैं चार चिड़ियाँ
और बादल घने
वृक्ष छाया-भार से ज्यों
झुक रहे अपने ।
झर रहे हैं डाल से
कुछ पर्ण, मंथर, मौन -
हवा कहती कुछ उझककर
आ रहा यह कौन
?
और बढ़ता आ रहा है
सूर्य का वह रथ
गंध-स्वर-ध्वनि से
रहा है, पुनः सब
कुछ मथ !
एक नीरव पथ
!
oप्रयाग शुक्ल
37, बी, डीडीए फ्लैट्स,
फेज़ 1, मस्जिद मोठ,
नई दिल्ली, 110048

सिलसिला
मलबे के भीतर से
आ रही हैं आवाज़ें
'मुझे
बचाओ !'
मैं उन्हें बचाता हूँ
और खुद मलबे में फँस जाता हूँ
अब मैं चिल्लाता हूँ
'मुझे
बचाओ !'
वे मुझे बचाते हैं
और खद मलबे में फँस जाते हैं
oविमल
कुमार
यूनीवार्ता, 9 रफी मार्ग
नई दिल्ली

कूबड़
ऊँट से अगर पूछा जाता
कूबड़ के बारे में तो
वह वही कहता जो पंचतंत्र में
मोर ने कहा अपने पाँव के बारे में
सबसे बेढब और बदसूरत
ऊँट अपने दीगर अंगो के बारे में
क्या सोचता है
जाहिर नहीं किया उसने
यही कूबड़ संकट के दिनों में
आश्वस्त करती उसे
अभी बचा है बहुत कुछ
इस सांय-सांय सन्नाटे
रेत के समंदर के बाद भी
उस हरियाली उस पेड़ की छाया
दाने-दुनके तक तो वह है ही साथ
फिर भी ऊँट से पूछा जाता
तो वह वही कहता
जो कहा मोर ने ।
oप्रताव
राव कदम
11, शकुन नगर, प्रोफ़ेसर्स कॉलोनी, खंडवा
मध्यप्रदेश 450001

कौन किसको सम्भाले
आसां नहीं होता टूटे हुए हाथों से,
थामना ज़िन्दगी को,
पर यहाँ तो हर कोई टूटा हुआ है|
हर दिल ही टूटा हुआ है,
कौन किसको सम्भाले?
सभी खड़े हैं ,
बैसाखियों के सहारे।
o
मंजु महिमा
राजस्थान
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