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पांच हजार पचहत्तर वर्षीय कमलेश्वर
तब
तक मेरी कुछेक कहानियां ही इधर-उधर प्रकाशित हुई थी। वह गंगा
का ज़माना था। कमलेश्वर जी साहित्यिक पत्रिका गंगा के संपादक
थे। नई कहानियां, सारिका, श्रीवर्षा के संपादक रह चुके श्री
कमलेश्वर ने गंगा को बहुत जल्दी चर्चित पत्रिकाओ की श्रेणी में ला खड़ा किया था। एक कहानी
‘छब्बीस
जनवरी’
मैंने गंगा के लिए भेज दी। दस दिन बाद टेलीग्राम मिला कि
‘छब्बीस
जनवरी’
स्वीकृत है। लौटती डाक से अपना चित्र और परिचय भेजो। टेलीग्राम
से किसी कहानी की स्वीकृति की यह मेरे जीवन की पहली और अब तक
की आखरी स्वीकृति सिद्ध हुई।
अनुभवी अग्रज साहित्यकारों ने बताया कि यह कमलेश्वर जी का खास
अंदाज है । किसी व्यक्ति को महत्व देकर उसकी रचनाशीलता को और
धारदार बनाने के लिए वे तरह-तरह का उपक्रम करते हैं। इससे
मेरा आत्मिविश्वास बढ़ा । कहानी मह्त्व के साथ गंगा में छपी ।
उसके बाद साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग ओर दूसरी पत्रकाओं
में भी लगातार कहानियां आई। लेकिन कमलेश्वर जी से लगातार
पत्राचार का सिलसिला ही प्रारंभ हो गया। डॉ. हरिवंशराय बच्चन के
बाद कमलेश्वर जी ने ही मेरे हर पत्र का
जबाब यथासमय दिया। उनका काम
बहुत ही व्यवस्थित था।
उनसे मिलने मैं एक बार दिल्ली भी गया मगर भेंट न ही सकी।
अचानक
1994 में भिलाई में मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का दो
दिवसीय जलसा हुआ और कमलेश्वर जी भिलाई आए । यहीं उनसे मेरी पहली
भेंट हुई । उन्होंने भिलाई होटल के अपने कमरे में काफी देर तक
मुझसे बातचीत
की। एक वरिष्ठ साहित्यकार को इस तरह उनसे मेरा घुलना मिलना
अच्छा नहीं लगा । जब उनसे रहा न गया तो वे बोले परदेशी,
कमलेश्वर जी को आराम करने दो। अब बातें बंद करो।
कमलेश्वर
जी ने कहा कि परदेशी से बात करके ही मुझे आराम मिल रहा है,
आप चिंता न करें।उनके इस जवाब से
वरिष्ठ का चेहरा तो उतर गया। मुझे तत्काल उलट
कर जवाब से उनकी उदारता का एक रंग और देखने को मिला। मैं उनकी
कल्पनाशीलता से भी चकित था। वहीं मैंने अपनी पाण्डुलिपि दे दी।
कुछ ही दिनों में ‘संतरा
बाई की शर्त’
बख्शी जी पर आयोजित कार्यक्रम में तथा
बिलासपुर में सतीश
जायसवाल द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कमलेश्वर जी से भेंट हुई।
कमलेश्वर जी ने बख्शी साहित्य पर बेहद मह्त्वपूर्ण व्याख्यान
दिया था। वे कई बार छत्तीसगढ़ आ चुके थे। अशोक बाजपेयी जब
महासमुंद में पदस्थ थे तब भी वे यहाँ बुलवाए गए थे। आखिरी बार
बख्शी सृजनपीठ के तत्कालीन अध्यक्ष सतीश जायसवाल के आमंत्रण पर
2002 में वह भिलाई आए । छत्तीसगढ़ी कथा कोश प्रकाशित करने की
योजना बनी तो उन्होंने मुझे आदेश दिया कि मैं इस पर काम करूं ।
मुझे संतोष है कि मैं उनके आदेश का पालन कर सका । शीघ्र ही यह
कथा कोश प्रकाशित होगा ।
उन्हें पाँच वर्ष पूर्व अटैक आया था। अभी पिछले वर्ष फिर आया ।
पहली बार अटैक
झेल लेने के बाद ही वह भिलाई आए थे । जीवन भर
कठिन संघर्ष कर आगे ही आगे बढ़ने वाले हौसलेमंद कलमकार
कमलेश्वर जी ने हार्च अचैक को भी बहुत मामूली बीमारी की तरह
लिया । पूछने पर उन्होंने बताया कि कोई बात नहीं । अब दिल जो
है एकदम सही है। देसी घी एक चम्मच लेता ही हूँ । रोज अपने
हिसाब से ड्रिंक लेकर खाना खाने की मेरी आदत है। उन्होंने आगे
बताया एक बात और हुई । पिछने दिनों ह्रदय रोग विशेषज्ञ
मेरे
मित्र ने मेरी जाँच की । उन्होंने मुझे लिटाकर जांचते हुए कहा
कमलेश्बर ईश्वर को तुमने देखा है। मेंने कहा नहीं । डाक्टर
मित्र ने कहा, लेकिन मैं देख रहा हूं । तुम्हारे दिल में एक नई
नस और जुड़ रही है।
जिससे रक्त की बेहत्तर आपूर्ति हो रही है ।
यह चमत्कार है।
कमलेश्वर जी ने यह किस्सा बताया तो मुझे
बहुत खुशी हुई थी।
लेकिन वह नया नस बहुत दिनों तक उनके दिल को सम्हाल न सकी और
दूसरा अटैक आ गया । कमलेश्वर जी ने यह भी बताया कि जागरण का
संपादन उनके दिल पर भारी पड़ा । रातरात भर जागकर काम किया । और
इस तरह दिनचर्या भी
बिगड़ गई ।
वे 16 जनबरी 1932 को जन्मे । यह वह
दौर था जब कथा सम्रमाट प्रेमचंद गोदान लिख रहे थे। उत्तर
प्रदेश के एक कस्बे में जन्में कमलेश्वर के सिर पर पिता का
साया नहीं था। माँ ने कमलेश्वर जी को पाला। मैंने अपनी माँ पर
दाई शीर्षक संस्मरण लिखा । इंद्रप्रस्थ भारती में वह छपा तो वे
कमलेश्वर जी ही
थे जिन्होंने मुझे सबसे पहले बहुत प्यारा भर
पत्र लिखा । कमलेश्वर को छुटपन के संघर्ष भरे दिनों में बहुत
छोटे-छोटे काम करने पड़े। पत्र-पत्रिकाओं के लिए प्रूफ रीडिंग,
कागज के डिब्वों पर डिजाइन बनाना। टयूशन, पेंटिंग, वाल राइटिंग
और बुक बांड चाय के गोदाम में रात पाली में रखवाले का काम भी
करते रहे। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी एमए किया
। एमए करते हुए ही ‘एक
सड़क सत्तावन गलियाँ’
लिखकर वह चर्चित हो चुके थे। यह उपन्यास हंस में छपा । बाद में
यह बदनाम गली शीर्षक से भी छपा ।1948
में उनकी पहली कहानी ‘कामरेड’
‘छपी।
तब से अब तक प्रकाशित लगभग तीन सौ कहानियों में वे विषय
और प्रस्तुति की दृष्टि से सदा नयापन लाने में सफल रहे।
1951 में उनकी कहानी ‘राजा
निरबंशिया’
आई । इस कहानी के प्रकाशित होते ही वह साहित्यिक परिदृश्य पर
कथा नक्षत्र के रूप में जगमग करने लगे। कमलेश्वर जी के पास
विषय का वैविध्य देखते ही बनता है।भाषा की जादूगरी उनके पास
शुरू से रही । यथार्थवादी चिंतन और जीवन की धड़कनों को ध्वनि
और स्वरूप देने वाली भाषा के कारण वे उत्तरोत्तर बेहद
महत्वपूर्ण हो गए। 1955 में उनका पहला कहानी संग्रह राजा
निरबंशिया आया और 1953 में पहला उपन्यास एक सड़क सत्तावन
गलियाँ प्रकाशित हुआ । तब से लगतार कहानी संग्रह कस्बे का
आदमी, खोई हुई दिशाएं, मांस का दरिया, बयान, जार्ज पंचम की नाक,
मेरी प्रिय कहानियाँ, मेरी श्रेष्ठ आंचलिक कहानियाँ, चर्चित
कहानियाँ, दस
प्रतिनिधि कहानियाँ संग्रहों के साथ ही कमलेश्वर की समग्र
कहानियाँ दो खंडों में प्रकाशित हुई । उपन्यासों में एक सड़क
सत्तावन गलियाँ, लौटे हुए मुसाफिर, डाक बंगला, तीसरा आदमी,
समुद्र में खोया हुआ आदमी, काली आंधी, वही बात, आगामी अतीत,
सुबह दोहपहर शाम, रेगिस्तान, एक और चंद्रकांता तथा कितने
पाकिस्तान प्रकाशित हुए ।
अधूरी आवाज़, बाल नाटक रेत पर लिखे
नाम तथा हिन्दुस्तां हमारा नाटक भी प्रकाशित हुए । नाट्य
रुपांतरण में रविंद्रनाथ टैगोर के नष्टनीड़ की चारूलता तथा
बेसट लिखित कृति को खड़िया का घेरा नाम से उन्होंने प्रस्तुत
किया। नई कहानी की भूमिका आलोचना की पहली किताब थी। मेरा
पन्ना, समान्तर सोच खंडो में 1978 में प्रकाशित हुआ। तब तक नई
कहानियों के अगुवा कमलेश्वर जी समांतर आंदोलन के पुरोधा बन
चुके थे। खंडित
यात्राएं तथा कश्मीर, रात के बाद, दो यात्रा
विवरण की किताबें प्रकाशित हुई । आत्मपरक संस्मरण की किताबें जो
मैंने जिया, यादों के चिराग तथा जलती हुई नदी प्रकाशित हुई ।
डायरी की पहली किताब 1972-73 में आई। घटनाक्रम, सिलसिला, थमना
नहीं किताबें 1996 एवं 1998 में आई । उन्होंने संकेत वृहद
साहित्यिक संकलन तथा समान्तर एक समकालीन कहानी संकलन कासंपादन
किया।
मेरा हमदम, मेरा दोस्त, गर्दिश के दिन, आघ कथाकार मराठी
कहानियाँ, तेलुगु कहानियाँ, पंजाबी कहानियाँ, उर्दू कहानियाँ
उनके संपादन में अब तक 10 कृतियाँ प्रकाशित हुई हैं। उन्होंने
1954 में बिहान पत्रिका का संपादन किया । 1961-63 में इंगित
तथा 1963-66 तक नई कहानियाँ के वे सफल संपादक रहे
। सारिका ने यश
का अनोखा आसमान छुआ । उनके संपादन में सारिका के अविस्मरणीय
अंक 1967 से 1978 तक निकले । आपातकाल के विरोध में सारिका का
जो अंक निकला वह पत्रिकाओं के इतिहास में कभी नहीं भुलाया जा
सकेगा। वे कथायात्रा, श्री वर्धा, गंगा दैनिक जागरण का संपादन
करते रहे। 1997 से भास्कर का संपादन लगातार उन्होंने किया।
कमलेश्वर
जी हिंदी के ऐसे यशस्वी साहित्यकार थे। जिन्होंने अपने
संघर्षों से प्राप्त अनुभवों को अपनी विलक्षण कला दक्षता के दम
पर इंद्रधनुषी स्वरूप दिया। लोगों ने उनकी दक्षता को खूब सराहा
भी। वह 99 फिल्म लिखने वाले गंभीर साहित्य की दुनिया के अकेले
उदाहरण हैं। उन्होंने फिल्मों में लेखक की हैसियत वेतन भोगी
मुंशी से स्टार राइटर की करवा दी।
‘काली
आंधी’
उपन्यास पर बनी फिल्म
‘आंधी’
पर खूब हो हल्ला मचा लेकिन उनकी हिम्मत उन्हें ही आगे ले जाती गई।
वह दूरदर्शन में स्क्रीप्ट राइटर रह चुके थे। आकाशवाणी और
दूरदर्शन में अपनी दक्षता वे पूर्व में सिद्ध कर चुके थे।
इंदिरा गांधी ने दूरदर्शन के लिए संस्कृति साहित्य एवं मीडिया
में समान दखल रखने वाले व्यक्ति को दूरदर्शन में लाने का फैसला
किया । इसके लिए कमलेश्वर जी ही उन्हें उपयुक्त जंचे ।
अतिरिक्त केन्द्र निदेशक के पद पर नियुक्ति के पहले इंदिरा जी
से उनकी सीधी भेंट तय की गई
। इंदिरा जी ने उन्हें एक वाक्य
में बताया कि संस्कृति, साहित्य एवं मीडिया के विशेषज्ञ की
हमें तलाश थी । आप इस पद के लिए सर्वथा उपयुक्त हैं ।
इस एक वाक्य के जवाब में कमलेश्वर जी ने कहा-
‘मैडम,
आई एम द सेम कमलेश्वर हू रोट आंधी’
उनकी साफगोई से प्रसन्न इंदिरा जी ने मुस्कराते हुए कहा
‘यस,
आई नो ।’
और वे दूरदर्शन के अतिरिक्त केन्द्र निर्देशक नियुक्त कर दिये
गये । दूरदर्शन के लिए एक ही परिवार के तीन महत्वपूर्ण
व्यक्तियों के निधन की कमेंट्री उन्होंने की । संजय गाँधी,
पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी एवं राजीव गांधी के
परलोकगमन के बाद पार्थिव शरीर को चिताग्नि के सुपुर्द करने तक
की दर्द भरी दास्तान उन्होंने देश विदेश के लोगों को सुनाई ।
कमलेश्वर जी दूसरों के भीतर छुपी प्रतिभा को पहचानने में माहिर
थे, लेकिन अपनी विशेषताओं को भी वे खूब जानते और मानते हैं ।
दुष्यंत कुमार यूं तो अपने जीवन काल में ही बेहद चर्चित थे
लिकिन संग्रह में ‘साये
में धूप’
में ग़ज़लों का चयन कमलेश्वर जी
ने जिस प्रवीणता से किया उसे
चंद महीनों में पूरी दुनिया ने देखा । दुष्यंत के जाने के बाद
उन्होंने उनके लड़के को अपना दामाद बनाकर सांसारिक संबंधों के
महापाश में जकड़ लिया। वह बेटी-दामाद नातिन के साथ इरोज
गार्डन दिल्ली के अपने घर में वे रहते थे ।
कमलेश्वर जी शीर्षक में ही अपनी अच्छी बात कह जाते थे । उनकी
कृतियों के सारे शीर्षक
इसके गवाह हैं। आगामी अतीत, जिंदा मुर्दे, काली आँधी, कितने
पाकिस्तान ये शीर्षक बताते हैं कि भीतर सामग्री क्या होगी ।
कुछ कहानियों के एक पूरे वाक्य भर के शीर्षक भी हैं । वे
फाकाकशी के दिनों में मंच पर कवितायें भी सुना चुके थे । उनका
समग्र पाठकों को भाषा की रवानी और विषय की विलक्षणता के कारण
कविता का आस्वाद देता था। 75 बरस के कमलेश्वर जी से अगर कोई
उनकी उम्र पूछता था तो वह उसमें 5000 बरस का इजाफ़ा कर बताते थे। वह कहते थे - इस महाद्वीप की सांस्कृतिक आयु पाँच हजार साल की
है इसीलिए वह अपनी उम्र में इन पाँच हजार वर्षों को जोड़ते हैं
।
धर्म ने जिस तरह अपनी कट्टरता के कारण दूरियों को जन्म दिया
उस पर वे एक वृहत उपन्यास लिख रहे थे ।
वे अचानक कुछ नहीं लिखते थे । लगातार किसी विषयों को लेकर
उद्वेलित रहते थे । फिर दशकों बाद उन अनुभवों को उपन्यास कहानी
की शक्ल में ढालते थे । बंगला देश के निर्माण के समय वे
फौजियों के साथ अग्रिम मोर्चे पर भी रहे । तमाम बारीक अनुभवों
से ‘कितने
पाकिस्तान’
का वृहद स्वरुप बना । इस अद्भूत उपन्यास को जो ख्याति मिली है
उसकी दूसरी मिसाल इन दिनों नहीं दिखती । उनकी एक-एक कहानी पर
खूब लिखा जा चुका हैं । मैं अपनी बात खत्म करते हुए केवल
‘माँस
का दरिया’
पर दो एक बात कहना चाहता हूँ । कहानी यूं तो एक जिस्म के
ग्राहक और वेश्या की है मगर मतलबी संसार में मजबूरी के तहत
रिश्तों का निर्वाह करने वाले लोगों की असल कथा है। यहाँ एक
तरफ वे लोग हैं जो मजबूर हैं दूसरी तरफ वे लोग हैं जो
संवेदनहीन पशु हैं और तात्कालिक सुख के लिए जीते हैं । इसमें
तन का बाजार हैं । संसार को युग युगों से संचालित करने वाली
बाजार की काया और माया इस कहानी में आ खड़ी होती हैं । आशा है,
कमलेश्वर जी की धर्म के आंडबर से परदा उठाने वाली कृति शीघ्र
ही हमारे बीच होगी । लेकिन, इसके साथ ही एक गहरा अफसोस यह
भी
है कि तब कमलेश्वर जी हमारे बीच ना होंगे ।
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डॉ. परदेशी राम वर्मा
संपादक,
अकासदिया
भिलाई,
छत्तीसगढ़
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