रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 
 

कथोपकथन

 

सड़क-नाटक के सूत्रपात का श्रेय हस्ताक्षर को हैः विभु कुमार

 

(समकालीन हिन्दी नाटकारों में विभु कुमार तेजी से उभरता एक नाम है । अब तक उनके तीन नाटक-अपरिभाषित, तालों में बंद प्रजातंत्र और कहे ईसा सुनें मूसा प्रकाशित हो चुके हैं । कहें ईसा सुने मुसा को हाल ही में साहित्य-परिषद, मध्यप्रदेश का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है । कलकत्ते की एक रंग-संस्था ने भी विगत वर्ष इस नाटक को पुरस्कृत किया था । विगत दिनों विभू कुमार जी का निधन हो गया । यहाँ ठाकुर राम साहू द्वारा वर्षों पूर्व (10 जून 1984 )ली गई भेंटवार्ता प्रस्तुत है । इस दुःख के साथ कि वे अब हमारे बीच नहीं रहे । सृजनगाथा परिवार की हार्दिक श्रद्धांजलि । - संपादक)

 

-आपकी ख्याति साहित्य के क्षेत्र में नाटककार के रूप में है । आपने साहित्य की इस विधा को क्यों ग्रहण किया ?

-नाटक के क्षेत्र में 1970-71 में एकाएक मेरी रुचि बढ़ी । उस समय बंगाल और राजस्थान में सड़क-नाटकों (नुक्कड़-नाटक) का जोर था । जयपुर में तब एक नाटक बीरबल की खिचड़ी खेला गया था । उसकी प्रतिक्रिया पढ़ अपनी संस्था  ‘हस्ताक्षर की ओर से नाटक खेलने का हम कुछ मित्रों ने निश्चय किया । रायपुर के युवा कवि सागर (स्व. श्रीधर बल्लेवार) के नाटक भिखमंगे का मंचन 14 जुलाई 1970 को हम लोगों ने बिलासपुर में किया । इसकी अच्छी प्रतिक्रिया हुई और अनेक स्थानों से आमंत्रण मिला । हम तीन-चार स्थानों पर नाटक लेकर गए भी।

रायपुर में खेला गया पहला सड़क-नाटक ‘मुखौटा1971में प्रस्तुत किया गया । वस्तुतः यह विधा मध्यप्रदेश में  ‘हस्ताक्षर के माध्यम से प्रारम्भ हुई । जहाँ तक मेरी जानकारी है,  में हम लोगों ने देश में पहला नाट्य-समारोह का आयोजन किया । इस समारोह में तीन सड़क नाट्य खेले गए । मेरा लिखा अभिमन्यु सड़क पर अशोक मिश्र लिखित व निर्देशित ‘चाटलाला और चन्द्रशेखर व्यास द्वारा लिखित व मिर्जा मसूद द्वारा निर्देशित-तमाशा । मतलब यह कि जन-सामान्य और उनकी समस्याओं से सीधे-जुड़ने की असाधारण क्षमता देख मैं नाटकों की ओर आकर्षित हुआ । यही नहीं मैंने अनुभव किया कि जन सामान्य की समस्याओं के संदर्भ में व्यवस्था के साथ उनकी लड़ाई में नाटक के माध्यम से ही सक्रिय हिस्सेदारी निभाई जा सकती हैं ।

 

-साहित्य के प्रति गहन रुचि के पीछे अपका प्रेरणा स्त्रोत

-साहित्य के पीछे गहन रुचि का अर्थ हुआ सामान्य जन के प्रति प्रतिबद्धता । उसकी लड़ाई में शरीक होना । इस समय तक किसी वाद विशेष या विचारधारा विशेष को ही लिखना है या किसी पत्रिका के लिए लिखना है, इस तरह की बात दिमाग में नहीं थी ।

-लेखन कार्य की शुरुआत आपने कब से की  प्रारंभ संभवतः आपनें कविता से किया था । कहानी और नाटक बाद में लिखना प्रारंभ किया । बार-बार विधा बदलने का क्या कारण है ?  क्या आप इस विधा को भी बदलने वाले हैं

-लेखन कार्य की शुरुआत मैंने 1959 के आसपास कविता के माध्यम से की । श्री चंद्रभान धर द्विवेदी हमारे प्रोफेसर थे । उनके विद्वतापूर्ण अध्यापक एवं काव्यमय व्यक्तित्व ने ही मुझे कवि बनने के लिए प्रेरित किया । कोई मजबूरी या किसी खास उद्देश्य के तहत विधा बदली हो, ऐसी कोई बात नहीं । जहाँ तक फिर विधा बदलने का सवाल है, भविष्य के लिए कुछ कहा नहीं जा सकता । अब उपन्यास की तमन्ना रह गई । उपन्यास लिखने की कोशिश भी की थी मगर आज तक समझ नहीं आया कि उपन्यास कैसे लिखा जाता है ।

 

-आपको किन-किन लेखकों, नाटककारों और निर्देशकों ने प्रभावित किया । आपको अपने निर्देशकों से शिकायत है या संतुष्ट हैं

-जहाँ तक प्रभावित करने का सवाल है मैं किसी से उस ढंग से प्रभावित नहीं हूँ । मेरे पूर्व के या समकालीनों में कोई ऐसा नाटककार नहीं है जिसने मुझे नाट्य-लेखन के लिए प्रभावित किया हो । अन्धेर नगरी, अन्धा युग वैसे काफी अच्छे नाटक हैं ।यदि निर्देशकों से संतोष-अन्सतोष का सवाल है तो यह हर नाटककार के साथ बना रहता है, लेकिन सामान्य रूप से मैं अपने निर्देशकों से सन्तुष्ट हूँ ।

 

-हबीब तनवीर की नाट्य-कला में छत्तीसगढ़ का लोक-जीवन कहाँ तक अभिव्यक्त हुआ है

-यह इतना विवादास्पद सवाल है कि मैं इसके बारे में फिलहाल कुछ कहना उचित नहीं समझता । तनवीर साहब से लिए गए मेरे दो इंटरव्यू प्रकाशित हो चुके हैं । एक-दो बार तो तीखा वैचारिक मतभेद भी हुआ । मैं खुद भी छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति और लोक-कला से अपरिचित नहीं सा हूँ क्योंकि मेरा सारा समय शहरों में ही व्यतीत हुआ है ।

 

-किसी ने कहा है- हिन्दी में केवल ढाई नाटककार हैं प्रसाद, राकेश और लाल । इस पर आपकी प्रतिक्रिया ? 

-मैंने जो इंटरव्यू लिया था प्रसिद्ध निर्देशक श्यामानन्द जालान का, ये उनके अपने विचार हैं । इस घर मैं किसी प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त करूँ, मेरे मत से ठीक नहीं ।

 

-नाटकों में आप लोक तत्व से कौन सा अर्थ ग्रहण करेंगे  तब और अब के हिन्दी नाटकों में लोक तत्व के आधार पर क्या कुछ अन्तर किया जा सकता है

-नाटकों में लोक तत्व से आप क्या आशय रखते हैं ।  यह तो मैं नहीं जानता क्योंकि यह शब्द रूढ़ होता जा रहा है । इसका अर्थ हम ग्रामीण अंचलों के संदर्भ में लेते हैं । ऐसा है तो मेरे नाटकों में लोक तत्व नहीं है । लेकिन लोकतत्व से आशय अगर मनुष्य के सामाजिक और सांस्कृतिक, आचार विचार एवं सम्पूर्ण जीवन शेली से है, तो ये सारी बातें मेरे ही नाटकों में नहीं, सभी नाटक कारों के नाटकों में मिलती हैं

 

-क्या नाटक रंग-मंच के लिए ही लिखा जाना चाहिए

-नाटक का सबंध और आधार रंग मंच ही है और इस तरह का विवाद हिन्दी के नाटकों में पहली बार प्रसाद के नाटकों को लेकर ही खड़ा किया गया ।

 

-क्या हिन्दी का अपना स्वतंत्र रंग-मंच है

-हिन्दी का रंग-मंच कैसा हो, यह इस संबंध में नाटककारों और निर्देशकों के दिमाग साफ नहीं है । हिन्दी में स्वतंत्र नाटक तो हो सकता है लेकिन रंग-मंच की बात मेरे गले नहीं उतरती ।

 

-क्या मंचन योग्य मौलिक हिन्दी नाटकों की कमी नहीं है ? 

-यह हल्ला खड़ा किया गया है कि हिन्दी मैं मौलिक नाटक नहीं है । दरअसल हमारे नगर का निर्देशक हो अथवा महानगरों का ऐसे नाटकों को मंचित करना पसंद करता है जो स्थापित है और जिसे मंचित करने से उसे जल्दी प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है । छोटी जगह का निर्देशक उन्हीं की नकल करना पसंद करता है । अपने आस-पास या पड़ोस में अच्छे नाटककार हो सकते हैं इस और वह नहीं देखता ।

 

-नेशनस स्कूल आफ ड्रामा की नये नाटकारों को प्रोत्साहित करने में क्या भूमिका रही है             -उसकी कोई भूमिका नहीं रही । दूसरी बात यह है कि यह रंग कर्मियों को तैयार करने की एक संस्था है । दुर्भाग्य ही कहा जाय कि वहाँ से जो प्रशिक्षण प्राप्त कर आते हैं, ऐसे नाटक खेल कर आते हैं जो यहाँ के नाटककारों के कम होते हैं । अतः उसके भूमिका का सवाल ज्यादा । महत्वपूर्ण नहीं है ।

 

-हिन्दी रंग-मंच की उन्नति एवं विकास के लिए आप क्या सुझाव देंगे ।

उ.- ज्यादा से ज्यादा नाटक मंचित किये जायें ।

oठाकुर राम साहू

वरिष्ठ पत्रकार, रायपुर

 

आपकी प्रतिक्रिया

नपुंसक लोगों से ज़्यादा परेशानी होती है - कमलेश्वर

आपकी प्रतिक्रिया

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, संजीव ठाकुर, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com