अशोक कुमार वशिष्ठ की पाँच कविताएँ
मन अब मिट जा
चल रे मन,
उस जगह रहें जिस,
जगह पे वो रहता है,
चल रे मन,
उस जगह बसें जिस,
जगह पे वो बसता है।
चल रे मन,
उससे खेलें जो,
सबसे खेल रहा है,
चल रे मन,
उसको झेलें जो,
सबको झेल रहा है।
चल रे मन,
अब वो गाएं जो,
वो हरपल गाता है,
चल रे मन,
कुछ ऐसा करें कि,
जो उसको भाता है।
चल रे मन,
उसमें खिल जाएं,
जो सबमें खिलता है,
चल रे मन,
उसमें मिल जाएं,
जो सबमें मिलता है।
चल रे मन,
उस संग घूमें जो,
सर्वत्र घूम रहा है,
चल रे मन,
उस संग झूमें जो,
सर्वत्र झूम रहा है।
चल रे मन,
ऐसे हो जाएं,
जैसे वो कहता है,
चल रे मन,
ऐसे हो जाएं,
जैसे वो दिखता है।
चल रे मन,
अब लुट जाना है,
उसमें खो जाना है,
चल रे मन,
अब मिट जाना है,
वो ही हो जाना
है।

मुझको जनम मरण में भर लो
मेरे प्यार को,
प्यार से भर दो,
मेरा इज़हार,
इज़हार से भर दो।
मेरा इकरार,
इकरार से भर दो,
मेरी दरकार,
दरकार से भर दो।
मेरी शान को,
शान से भर दो,
मेरे मान को,
मान से भर दो।
मेरे प्राण को,
प्राण से भर दो,
मेरी जान को,
जान से भर दो।
मेरे तनको,
तनसे भर दो,
मेरे मनको,
मनसे भर दो।
मेरी चाह को,
चाह से भर दो,
मेरी रूह को,
रूह से भर दो।
मुझको हर,
तडपन में भर लो,
मुझको हर,
धडक़न में भर लो।
मुझको तुम,
जीवन में भर लो,
मुझको जनम,
मरण में भर लो।

सुंदर शिव की सृष्टि सुंदर
मैं भी सुंदर,
तू भी सुंदर,
जिसको देखो,
सो ही सुंदर।
सूरज सुंदर,
चंदा सुंदर,
साहब का हर
धंधा सुंदर।
तारे सुंदर,
अंबर सुंदर,
धरती और समंदर सुंदर।
झरने सुंदर,
नदियाँ
सुंदर,
फल,
फूल और कलियाँ
सुंदर।
दिन भी सुंदर,
रात भी सुंदर,
पतझड
और
बरसात भी सुंदर।
रंग भी सुंदर,
रूप भी सुंदर,
छांव भी सुंदर,
धूप भी सुंदर।
जीव भी सुंदर,
जनम भी सुंदर,
अपना अपना,
करम भी सुंदर।
सुंदर शिव की,
दृष्टि सुंदर,
सुंदर शिव की,
सृष्टि सुंदर।
इस सृष्टि का,
तिन तिन सुंदर,
नाश न करना,
कण कण सुंदर।

तू कणकण पे बरस रहा है
तू सूरज से बरस रहा है,
तू तारों से बरस रहा है,
तू चंदा से बरस रहा है,
ग्रह सारों से बरस रहा है।
तू बाहर भी बरस रहा है,
तू अंदर भी बरस रहा है,
तू नीचे भी बरस रहा है,
तू ऊपर भी बरस रहा है।
तू रंगों से बरस रहा है,
तू रूपों से बरस रहा है,
तू आंखों से बरस रहा है,
तू सांसों से बरस रहा है।
तू हर दिल पे बरस रहा है,
हर धडक़न पे बरस रहा है,
तू हर जन पे बरस रहा है,
तू कणकण पे बरस रहा है।
तू उल्फत बन बरस रहा है,
तू रहमत बन बरस रहा है,
तू अमृत बन बरस रहा है,
तू कुदरत बन बरस रहा है।

ये किसकी बददुआ है?
ज़मीन जल रही है,
आसमान जल रहा है,
ये किसकी बददुआ है,
कि जहान जल रहा है?
घरबार जल रहा है,
दालान जल रहा है,
ये किसकी बददुआ है,
इंसान जल रहा है?
गुल भी जल रहा है,
गुलदान जल रहा है,
ये किसकी बददुआ है,
बागबान जल रहा है?
उपदेश जल रहा है,
फरमान जल रहा है,
ये किसकी बददुआ है,
दीवान जल रहा है?
विद्या जल रही है,
विद्वान जल रहा है,
ये किसकी बददुआ है,
ईमान जल रहा है?

o
अशोक
कुमार वशिष्ठ
103 chelveston crescent
Aldermoor, Southampton
So15 5sd, Hampshire, England