कमलेश्वर अभी जिंदा हैं
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कहानी को समकालीन दुनिया से जोड़ने वाले कमलेश्वर का इस तरह
बिछड़ के जाना बहुत सालता है। अभी कुछ दिन पहले ही जब उनसे
फ़ोन पर बात हुई तो वह अपनी कई योजनाओं के बारे में बताते
रहे थे। लेकिन अब वह सारी योजनाएं धूल धूसरित हो गई हैं।
लेकिन सच यह है कि कमलेश्वर की देह हमसे बिछड़ी है,
कमलेश्वर नहीं। कमलेश्वर तो अभी भी जिंदा हैं,
आगे भी ज़िंदा रहेंगे। कमलेश्वर के अख़बारी लेखों की किताब
जो अभी जल्दी ही आई है,
का नाम ही है कमलेश्वर अभी जिंदा हैं। तो सचमुच कमलेश्वर
अभी ज़िंदा हैं।
कमलेश्वर ने न सिर्फ क़हानी के मोर्चे पर बल्कि वैचारिक
स्तर पर भी खास कर धर्मनिरपेक्षता के मोर्चे पर भी काफी
काम किया। और मोर्चा लेना तो उनका जैसे शगल ही था। उनकी
आवाज़ में जो खनक हमेशा समाई रहती थी,
उनके लिखने में यह खनक और गमक के साथ उपस्थित होती थी।
काली आंधी उपन्यास जब उन्होंने लिखा था तो काफी बवाल मचा
था। बहुतेरे लोगों की राय थी कि यह इंदिरा गांधी पर आधारित
उपन्यास है। मुंबई में एक बार डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने
उन्हें बधाई दी और कहा कि इंदिरा गांधी का अच्छा चित्रण
किया है। कमलेश्वर छूटते ही उनसे बोले यह उपन्यास इंदिरा
गांधी पर नहीं विजया राजे सिंधिया पर आधारित है। स्वामी उन
दिनों जनसंघ में थे। और विजया राजे सिंधिया भी। स्वामी इस
पर भड़क गए और मामला दूर तक गया। बाद में गुलज़ार ने इसी
काली आंधी को ले कर आंधी नाम की फ़िल्म बनाई। जिसे इमरजेंसी
में संजय गांधी का शिकार होना पड़ा था। कमलेश्वर जब सारिका
में संपादक थे तब मुझे याद है उन्होंने आलम शाह ख़ान की एक
कहानी
'किराए
की कोख'
छापी थी। जिसमें किराए की कोख देने वाली महिला हिंदू थी और
जाहिर है कि जयपुर में आलम शाह ख़ान पर और मुंबई में सारिका
पर
'हिंदूवादी'
शक्तियों ने जैसे आक्रमण ही कर दिया था। कमलेश्वर ने इसका
डट कर मुक़ाबला किया था। बाद के दिनों में तो सारिका में
उनका संपादकीय जो मेरा पन्ना नाम से छपता था,
एक तरह से फासिस्टों और सांप्रदायिक शक्तियों के ख़िलाफ़
हथियार से भी कहीं ज्यादा काम करने लगा था। मुझे याद है कि
जनता सरकार के दिनों में मेरा पन्ना में उन्होंने लिखा था,
'यह
देश किसी मोरारजी देसाई,
किसी चौधरी चरण सिंह,
किसी जगजीवन राम भर का नहीं है।'
अलग बात है कि सारिका का यह अंक टाइम्स ऑफ इंडिया के
मैनेजमेंट ने छप जाने के बावजूद वितरित नहीं होने दिया था
और जला दिया था। इसी प्रसंग में कमलेश्वर को सारिका से
विदा भी होना पड़ा था। इतना ही नहीं तब सारिका भी मुंबई से
दिल्ली आ गई थी। बाद में कमलेश्वर ने अपने संसाधनों से
कथायात्रा नाम की एक पत्रिका निकाली। जिसमें यह संपादकीय
फिर से छापा था। कथायात्रा का जो तेवर था,
अद्भुत था। लेकिन दो-तीन अंकों के बाद ही इस पत्रिका को भी
बंद होना पड़ा। फिर उन्होंने गंगा निकाली,
दैनिक जागरण गए,
दैनिक भास्कर गए। इससे पहले करंट में कॉलम लिखा और
न्यायपालिका को वेश्या से भी गई गुजरी लिखने के आरोप में
कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट भी झेला। लेकिन माफी नहीं मांगी।
उन्हें चेतावनी दे कर छोड़ दिया गया। पिछले दिनों अपने
उपन्यास अपने-अपने युध्द को ले कर हुए कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट
को ले कर मैं भी काफी परेशान रहा। रवींद्र कालिया ने
कमलेश्वर के इस प्रसंग का ज़िक्र किया और कहा कि मुझे उनसे
संपर्क करना चाहिए। मैंने कमलेश्वर को फ़ोन किया और सारा
मामला बताया। कमलेश्वर ने मेरी पग-पग मदद की। और मेरा साहस
बढ़ाया। कहा कि झुकिएगा नहीं। कमलेश्वर से मेरी पहली
मुलाक़ात चिट्ठियों से हुई थी। प्रेमचंद पर एक किताब की
तैयारी कर रहा था। उसके लिए मुझे उनसे लेख चाहिए था। न
सिर्फ़ उन्होंने लेख भेजा बल्कि किताब की रूपरेखा के बारे
में भी चिट्ठियां लिखीं। तब जब कि उन दिनों मैं पढ़ रहा था।
बाद में दिल्ली में जब वह दूरदर्शन में अतिरिक्त महानिदेशक
थे,
तब मैं दिल्ली नौकरी करने पहुंच गया था,
उनसे रूबरू मुलाक़ात होने लगी थी। अपना बना लेना तो कोई
कमलेश्वर से सीखे। बड़प्पन उनमें कूट-कूट कर भरा था। बाद के
दिनों में तो वह फिर से मुंबई लौट गए थे। और अब फिर दिल्ली
आ गए थे। कमलेश्वर का सौभाग्य कहिए या दुर्भाग्य उन्होंने
घनघोर विपन्नता भी देखी और समृध्दि से भरा आकाश भी।
उन्होंने खुद ही कहीं लिखा है कि एक समय बेटी के लिए दूध
की व्यवस्था करना भी कठिन हो गया था। और बाद के दिनों में
बात-बात पर लोग लाख-दस लाख पेशगी दे जाते थे। मैं समझता
हूं कि हिंदी के लेखकों में कमेलश्वर और मनोहर श्याम जैसी
संपन्नता विरले ही लेखकों को नसीब हुई होगी। कमेलश्वर ने
शक्ति सामंत,
देवानंद सरीखे तमाम फ़िल्म निर्देशकों के साथ काम किया।
बर्निंग टे्रन जैसी फ़िल्म लिखीं। कई फ़िल्मों में उनके
द्वारा बोली गई कमेंट्री अब यादगार ही है।
कमलेश्वर ने अपने संस्मरणों में कहीं लिखा है कि एक बार एक
प्रोडयूसर एक फ़िल्मी पार्टी में उन्हें मिला और जब उसे
बताया गया कि वह कहानीकार हैं तो वह उनके पीछे पड़ गया और
कहा कि मेरे लिए कहानी लिखो। कमलेश्वर को उसने एक महंगे
होटल में एक स्वीट बुक करा कर बैठा दिया। और कहा कि यहीं
रहो और यहीं लिखो। हफ्ता भर बीता तो वह आया और पूछा कि
कहानी बनी?
उन्होंने कहा नहीं। वह चला गया। हफ्ते भर बाद फिर आया और
पूछा कि कहानी बनी?
तो उन्होंने कहा नहीं। अंतत: उसने पूछा कि कहानी क्या
लिखनी है तुम्हें मालूम भी है?
कमलेश्वर बोले यही तो तय करना है। प्रोडयूसर बिदक गया।
बोला,
'फ़िल्म
कितने रील की होगी?'
कमलेश्वर बोले,
'चौदह-पंद्रह
रील की।'
उसने पूछा,
'गाने
कितने होंगे?'
कमलेश्वर बोले,
'छह-सात
गाने तो होंगे ही।'
प्रोडयूसर बोला,
'चलो
सात रील हो गई। मारपीट होगी या नहीं?'
कमलेश्वर बोले,
'बिलकुल
होगी।'
प्रोडयूसर बोला,
'चलो
दो-तीन रील की मारपीट हो गई। कुल कितने रील हो गई- दस रील।
अब बोलो कास्टिंग होगी कि नहीं?'
कमलेश्वर बोले,
'होगी
ही।'
प्रोडयूसर बोला,
'चलो
दो रील कास्टिंग की तो बारह रील हो गई। और अब बची कितनी
रील?
दो रील। तो तुम दो रील की कहानी पंद्रह दिन में नहीं लिख
पाए?
कैसे स्टोरी राइटर हो?'
कमलेश्वर ने फ़िल्मी दुनिया के अजीबोगरीब संस्मरण लिखे हैं।
एक जगह उन्होंने लिखा है कि फ़िल्मी पार्टियों में शराब रोज
हो जाती थी और ज्यादा हो जाती थी। दूसरे रोज
आधा दिन सोने में ख़राब हो जाता था। एक जगह उन्होंने लिखा
है कि एक पार्टी में शराब उन्हें ज्यादा हो गई थी फिर भी
कोई उन्हें स्कॉच का एक पैग दे गया। कमलेश्वर बड़े असमंजस
में थे कि क्या करें?
तभी देवानंद उनके पास आए और उन्हें चलने के लिए कहने लगे।
कमलेश्वर ने कहा कि यह स्कॉच कैसे खतम करें?
देवानंद ने कहा कि ख़तम करने की ज़रूरत ही नहीं है,
छोड़ दीजिए। कमलेश्वर ने कहा आखिर स्कॉच है! देवानंद ने
उनसे कहा कि ख़राब थोड़े ही होगी,
यही कहीं रख दीजिए कोई पी जाएगा। कमलेश्वर ने ऐसा ही किया।
और सचमुच उन्होंने देखा कि कोई आ कर स्कॉच ले कर पी गया।
यह और ऐसी तमाम कहानियां कमलेश्वर जी के ज़िंदगी के अटूट
हिस्से हैं। कमलेश्वर का कांग्रेस से भी अद्भुत जुड़ाव था
और खुल्लम-खुल्ला! बहुत कम लोग जानते हैं कि,
'न
जात पर,
न पात पर,
मुहर लगेगी हाथ पर'
नारा कमलेश्वर का लिखा हुआ है। आलोचकों की बैसाखी के बिना
ही अपनी रचना के दम पर वह पाठकों के एक बड़े वर्ग में हमेशा
लोकप्रिय रहे। बावजूद इसके आलोचकों की राजनीति के वह खूब
शिकार हुए।
मोहन राकेश,
कमलेश्वर और राजेंद्र यादव की तिकड़ी काफी मशहूर रही है।
लेकिन जितनी क़रीबी उन्होंने मोहन राकेश से पाई शायद किसी
और से नहीं। हालांकि दुष्यंत कुमार और धर्मवीर भारती भी
उनके ख़ास दोस्तों में थे। लेकिन मोहन राकेश से उनकी दोस्ती
की बात ही कुछ और थी। मोहन राकेश की चौथी पत्नी अनीता
राकेश से जब उनका प्रेम प्रसंग चल रहा था और मोहन राकेश
अकेले पड़ गए थे तो सारी लड़ाई और सारे विवाद में कमलेश्वर
उनके साथ थे। अनीता राकेश को मुंबई जाने के लिए दिल्ली
एयरपोर्ट तक कमलेश्वर ही ले गए थे। मोहन राकेश के निधन के
बाद अनीता राकेश के संस्मरणों को सारिका में कमलेश्वर ने
ही छापा। ठीक वैसे ही जैसे दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों को भी
कहानी की पत्रिका सारिका में छाप कर उन्हें अमर कर दिया।
सारिका में दरअसल कमलेश्वर ने हिंदी कहानीकारों की एक नहीं
दो-दो पीढ़ियां तैयार कीं। राजा निरबंसिया कहानी से चर्चा
का शिखर छूने वाले कमलेश्वर कितने पाकिस्तान उपन्यास के
मार्फत साहित्य के आकाश पर छा गए।
कितने पाकिस्तान ने उनको न सिर्फ साहित्य अकादमी पुरस्कार
दिलवाया बल्कि एक साथ कई रिकॉर्ड बनाए। हिंदी में छपा यह
पहला उपन्यास है जिसके फटाफट बारह संस्करण छप गए। दुनिया
की कोई बीस भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ। एशिया महाद्वीप का
जो दर्पण कितने पाकिस्तान प्रस्तुत करता है,
वह न सिर्फ अद्भुत है बल्कि विरल भी। कमलेश्वर की कई
कहानियां,
कई किस्से,
कई संस्मरण बिलकुल आंखों के सामने नाच-नाच जाते हैं। वह
लोगों से खेलते भी बहुत थे। उनकी इस कला का बखान अगर न
किया जाए तो उनके बारे में बात शायद अधूरी रहेगी।
किस्से तो कई हैं लेकिन यहां एक ही किस्सा काफी है।
इलाहाबाद कॉफी हाउस में उन्होंने एक बार एक लेखक से कहा कि,
'भई
बधाई!'
लेखक महोदय बोले,
'क्या
हो गया?'
कमलेश्वर जी ने कहा,
'अरे
आप को पता नहीं कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य
के इतिहास में आप की भी चर्चा की है?'
लेखक महोदय बोले,
'क्या
कह रहे हैं?'
कमलेश्वर ने कहा,
'यकीन
न हो तो किताब देख लीजिए।'
लेखक महोदय ने बिना किताब देखे ही यह बात बहुतों को बता दी
कि मेरा नाम आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के
इतिहास में लिखा है। लोग जब उनका मजाक उड़ाने लगे तो वह
कमलेश्वर की तर्ज पर ही वह बोले,
'यकीन
न हो तो किताब देख लीजिए।'
लोग फिर भी उनका मजाक उड़ाने से नहीं रळके। और उनसे बोले आप
खुद भी तो किताब देख लीजिए। लेखक महोदय ने आचार्य रामचंद्र
शुक्ल का हिंदी साहित्य का इतिहास किताब ख़रीदी और कई बार
उलट-पुलट कर पढ़ गए। लेकिन उन्हें अपना नाम नहीं दिखा। वह
सीधे कमलेश्वर के पास पहुंचे। और तमतमा कर उनके सामने
हिंदी साहित्य का इतिहास किताब रख कर उनसे पूछा,
'कहाँ
है इसमें मेरा नाम?'
कमलेश्वर मुसकुराए और किताब हाथ में ली,
किताब की एक लाइन उन्हें पढ़ाई और कहा कि यह देखिए। और
पढ़िए। लेखक महोदय ने फिर पढ़ा और कहा कि कहां है मेरा नाम?
कमलेश्वर ने कहा यह ध्यान से देखिए कि जो
'आदि-आदि'
लिखा है,
वह कौन है?
अरे,
इस आदि-आदि में आप ही तो हैं!
तो ऐसे चुहुलबाज भी थे कमलेश्वर।
दयानंद
पांडेय
