इला प्रसाद की कविताएं
( इन दिनों लिखी जा रही अधिकांश कविताएं वादग्रस्त हैं ।
आज लगभग हिंदी कविता और कवि वादाचार के शिकार हैं । स्वयं
समीक्षा भी वादग्रस्तता की गिरफ़्त में है । पाठक समकालीन
कविता के नाम पर मुँह सिकोड़ने सा लगा है । निहायत
शुष्क गद्य की पंक्तियों को पद्य का शिल्प ओढ़ाकर उसे
कविता बनायी
जा रही है। लिंग, जाति, वर्ग या आर्थिक आधार पर कविता के
नये प्रतिमान गढ़े जा रहे हैं । यह कि महिला लिखे तो महिला
लेखन, सवर्ण लिखे तो सवर्ण लेखन और अंत्यज
लिखे तो दलित लेखन । यानी कि कविता के बहाने पाठक और
प्रकारांतर से समाज को बताया जा रहा है कि साहित्य या
कविता चाहे जो कुछ भी है पर रसात्मक संवाद नहीं है। ऐसे
में कविता को वाग्विलास कहा जाय तो कोई बुराई नहीं । ऐसे
दौर में प्रवासी ज़मीन से जब इला की कविताएं पढ़ने को
मिलती हैं तो लगता है - कवियों की भारतीय दुनिया भले ही
कृष्णपक्ष की ओर धसकती-ढ़हती चली जा रही हो भारतीय कवियों
की प्रवासी दुनिया में शुक्लपक्ष वाले अंजोर की तमाम
संभावनाएं अभी बाक़ी हैं ।
इला की कविता भारतीय संवेग की कविता है । वहाँ एक
महिला बार-बार अपने दुखड़ों को लेकर इसलिए नहीं आ रही है
कि उसे सर्वांग मुक्ति की आकांक्षा है । वह इसलिए भी अपनी
उपस्थिति को पुरूष से पृथक पंक्तियों में देखना चाहती
है क्योंकि वह सहस्त्राब्दियों से क्रंदित हैं ।
यह भाव इसलिए इला
जी की कविता में सदैव गतिमान है क्योंकि वह प्रकृति और
पुरूष के मध्य एक समान्तर रेखा की यात्रा पर विश्वास रखती
है । वहाँ एकांगी जागरण का आग्रह नहीं है ।
दैहिक
वृत्तियों को लेकर इधर जिस तरह स्त्रीवाद हिंदी की
उत्तरआधुनिक कविताओं में उभर रहा है वह कहीं न कहीं पुरूष
निषेध कपोलकल्पित समाज की थोथी चीत्कार है । उसमें आयातित
फैशन की फूहड़ जिद्दी भी है । इला इससे जाहिर तौर पर बचती
हैं । वहाँ शाश्वत जीवन मूल्यों के प्रति आकर्षण और आस्था
अब तक नहीं घटी है । इला की कविता निष्कलुष मन की कविता है
। वहाँ तथाकथित विकसित नारी की प्रतिद्वंद्विता का
हिंसक और वीभत्स राग नहीं है । वहाँ तन पर मन हावी है ।
ऐसा मन जहाँ पुरूष और प्रकृति के परस्पर विश्वास के साथ
निजी अस्मिता बरकरार है । अपनी अस्मिता की
अहिंसक लड़ाई में शामिल इला की
कविता को इसलिए मात्र स्त्री लेखन के खांचे में रखकर नहीं
देखा जा सकता क्योंकि वहाँ उत्तर से दक्षिण तक नारी के
विभिन्न रूपों-अवस्थाओं का द्वंद्व गूँजता है और
इसलिए भी नहीं कि वह एक
स्त्री द्वारा रची गई कविता है। जैसा कि परमानंद
श्रीवास्तव भी कहते हैं -
"इला प्रसाद की
कविताएं (शीघ्र प्रकाश्य कविता संग्रह-
'
धूप का
टूकड़ा'
की भूमिका में) हमारे समय के स्त्री विमर्श में कुछ नया
जोड़ती हैं और फिर भी स्त्रीवाद या स्त्री की मिथ्या
मुक्ति की अवधारणा से इनकार करती हैं।"
इन सबके बावजूद उनके
कथनों में विश्वास ठोस और बैलौस है । अपनी कविता - मुट्ठी
भर सपने - में वह कहती हैं - मेरे मुट्ठी भर सपनों को
/
हर हाल में / हाशिए पर नहीं
/ ज़िंदगी की किताब के/
बीच में होना है । या फिर - मेरा एकांत - कविता में - मेरी
मुट्टी में आसमान हो/
और पैर
ज़मीन पर रहने दे । यहाँ
'ज़मीन'
शब्द में निहितार्थ
साधारण
नहीं है । वह वर्तमान दौर के
तमाम दुष्परिणामी अभिप्साओं से बचे रहने का एक प्रार्थना
भी है ।
इला की कविताओं का सबसे रोचक पहलु उसका
शिल्पगत चरित्र है जहाँ वे बड़ी बारीकी से अपने आसपास की
बारीक से बारीक चीजों से बिम्ब गढ़ती हैं जो पारंपरिक
मानसिकता से नहीं अपितु नये ज़माने की चेतनात्मक बुद्धि से
परिपक्व बन पड़े हैं । कविता में गणित, अगरबत्ती, कपास,
सिक्के आदि को लेकर जिस तरह कविता की भाषा गढ़ी गयी है वह
इसका प्रमाण है । गंभीर पाठक कहीं-कहीं शब्द-स्फीति से
बचने की अपेक्षा यदि कवि से करें तो यह ज़्यादती या
अवांछित नहीं होगा क्योकि तब वहाँ रसात्मकता और निखर उठेगी
। कविता में त्यागने योग्य कारक-चिन्ह छांदसिकता को बाधित
करते हैं । इला के यहाँ कविता का असली मंतव्य यूं तो
सीधे-सीधे खुलना लगता है पर कई बार कविता में कुछ गोपन की
आकांक्षा भी की जाती है जो कविता को बहुआयामी अर्थ
बगराने के लिए
आवश्यक भी होता है और शायद यह भी कविता का सौंदर्य होता है
। यह शौकिया तौर पर लिखने वालों से नहीं लेकिन इला जैसे
कटिबद्ध कवि के यहाँ हो जाय तो उनकी कविताओं की उम्र कहीं
अधिक हो सकती हैं । तब भी, जब कविता को कोई स्वान्तः सुखाय
कहे और तब भी, जब हम कविता को उसके सरोकारों से जोड़कर ही
देखने पर विश्वास करते हैं जबकि आज के प्रौद्योगिकी ग्रस्त
समय में यह और भी आवश्यक
हो चला है - कि मनुष्य का मन काठ सी सूख
ना जाय । कि संवेदना पोखर जल सा भाप बन कर उड़ न जाय।
निजी मंतव्य के बहाने कुछ कहूँ तो इला की लगभग कविताएं
संबोधन या कथोपकथन में हैं । भविष्य में शिल्प की वेरायटी
को लेकर उन्हें सोचना होगा । क्योंकि शैली ही व्यक्तित्व
है जिसे पढ़ने से कवि का पृथक चेहरा पूरी भीड़ में साफ-साफ
झिलमिलाने लगता है । कविताओं से प्रस्फुटित होती किरण
मात्र से उसके कवि को पहचान लिये जाने की उम्मीद तो एक
सार्थक पाठक कर ही सकता है। प्रस्तुत है उनकी दिल्ली से
यथाशीघ्र प्रकाशित होने वाली कविता संगह की कुछ कविताएं ।
हम राँची विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर एवं
विभागाध्यक्ष(हिंदी), डॉ. दिनेश्वर प्रसाद ( इला जी के
पिता) के प्रति भी आभार प्रकट करना चाहते हैं जिन्होंने
उनकी कविताएं हमें उपलब्ध करायीं । हम पाठकों के पत्रों का
इंतजार करेंगे
- संपादक )
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लड़कियों से
मत रहो
घर के अंदर
सिर्फ़ इसलिए
कि सड़क पर ख़तरे बहुत हैं
चारदीवारियाँ निश्चित करने लगें जब
तुम्हारे व्यक्तित्व की परिभाषाएँ
तो डरो
खो जायेगी तुम्हारी पहचान
अँधेरे में
तुम्हारी क्षमताओं का विस्तार बाधित होगा
डरो
सड़क पर आने से मत डरो
मत डरो कि वहाँ
कोई छत नहीं है सिर पर
तुमने क्या महसूसा नहीं अब तक
कि अपराध और अँधेरे का गणित
एक होता है ?
और अँधेरा घर के अंदर भी
कुछ कम नहीं
डरना ही है तो अँधेरे से डरो
घर के अंदर रहकर
घर का अँधेरा
बनने से डरो
◌◌◌
अस्वीकृति
मैं तलछट सी निकालकर
फेंक दी गई हूँ
किनारे पर
लहरों को मेरा
साथ बहना
रास नहीं आया
मैं न शंख थी
न सीपी
कि चुन ली गई होती
किन्ही उत्सुक निगाहों से
रेत थी
रेत सी रौंदी गई
काल के क्रूर हाथों से
◌◌◌
पत्ते
वक़्त की शाखों से
गिरते हैं पत्ते
दिनों के
आज, कल, परसों
हर पत्ते के साथ ही
मुरझाता जाता है मन
शाखें नहीं बदलती
नहीं बदलते सपने
कुम्हलाता है मन
इन टहनियों के सूखने
और नयी टहनियों के पनपने तक
गिनने हैं पत्ते
गुजारने हैं दिन
◌◌◌
शुरूआत
जब भी सुबह शुरूआत हुई
अँधेरे में हुई
अँधेरे से उजाले तक पहुँची
फिर वापस अँधेरे में लौटकर
गुम हो गई
फिर थके-हारों पैरों को सहलाया
कतरा-कतरा साहस जुटाया
कदम बढ़ाए.....
कि एक और शुरूआत तो
करनी ही होगी
क्या पता इस बार
मेरे हिस्से का सूरज
मेरी पकड़ में आ जाय
अँधेरे का यह सफ़र
निर्णायक हो जाय
◌◌◌
कपास
आसमान की नीली चादर पर
बादलों की कपास धुनकर
किसने ढेरियाँ लगाई हैं ?
मैंने आँखों ही आँखों में
माप लिया पूरा आकाश
रूई के गोले उड़ते थे
यत्र-तत्र-सर्वत्र
नयनाभिराम था दृश्य
मैं सपनों के सिक्के लिए
बैठी रही देर तक
बटोरने को बेचैन
बादलों की कपास
झोली भर
लेकिन कोई रास्ता
जो आसमान को खुलता हो
नज़र नहीं आया........
◌◌◌
द्वीप
आस्था की नदी में
विश्वास का द्वीप था
उसी द्वीप पर तो मैं
चुनौती देती निगाहों को
निरस्त करती
अकेली खड़ी थी
◌◌◌
इंधन
यादों के उपलों में
अब एक भी कच्चा उपला नहीं
जो जले देर तक
और धुआँ देता रहे
कि आकांक्षाओं की नाक में पानी
और आँखों में जलन हो
गले में ख़राश
और थोड़ी देर के लिए ही सही
वे खामोश हो जाएं
वक़्त की आग ने
सब जलाकर राख कर दिया
अब नया इंधन जुटाना ही पड़ेगा
ज़िंदगी के लिए
◌◌◌
अभिलाषा
मैं सप्त सुरों में गाऊँ
एक सुर आँखों से बहे
आकुल मन की व्यथा कहे
आँखों में उतर जाए
एक सुर अधरों से झरे
तरल शीतल सुधा-धार
कानों में अमृत भरे
एक सुर हाथ रचें
कर्मों के तार बजें
गूँजे संसार
मन की भाषा मन कहे
मनों को दुलराता रहे
अनाहत-रव बजे
स्पंदित हों प्राण
सिर्फ़ बैखरी नहीं
मध्यमा और पश्यंती की
वाणी भी गूँजे
पूरा हो सुर-संसार
◌◌◌
नदी
तुम तो ख़ुद ही हो नदी;
शांत समभाव से बहती हुई
कहीं शब्द नहीं कोई
केवल गति, केवल गति
◌◌◌
अगरबत्ती
अंदर की आँच
अधिक तो नहीं थी
बस एक जलती हुई अगरबत्ती थी
जो धीमे-धीमें सुलगती रही
अलक्षित
और एक दुनिया अंदर ही अंदर
जल कर राख हो गयी
अपने ही अंदर की आग से
अगरबत्ती की राख से
फिर से उठी मैं
अगरबत्ती बन कर
और फिर से तपने लगी
◌◌◌
O
इला प्रसाद
12934, मेडो रन,
ह्यूस्टन,
टेक्सास, यू.एस.ए
